कुछेक के कुचाल और क्षुद्र स्वार्थवश घोर संक्रमणकाल में पड़ी, बन्दी के कगार पर असहाय खड़ी 'बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्' के निदेशकीय पद-भार ग्रहण करते ही डॉ० जयकृष्ण मेहता ने पी०सी० (प्रेस कॉन्फ्रेन्स) बुलायी और पूर्व से स्वीकृत, किन्तु उपेक्षित पड़ीं कतिपय अतिमहत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपियों को, शीघ्रातिशीघ्र प्रकाशोन्मुख कर सुधी पाठकों के समक्ष लाने का संकल्प लिया । "अंगिका का भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन" सहित दस पाण्डुलिपियों के नाम प्रकाशनार्थ, सार्वजनिक किये गये ।
विडम्बना ही कही जायगी दशकों तक किसी ने भी इतनी महत्त्वपूर्ण पाण्डुलिपियों की सुधि नहीं ली जबकि डॉ० मेहता की अन्वेषी-दृष्टि, इस ओर आते-आते ही पड़ गयी । ऐसे में निस्सन्देह, डॉ॰ मेहता के उच्च दृष्टि-संदर्शन को सर्वशः महनीय ही माना जायगा जिनके अनुक्षण, अनुज्ञात्मक अनुदेश के सर्वदा अनुकूल बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् की गतिमत्ता, सकारात्मक हो गयी । इस प्रसंग में अनुसन्धान विभाग के वरिष्ठ एवम् अनुभवी पदाधिकारीगण सर्वश्री अर्जुन सिंह, अनिल कुमार झा, प्रियरंजन प्रसाद सिन्हा के कर्त्तव्य-बोध तथा भूमिका भी अत्यन्त श्लाघनीय कही जायगी जिनके श्रम को सार्थक करने में वर्त्तमान कार्यालय सचिव श्री ज्योतिशरण, लेखापाल श्री वासुदेव मिश्र के अतिरिक्त प्रकाशन-उपनिदेशक श्री सत्येन्द्र कुमार का भी योगदान है।
अनुसन्धान के ही पदाधिकारी सर्वश्री ध्रुव प्रसाद, नरेन्द्र कुमार सिंह की सप्रेरणा-सद्भावना को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता । अस्तु, अनुजवत् इन सभी के प्रति शिवकामनायें, परिषद् की ही (श्रीमती) विद्यावती के लिये भी ।
पदाधिकारियों-कर्मचारियों के अनुशासन-बद्ध समर्पण-भाव के बल पर डॉ॰ मेहता ने 'परिषद्' को पटरी पर लाकर साहित्य पुरखों की आत्मा को अवश्य ही तोष प्रदान किया है। निदेशक डॉ० मेहता, डी०डी०ओ० श्री विश्वनाथ प्रसाद तथा कार्यालय सचिव श्री ज्योतिशरण की समन्वित, सक्रियता से भी 'परिषद्' की जीवन्तता की पुनर्वापसी के सपने देखे जाने लगे थे ही ।
'अंगिका का भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन' की प्रकाशन-उत्कृष्टता को ध्येय में रख, रुचिशील, उदारमना डॉ० मेहता ने जिस त्वरा के साथ मुझमें भी सक्रियता संचारित की, दाबानुकूलित किया, आभार-प्रदर्शन हेतु वाग्मिता-दारिद्र्य के कारण वाग्बद्ध हूँ; कृतज्ञ भी ।
सत्यतः, मैं जितना शिथिल था, वे उतने ही थे- इस हेतु तत्पर । इसलिये, अङ्ग एवम् अंगिका समाज को भी उन्होंने अपने प्रति ऋणी बना लिया- सहजता से, सहृदयता से, सत्कीर्त्ति से ।
अपनी पूर्णता पर है - रचयिता, डॉ॰ पाण्डेय (परमानन्द) के कायिक-लोकान्तरण का दशक । आठ अप्रैल, दो हजार छह ईस्वी, अर्थात् चैत्र-दशमी, पुष्य नक्षत्र, उत्तरायण, ब्रह्म-वेला यानी सूर्योदय में सूर्यास्त । अपनी पत्नी, छोटे पुत्र, बड़े पौत्र से बात करते हुए हठात् असाधारण मुस्कुराना, फिर चिर चुप ! दुर्लभ सन्तों सा स्वर्गारोहण । महात्मा भीष्म ने इसी पुष्य के उत्तरायण-सूर्य की प्रतीक्षा की थी ।
साथ ही, उनकी अर्धांगिनी, श्रीमती पाण्डेय (वागीश्वरी) के भी कायिक-लोकान्तरण का वर्ष, पूर्णता पर है। तीन अप्रैल, दो हजार पन्द्रह, अर्थात् चैत्र पूर्णिमा, उत्तरा फाल्गुनी, सान्ध्य-वेला यानी चन्द्रोदय में चन्द्रास्त और वह भी चन्द्र ग्रहण से पूर्व ।
डॉ० पाण्डेय की सारस्वत-साधना में, स्वयं भी लेखन (वागीश्वरी एवम् वागेश नाम से भक्तिगीत लेखिका तथा क्रान्तिकारिणी) से सम्बद्ध श्रीमती पाण्डेय का अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था, विशेषतः -अंगिका के आलोक में ।
क्या ही अति दुर्लभ, देवोपम संयोग चैत्रदशमी, चैत्र पूर्णिमा ।
चैत्र में दोनों चिन्तामुक्त, चिता सजीं। भरे-पूरे परिवार में बोलती वाणी, औचक चिर विश्रान्ति पा गयी। वैसे, मेरे लिये अत्यन्त दुःखदायी दिन थे जब संगमरमरी सुन्दरता वाली काया, अपने कठोर कर द्वारा अग्नि को समर्पित की ।
इस मर्त्य-भुवन में बाह्य-चक्षु से ग्रन्थावलोकन का सुयोग तो उन्हें सुलभ न हो सका । परन्तु, दिव्यता प्राप्त चक्षुयुक्त आत्मा द्वय के तृप्त्यार्थ, परमपुनीत सारस्वत-तर्पणार्थ, मुझ अंकिचन को भी भागीदार बना लेने के लिये, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् के प्रति साष्टाङ्ग प्रणति, विशेष, अशेष श्रद्धा सहित ।
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