कबीर की बानी निर्गुण भक्ति की उस अनुपम धारा की प्रतीक है, जो निर्लिप्त होते हुए भी हृदय को झकझोर देती है। 'मसि कागद छुयो नहीं, कलम गयौ नहिं हाथ' यह पंक्ति कबीर बानी की मौखिक परम्परा को रेखांकित करती है, जहाँ शब्दों का उद्गम हृदय से होता है, न कि लेखनी की बाध्यता से। यह पुस्तक उसी कबीर बानी के सत्य को 'आखिन देखी' की तरह उजागर करने का प्रयास है। कबीर की बानियों के संदर्भ में यह पुस्तक कहने से ज्यादा इशारा करती है। कबीर बानी पर लिखे जाने का सिलसिला विगत शताब्दी से ही गुणवत्ता और परिमाण की दृष्टि से सतत् रहा है। यह पुस्तक कबीर के गहन अध्येताओं की परम्परा का अनुगमन है। देश-दुनिया की समकालीन वास्तविकता में हर कहीं कबीर वाणी के अध्ययन और अनुशीलन की प्रासंगिकता पिछली शताब्दी की तुलना में कहीं ज्यादा है। इस पुस्तक में अति कथन से बचते हुए कबीर की कविता में मौजूद 'बिटवीन द लाइंस' को प्रत्यक्ष करने की कोशिश की गई है। इस पुस्तक में कहा से ज्यादा अनकहा है। पुस्तक की पंक्तियाँ जो बोलती हैं, उससे ज्यादा वे बातें हैं, जो दरअसल बोली नहीं गयी हैं। कबीर बानी के बीच विद्यमान निःशब्द तात्पयों के शब्दों को पिरोना अत्यंत दुष्कर कार्य है। राई की ओट में छिपे अनकहे पहाड़ों को सामने लाना गहरी पैठ की मांग करता है। कबीर बानी रूपी मानसरोवर में पुरइन के जाल सदृश प्रसृत अनेकानेक शब्दावलियाँ हैं, जिन्हें डीकोड करने की विनम्र कोशिश की गयी है। अपने विद्यार्थी जीवन में ही कबीर की रचनाओं का जो सहज बोध मुझे घर पर ही पितामह तुल्य ठा. जयदेव सिंह और पिताजी डॉ. वासुदेव सिंह की साखी-सबद-रमैनी की टीका को लेकर होने वाली चर्चाओं के माध्यम से मिला। कबीर वाङ्मय पर कार्य करते हुए दोनों विद्वानों की वार्ता मूक उत्साहित श्रोता के रूप में मुझ तक पहुंची, उसी से मुझे कबीर की कविता को समझने का संस्कार मिला। अध्ययन-अध्यापन के क्रम में मैंने पाया कि कबीर की बानियों में अतर्निहित गूढ़ तथ्यों तक पहुंचने के अनेक प्रयासों के बावजूद अभी बहुत कुछ शेष है, जिसे सामने लाने की जरूरत है। विशेष रूप से परम्परा की रूढ़ियों से दो-चार करने वाले कबीर की बानियों में निहित भारतीय ज्ञान-परम्परा को सामने लाना अति आवश्यक लगा। कबीर बानी वस्तुतः भारतीय ज्ञान-परम्परा का गहन विस्तार है। कबीर बानी भारतीय चेतना की अमर ज्योति है, जो अंधकारमय संकीर्णताओं को चीरकर प्रकाश की ओर ले जाती है। कबीर केवल संत कवि ही नहीं हैं, अपितु एक ऐसे दार्शनिक क्रांतिकारी भी हैं, जिन्होंने अपनी आँखों से देखे सत्य को शब्दों में उतारकर मानव-मन को गहन संदेश दिए। कबीर की बानियों पर बात करते हुए प्रायः रमैनी के छंद अछूते ही रह जाते हैं। साखी और सबद में भटकते विद्यार्थी रमैनी के बारे में बहुत कम जानते हैं। जबकि कबीर की रमैनी उनके प्रमुख ग्रंथ 'बीजक' की प्रस्तावना है, जिसमें आध्यात्मिक उपदेश और लोक परम्परा से प्रेरित काव्यरूप का उपयोग किया गया है। कबीर की रमैनी लोकगीतों की परम्परा को अपनाकर सामान्य जन तक विचार पहुंचाती है। उनकी वाणी निर्गुण भक्ति की ऊँचाइयों को छूती हुई सामाजिक कुरीतियों की जड़ों को काटती है और सहज साधना के माध्यम से आत्म साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करती है। यहाँ कबीर बानी को भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रकाश में विश्लेषित करने का यत्न किया गया है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि कबीर बानी में वेदांत की गहनता, योग की साधना और लोक-संस्कृति की सहजता एकाकार हो जाती है। कबीर की बानी आँखिन देखी का सच है, यहाँ प्रत्यक्ष अनुभव की वह तीव्रता है, जो बिना मसि कागद का स्पर्श किए, बिना कलम छुए ही शब्दों की सीमाओं को लांघ जाती है। रहस्यवादी कबीर के अंतर्मन में 'साधो सहजै काया सोधो' का संदेश गूंजता है, जो शरीर को ही ईश्वर का मंदिर मानकर प्रीति की रमणीय ठानी बनाना सिखाता है। उनकी दार्शनिक चेतना निर्विशेष ब्रह्म को लोकभाषा में उतारती है, जबकि काव्य में प्रयुक्त मिथक, प्रतीक और पौराणिक संदर्भ भारतीय संस्कृति की परम्परागत ज्योति को आधुनिक संदर्भ प्रदान करते हैं। इन सभी आयामों को एकसूत्र में पिरोने का प्रयास किया गया है ताकि पाठक कबीर की बानी के माध्यम से अपनी आंतरिक ज्योति को प्रज्ज्वलित कर सकें।
कबीर के साहित्य में मौजूद रहस्यवाद की व्याख्या दो विपरीत ध्रुवों पर होती रही है। कबीर के आलोचक और प्रशंसक दोनों ही रहस्यवाद को अपना हथियार बनाते हैं। ऐसे में श्रद्धा सिंह कबीर के अध्यात्मेतर रहस्यवाद की पड़ताल करती हैं। वे रहस्यवाद के भीतर से स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के भाव-बोध का उत्खनन करती हैं तथा सहज की सहजता का संधान करती हैं। कबीर बानी की इस यात्रा में वे पूर्व आचार्यों की मान्यताओं में मौजूद विसंगतियों का प्रतिकार भी करती हैं। वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कबीर संबंधी विवेचन को एकांगी और अनुदार कहकर ही नहीं रुक जातीं, बल्कि सम्यक् मूल्यांकन की दिशा भी बताती हैं। इसी तरह वे हजारीप्रसाद द्विवेदी के मत की परीक्षा करती हैं। रमैनी की रचना के बारे में वे द्विवेदी जी के इस अनुमान कि 'तुलसीदास के रामचरितमानस की प्रसिद्धि के बाद कबीरपंथियों ने दोहा, चौपाई शैली में रमैनी जोड़ दी होगी' का प्रत्याख्यान ही नहीं करतीं हैं बल्कि अपने निर्णय को तथ्यात्मक आधार पर पुष्ट करतीं हैं। खास बात यह है कि प्रो. श्रद्धा सिंह कबीर मीमांसा में साखी, सबद और रमैनी-तीनों के टेक्स्ट को ध्यान में रखती हैं और बानियों के बीच से कबीर के दर्शन का साक्षात् करती हैं। नाना प्रकार की अस्मिताओं के विमर्श और तरह-तरह की वैचारिकी के आग्रह में कबीर बानी की आवाज कहीं खो जाया करती है, इसलिए श्रद्धा सिंह की पाठ केंद्रियता भली लगती है।
श्रद्धा सिंह जन्म तिथि: 10/07/1964 जन्म स्थान : सीतापुर, उत्तर प्रदेश शिक्षा: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं काशी विद्यापीठ, वाराणसी पुस्तक : सम्प्रदाय-मुक्त कृष्णभक्ति काव्य कबीर : विमर्श के नए संदर्भभक्तिकाव्य : कुछ चंदन सा कुछ कपूर सा आधी आबादी: संदर्भ एवं प्रसंग साहित्य का नारीवादी पाठ सम्पादन "नमन" अर्धवार्षिक शोध पत्रिका भक्तिकाव्य धारा स्त्री चेतना और भारतीय मूल्य : कुछ राग कुछ रंग वर्तमान पता : वरिष्ठ आचार्य, हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी 221005, उत्तर प्रदेश
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