लेखक परिचय
कर्म योग स्वामी विवेकानंद के द्वारा दिसंबर 1895 से जनवरी 1896 के बीच दिए गए भाषणों का संकलन है। कर्म योग हमें आसक्ति रहित होकर कम करने की प्रेरणा देता है। सच्चा कर्मयोगी वही है जो कर्म फल को त्याग कर सिर्फ कर्म के लिए कर्म करता है। वह सिर्फ देता है बदले में कुछ मांगता नहीं इसलिए वह दुःखों के बंधन में नहीं पड़ता। इस प्रकार कर्म योगी बार-बार के जन्म मरण के चक्र से भी मुक्त हो जाता है। अतः यह स्पष्ट है कि अपनी वर्तमान अवस्था का जिम्मेदार हम ही हैं; और जो कुछ हम होना चाहें उसकी शक्ति भी हम ही में है। यदि हमारी वर्तमान अवस्था हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है तो यह निश्चित है कि जो कुछ हम भविष्य में होना चाहते हैं, वह हमारे वर्तमान कार्यों द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है। अतएव हमें यह जान लेना आवश्यक है कि कर्म किस प्रकार किया जाएँ। संभव है, तुम कहो, 'काम करने की शैली जानने से क्या लाभ? संसार में प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी प्रकार से तो काम करता ही रहता है।' परंतु यह भी ध्यान रखना चाहिए की शक्तियों का निरर्थक क्षय भी कोई चीज होती है। गीता का कथन है, 'कर्मयोग का अर्थ है-कुशलता से अर्थात वैज्ञानिक प्रणाली से कर्म करना।' कर्मानुष्ठान की विधि ठीक-ठीक जानने से मनुष्य को श्रेष्ठ फल प्राप्त हो सकता है। केवल वही व्यक्ति सब की अपेक्षा उत्तम रूप से कार्य करता है, जो पूर्णतया निस्वार्थ है, जिसे ना तो धन की लालसा है, ना कीर्ति की और ना ही किसी अन्य वस्तु की ही। और मनुष्य जब ऐसा करने में समर्थ हो जाएगा तो वह भी एक बुद्ध बन जाएगा और उसके भीतर से ऐसी कार्य शक्ति प्रकट होगी जो संसार की अन्नस्या को संपूर्ण रूप से परिवर्तित कर सकती है। वस्तुतः ऐसा ही व्यक्ति कर्म योग के चरण आदर्श का एक ज्वलंत उदाहरण है।
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