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लोरी गीता माई- Lori Geeta Mai (The Bhagavad Gita Translated into Hindi/Bhojpuri with Original Sanskrit Verses)

$28
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Specifications
Publisher: ASTHA PRAKASHAN MANDIR
Author Prafull Kumar, Vijay Laxmi
Language: Sanskrit Text With Bhojpuri Translation
Pages: 288
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 inch
Weight 380 gm
Edition: 2025
HCG589
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Book Description

भूमिका

श्रीमद्भगवद्गीता मूलतः संस्कृत में महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत का अभिन्न अंग है। यह भारतीय जीवन दर्शन का अमूल्य पूजनीय ग्रंथ है। इस अमूल्य ग्रंथ का भारत की और विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद, व्याख्या, टीका महान विद्वानों, नामी संत महात्माओं, दार्शनिकों द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है। यह ग्रन्थ न केवल भारत बल्कि वैश्विक पटल पर अपनी लोकप्रियता की छाप छोड़ चुका है।

हम दोनों ने गीता को भोजपुरी भाषा में भावानुवादित कर, उसका सार भाव अध्याय के अंत में लिखने का भरसक प्रयास किया है। अक्षरशः अनुवाद के बजाय श्लोक के भाव को भोजपुरी लोरी, गाना के रूप में सरल और आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया है, ताकि संस्कृत या खड़ी बोली में हिन्दी के कठिन शब्दों के भंवर में जन सामान्य पाठक न फँसे। हिन्दी में अनुवादित कई रचनाएँ सुलभ हैं पर हिन्दी के भी क्लिष्ट शब्दों व भावों से इसका अध्ययन व पाठन एक विशिष्ट उच्च शिक्षित वर्ग ही कर पाता है। अभी भी भारतीय जनमानस गीता ग्रंथ को, भाषा की दुरूहता के कारण अपने दिनचर्या में उपयोग नहीं कर पाता। गीता पूर्ण रूप से गूढ़ रहस्य से भरा है, जिसमें योग शास्त्र, ज्ञान, कर्म, भक्ति, ध्यान के समन्वय के साथ ईश्वर से साक्षात्कार के रास्ते बताये गये हैं। गृहस्थ जीवन के धर्म का निर्वाह करते हुए ब्राह्मी स्थिति कैसे पा सकते हैं, वर्णित अठारह अध्यायों के लगभग सात सौ श्लोकों में विस्तार से बताया गया है।

विगत वर्षों में सदी की भीषण महामारी कोविड-१९ ने विश्व की मानवता को झकझोर दिया, फलस्वरूप असंख्य लोग असमय काल कवलित हो गये।

ऐसे में हमारे देश ने गीता में सुझाई जीवन पद्धति का सहारा लेकर योग, प्राकृतिक, आयुर्वेदिक चिकित्सा, संतुलित जीवन चर्या, सकारात्मक सोच, सूर्य नमस्कार आदि प्राचीन नुस्खों का उपयोग कर, सीमित संसाधनों के बावजूद अन्य देशों की तुलना में, मानवीय क्षति कम होते हुए, विभीषिका पर विजय प्राप्त की। करोना महामारी की भीषण त्रासदी से उत्पन्न अवसाद, चिन्ता, अनवरत भय से ग्रस्त आर्त मन ने गीता पाठ में बार-बार रुचि दिखाई, जिज्ञासा बढ़ी, फिर भगवान द्वारा अध्याय 7-16 में सुनाई मीठी लोरी की याद आई-

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥

करेले सेवा हमार, चार तरह के पुण्यात्मा, हे भरतश्रेष्ठ अरजुन ।

दुखी मन, लालसा सीखे के, चाहे वाले धन, अवुरी ज्ञानीजन ॥७.१६ ॥

यानी अर्थार्थी, आर्त मन, जिज्ञासु व ज्ञानी जन जैसे चार प्रकार के भक्त भगवत भजन कर पाते हैं।

इसी क्रम में हम दोनों ने गीता का कई बार पाठ किया। बार-बार अध्ययन व मनन करने से जीवन दर्शन की गुत्थियों को समझने की उत्कंठा व उत्सुकता बनी रही, फिर भी मन नहीं भरा। जैसा कि १८-७६ में संजय ने धृतराष्ट्र को बताया कि परमपिता परमेश्वर कृष्ण द्वारा सुनाई गई सुमधुर संवाद सुनकर मन नही भरता। जितनी बार पढ़ा नये नये विचार आते गये, परिणाम स्वरूप आम बोलचाल की भाषा भोजपुरी में लिखने की प्रेरणा मिली।

प्रस्तुत है भगवत भक्तों के लिये लोरी गीता माई - भोजपुरी में। बचपन में हम सभी लोरी सुन कर बड़े हुए हैं, विशेषकर मां से। लोरी सुनकर रोता बिलखता व्याकुल बच्चा शांत व सकून पाकर सो जाता है। भगवान परम पिता के रूप में सदा अपने बच्चे तुल्य भक्तों का ध्यान रखते हैं। लोरी गीता माई में भगवान अपने प्रिय भक्त अर्जुन को, तब आध्यात्मिक लोरी सुना रहे हैं जब महाभारत जैसे महा विनाशकारी युद्ध में कौरवों और पांडवों की सेना आमने सामने डटी है। युद्ध के भयंकर कोलाहल व शोर में जब अर्जुन मोहग्रस्त हो, हताश, निराश, किम् कर्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं तब भगवान पुरुषोत्तम सारथी के रूप में मीठी आध्यात्मिक लोरी सुना रहे हैं ताकि उन्हें बेचैनी, घबराहट, चिंता, मोह, विषाद, विलाप से छुटकारा मिले, शांति मिले। भगवान तो जीव के लिए माता-पिता, भाई सखा हैं तभी हम उन्हें तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो, तुम्हीं हो बंधु, सखा तुम्हीं हो से पुकारते हैं।

भगवान हताशा से उबारते हुए अर्जुन को पूरे मानव जीवन दर्शन की लोरी सुनाते हैं और ज्ञान, कर्म, भक्ति योग के राह दिखाते हुए अध्यात्म की उच्चतम पराकाष्ठा ब्रह्मानंद की प्राप्ति तक पहुँचाते हैं। यहाँ अर्जुन नर के रूप में सामान्य आदमी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि नारायण के रूप में साक्षात कृष्ण भगवान। गीता में वर्णित यह लोरी लगभग पाँच हजार साल पूर्व सुनाई गयी है पर इसकी सार्थकता, प्रासंगिकता व उपयोगिता आज भी बराबर बनी हुई है। यह ग्रंथ मात्र मनीषियों, दार्शनिकों, विद्वानों, व विचारकों, चिन्तकों के बीच बौद्धिक चर्चा, परिचर्चा, गोष्ठियों, सभागारों तक सीमित न रहकर साधारण बहुजन में प्रचलित व सुग्राह्य हो, यह इस पुस्तक का ध्येय है, इसीलिए सरल से सरल आम बोलचाल की मृदुल भाषा भोजपुरी में लिखी गयी है। पाठकों की सुविधा के लिये भोजपुरी के शब्दों का हिन्दी में अर्थ, हरेक अध्याय के अंत में दर्शाया गया है।

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