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कौटिल्य अर्थशास्त्र- Kautilya Arthashastra (Ancient Indian Values ​​and Philosophy)

$39
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Specifications
Publisher: D. K. Printworld Pvt. Ltd.
Author , Sushim Dubey
Pages: 164
Cover: HARDCOVER
6.5x9.5 inch
Weight 450 gm
Edition: 2018
ISBN: 9788124609378
HCC942
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Book Description
पुस्तक परिचय
कौटिल्य अर्थशास्त्र प्राचीन भारतीय आर्थिक परम्परा का आधारभूत ग्रन्थ है। भारत का प्राचीन आर्थिक इतिहास सामाजिक संरचना, राजनीतिक मान्यताओं इस ग्रन्थ में जो प्रतिनिधिक वर्णन मिलता है. वह किसी भी अन्य ग्रन्थ में दुर्लभ है। सत्ता एवं शक्ति, न्याय एवं दण्डनीति, वार्ता एवं आन्वीक्षिकी, नगर-जनपद-ग्राम्य की संरचना से लेकर सुचारू अर्थव्यवस्था, स्वर्ण-नीति, मौद्रिक -नीति एवं लोक-कल्याणकारी तथा निष्टकण्टक राज आदि सिद्धान्त, कौटिल्य अर्थशास्त्र को विश्व के आर्थिक इतिहास में महत्वपूर्ण ग्रन्थ के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में विषय-वस्तु की गहनता एवं ऐतिहासिक कालक्रम में उनका इदम्प्रथमतया प्रणयन कौटिल्य को विश्व में अर्थशास्त्र का पुरोधा घोषित करते हैं।

प्रस्तुत ग्रन्थ प्राचीन भारतीय मूल्य एवं दर्शन शृंखला के द्वितीय भाग है। मनुस्मृति प्राचीन भारतीय धर्मशास्त्र परम्परा का आधारभूत ग्रन्थ है। भारत का प्राचीन धार्मिक इतिहास सामाजिक संरचना, राजनीतिक मान्यताओं इस ग्रन्थ में जो प्रतिनिधिक वर्णन मिलता है। मनुस्मृति मूल रूप से आध्यात्मिक मान्यता परक ग्रन्थ रहा, जिसमें कालक्रम से समाज-व्यवस्था, वर्णव्यवस्था एवं अनेकानेक बातें समाहित होती चली गई। तथापि मनुस्मृति की सर्वोपरिता आर्यावर्त में सहस्रों वर्ष तक निर्विवाद रही। धर्म, कर्म, कर्तव्य, सूतक, प्रायश्चित्त एवं संस्कार आदि के लिए आज भी स्रोत ग्रन्थ के रूप में मनुस्मृति संदर्भ ग्रन्थ है।

लेखक परिचय
ग्रन्थ के लेखक डॉ सुशिम दुबे वर्तमान में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् (मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार), नई दिल्ली में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में (2009) से कार्यरत् हैं। डॉ दुबे ने दर्शनशास्त्र में एम.ए. (1997) (तीन स्वर्ण पदकों के साथ). पी.एच.डी. (2003) एवं पोस्ट डॉक्टरल ICPR (2003 -05) अर्जित की हैं। डॉ दुबे योगकेन्द्र, रा.दु.वि.वि., जबलपुर (2006-07), मोररजी देसाई राष्ट्रिय योग संस्थान (MDNIY अन्तर्गतआयुष मंत्रालय), नई दिल्ली (2007-08) एवं पतंजलि योगपीठ (2008-09) में दर्शन-योग पर शोध एवं अध्यापन कार्य कर चुके हैं। आपकी प्रमुख पुस्तकों में A Survey on Study and Research in Philosophy in India in 5 Vols Set, published by Indian Council of Philosophical Research (under MHRD, Govt of India) 'भारतीय विश्वविद्यालयों में संस्कृत शोध-प्रबन्धों की निर्देशिका' (e-published by-Rashtriya Sanskrit Sansthan, under MHRD, Govt of India, 2009) एवं website www.bharatvidya.org आदि हैं।

आमुख
दर्शन तथा मूल्य किसी भी परम्परा के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं। प्रायः जो विशिष्टता किसी सभ्यता के द्वारा अपने उच्चतम विकास के क्रम में अनुभूत की जाती है वे ही उस सभ्यता के प्रज्ञ व्यक्तियों के द्वारा दर्शन में अभिव्यक्ति होती है। कालक्रम से दर्शन के ये ही मूल मन्तव्य, किसी विशेष समय में मानव मात्र के लिये महापुरुषों के द्वारा भी सन्देशित किये जाते रहे हैं। मानव समाज के लिये ये सदैव धारणीय, करणीय हों, इसी परिप्रेक्ष्य से इन्हें मूल्य के रूप में स्थिर करने का प्रयास किया जाता रहा है। दर्शन की व्युत्पत्ति 'दृश्यतेऽनेनेति दर्शनम्' से की गयी है। जिससे सरल अर्थ है - जिसके द्वारा देखा जाता है। किन्तु इसके अभिप्राय बहुआयामी हैं, यथा 'जिस दृष्टि के द्वारा देखा जाता है', 'जिस विशिष्ट अनुभूति युक्ति दृष्टि से सम्पन्न होकर देखने पर तत्त्व की उपलब्धि होती है', इस प्रकार दर्शन में केवल देखना ही नहीं बल्कि सतत् उस तत्त्व की अनुभूति परक दृष्टि भी समाहित है, अथवा दर्शन ही रहता है, दृष्टा एवं दृश्य की द्वयर्थकता समाप्त हो जाती है। इन्हीं मन्तव्यों को भारतीय परम्परा में आध्यात्मिकता से अभिव्यक्त किया गया है। अध्यात्म से सरल आशय है अधि + आत्म अर्थात् 'आत्म में अधि अधिष्ठित' या आत्म में अवस्थित। ऐसी स्थिति आत्म से इतर किसी अन्य वस्तु या चीज पर आश्रित नहीं होने के कारण पूर्णता की अवस्थिति कही जाती है। मनुस्मृति की आधारभूमि वस्तुतः भारतीय सनातन परम्परा की ही सुवासित अभिव्यक्ति है।

भूमिका
मनुस्मृति सभी स्मृतियों में प्राचीन तथा सर्वाधिक मान्य ग्रन्थ है। बारह अध्यायों में विभाजित मनुस्मृति की विषयवस्तु सृष्टि के उद्भव से प्रारम्भ करके धर्म के सभी महत्वपूर्ण पक्षों का सम्यक् तथा विस्तृत विवेचना करती है। मनुस्मृति अपनी व्याख्या में धर्म के चार मूलों या आधारों की विवेचना करती है। इन मूलों में वेद सर्वाधिक प्रमुख तथा महत्वपूर्ण हैं। मनुस्मृति भारतीय सभ्यता के मूल प्रदेश को व्याख्यायित करती है जो कि सरस्वती एवं दृषद्वती नदियों के मध्य में है। वस्तुतः इसी स्थल को ब्रह्मावर्त (आर्यावर्त) कहा गया है। इस ब्रह्मावर्त (आर्यावर्त) प्रदेश में परम्परा के क्रम से आया हुया आचार-व्यवहार ही मनुस्मृति में विवेचित है। परम्परा में पल्लवित इन रूढ़ विशिष्ट मूल्यों को विशिष्ट योग्यता उद्भावक होने से संस्कारों के रूप में वर्णित किया गया है। संस्कार का प्रमाणिक एवं विशिष्ट वर्णन, मनुस्मृति की विशेषता है। संस्कारों के क्रम में सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार उपनयन संस्कार है। उप (निकट) + नयन (ले जाना) अर्थात् विद्यारम्भ का संस्कार। मनुस्मृति में जिस विद्या का विवेचन है वह आध्यात्मिकी विद्या के ही सन्दर्भ में है। इसी ज्ञान के पास ले जाना उपनयन संस्कार का प्रमुख उद्देश्य है। इस प्रकार ब्रह्मावर्त प्रदेश में ब्रह्म-विद्या की ओर ले जाना (नयन) उपनयन है। आश्रमों के क्रम में भी प्रथम आश्रम 'ब्रह्मचर्य आश्रम' तथा व्यक्ति के लिये 'ब्रह्मचारी' शब्द प्रयुक्त हुए हैं।

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