पुस्तक परिचय
'कामायनी' प्रसाद की अंतिम कृति है। इसके कथानक के आधार पर यह प्राचीन आख्यान है, जिसके अनुसार मनु के अतिरिक्त संपूर्ण देव जाति प्रलय का शिकार हो जाती है और मनु तथा श्रद्धा या कामायनी के संयोग से मानव सभ्यता का प्रवर्तन होता है। इसका कथानक बहुत संक्षिप्त है, लेकिन कवि ने इसमें जीवन के अनेक पक्षों को समन्वित करके मानव जीवन के लिए एक व्यापक आदर्श व्यवस्था की स्थापना का प्रयास किया है। प्रसाद ने प्रमुख पात्रों-मनु, श्रद्धा, और इड़ा के चरित्रांकन में मनुष्य की अनुभूतियों, कामनाओं, और आकांक्षाओं की अनेकरूपता का वर्णन किया है। 'कामायनी' केवल मनु आदि के व्यक्ति जीवन की ऐतिहासिक कथा ही नहीं है, बल्कि इन पात्रों की सांकेतिकताएं भी उसमें हैं, जिन्हें स्वयं कवि ने स्वीकार किया है। किंतु प्रसाद ने 'रूपक' शब्द का प्रयोग केवल 'इतिहास' के संदर्भ किया है। 'कामायनी' के संदर्भ में तो कवि ने मनु आदि पात्रों के ऐतिहासिक व्यक्तित्व को ही प्रधान माना है। 'कामायनी' में बुद्धिवाद विरोध में हृदयतत्त्व की प्रतिष्ठा करते हुए कवि ने शैव दर्शन के आनंदवाद को जीवन को पूर्ण उत्कर्ष का साधन माना है। 'कामायनी' को अपने परिवेश से संबद्ध करने का प्रयास किया है, किंतु इस संदर्भ को ले कर इस कृति की आलोचना भी की गयी है कि यह कृति अपने युग के यथार्थ की समस्याओं का यथार्थ के धरातल पर समाधान करने में असमर्थ रही है। 'कामायनी' अपनी सीमाओं के बावजूद, निःसंदेह हिंदी साहित्य की एक गौरवशाली उपलब्धि है। प्रस्तुत पुस्तक में वरिष्ठ लेखक ने 'कामायनी' का विस्तृत विवेचन अपने अध्ययन की कतिपय नवीन दिशाओं के आधार पर करने का एक सफल प्रयास है। पुस्तक के अब तक अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं और निश्चय ही साहित्य के विद्यार्थियों की यह पुस्तक पहली पसंद है।
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