पुस्तक परिचय
हिन्दी के छायावादी कवियों में महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कई दृष्टियों से विशेष महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में लेखन कार्य कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। उनका काव्य व्यक्तित्व और कृतित्व इतना विराट और गंभीर था जिससे यही लगता है कि उन्होंने जीवन को एक ही साथ अनेक स्तरों पर जोया। उनका व्यक्तित्व अतिशय विद्रोही और क्रांतिकारी तेवर से लैस है। हिन्दी काव्य क्षेत्र में निराला का पदार्पण मुक्त छन्द के साथ होता है जो एक ऐतिहासिक घटना मानी जाती है। उनके द्वारा रचित 'अनामिका' काव्य संग्रह में संगृहीत 'राम की शक्तिपूजा' अप्रतिम महाकाव्यात्मक कविता है। इसमें कवि का पौरुष और ओज चरमोत्कर्ष के साथ अभिव्यक्त हुआ है। 'दुख सबको मांजता है।' कुछ ऐसा ही निराला के साथ भी हुआ। नाटकीय गुणों से ओत-प्रोत होने के कारण यह और भी प्रभावपूर्ण हो उठी है। 'अन्याय जिधर, है उधर शक्ति' कहकर कवि निराला स्वयं अपने जीवन-सत्यों का ही उद्घाटन करते हैं। क्योंकि उनका वैयक्तिक जीवन और रचनात्मक जीवन दोनों ही संघर्षमय रहे हैं। वस्तुतः उनका व्यक्तित्व ही कृतित्व में ढलकर बाहर आया है। प्रस्तुत पुस्तक में निराला के व्यक्तिम और कृतित्व पर सम्यक् प्रकाश डाल 'राम की शक्तिपूजा' कविता का सरा सरस भाष्य भी प्रस्तुत करने का विन किया गया है।
लेखक परिचय
सम्पादक परिचय बी.एल. आर्य जन्म-06 जून, 1979 जन्म स्थान भाँजावास. कोटपूतली (जयपुर)। शिक्षा-एम.ए. (हिन्दी प्रथम श्रेणी) राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर। 'नेट' परीक्षा, यू.जी.सी., नई दिल्ली (दो बार उत्तीर्ण) 'स्लेट' परीक्षा, आर.पी.एस.सी., अजमेर (उत्तीर्ण) पी.एच.डी. (हिन्दी) अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) शोध विषय: "सांप्रदायिक समस्या और समकालीन हिन्दी उपन्यास (1980-2000)" विशेष-कक्षा 12 से एम.ए. हिन्दी (प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण) लेखन : विभिन्न पत्रिकाओं में लेख समीक्षा आदि प्रकाशित। रूचि क्षेत्र : नाटक, कविता और उपन्यास । सम्प्रति : प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, एस.एस. जैन सुबोध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जयपुर (राजस्थान)
भूमिका
हिन्दी साहित्य में विद्रोही और क्रांतिकारी तेवर से लैस अपराजेय महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का सम्पूर्ण जीवन संघर्षों एवं तनावों भरा रहा लेकिन कभी गिड़गिड़ाए नहीं वरन् पूरी ताकत के साथ उससे लड़े और जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहे। वे पूरे परिश्रम के साथ कविता-कर्म में प्रवृत्त होते थे। कविता लिखने का परिश्रम उनके मुख पर साफ झलक उठता था। रामविलास शर्मा लिखते हैं 'नारियल वाली गली में 'तुलसीदास' लिखते हुए मैंने उन्हें देखा है आठ-नौ बजे तक हीवेट रोड के पैरागॉन रेस्तराँ से चाय पीकर वह लौट आते थे। नीचे के कमरे में तीन-चार घंटों तक वह मोगल दलबल के जलदयान से युद्ध करते थे। बारह एक बजे अपने प्रयास के फलस्वरूप एक दो पने लिए हुए जब ऊपर आते थे, तब मालूम होता था, कोई मजदूर छह घंटे भट्टी के पास तपकर बाहर आया है। उनके चेहरे पर एक तनाव-सा होता था और आँखों में थकान के साथ संतोष की झलक भी।' इस प्रकार सचमुच काव्य-रचना उनके लिए एक घोर तपस्या थी। निरालाजी द्वारा प्रणीत 'राम की शक्तिपूजा' एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रबंधाभास प्रदीर्घ कविता है जो कवि के महाप्राणत्व को सिद्ध करती है। यह उस दौर की कविता है जब छायावाद अपने जीवन की अंतिम साँस ले रहा था। इसमें राम का मानवीय संशय, द्वन्द्व और अन्तर्बाह्य संघर्ष गहरी मार्मिकता के साथ व्यक्त हुआ है। यहाँ प्रकारान्तर से आधुनिक मानव का अन्तर्विरोध ही उभर कर बाहर आया है। राम की शक्तिपूजा' में निराला का अपना जीवन संघर्ष ही उभर कर सामने आया है चाहे उनका वैयक्तिक जीवन का संघर्ष रहा हो, चाहे रचनात्मक संघर्ष रहा हो। वस्तुतः 'राम की शक्तिपूजा' स्वयं कवि निराला की शक्तिपूजा है। शक्तिपूजा के प्रतीक निराला के जीवन सत्य का ही उद्घाटन करते हैं। अतः 'राम की शक्तिपूजा' के राम का व्यक्तित्व सभी युगों में प्रासंगिक रहेगा। मैं इस अवसर पर अपने परम पूजनीय पिता स्व. श्री फूलचन्द आर्य और ममतामयी माँ मेवा देवी के प्रति चिरकृतज्ञ हूँ जिनसे मुझे जीवन में निरन्तर संघर्षरत रहते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। वे मेरे लिए जीवानादर्श हैं। मैं अपने बड़े भाईसाहब श्री शेरसिंह आर्य के प्रति चिरकृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे हमेशा संघर्षों से जूझने की ताकत देकर समय-समय संबल प्रदान किया है। मैं उनके चिर-स्नेह का आकांक्षी हूँ। मैं अपनी जीवन-संगिनी 'संगीता आर्य' के प्रति अनुरागमय आभार महसूस करता हूँ जिन्होंने मेरे जीवन को एक नई दिशा दी। उन्हीं के त्याग एवं प्रदत्त दिशाबोध के कारण यह पुस्तक सजीव बन पायी है। अतः यह पुस्तक उन्हीं को समर्पित है। पुस्तक के स्वच्छ एवं समयबद्ध टंकण के लिए भाई मनोज कुमार शर्मा साधुवाद के पात्र हैं। अन्त में, मैं पुस्तक के प्रकाशक श्री रमेश वर्मा जी के प्रति विशेष आभार अनुभव करता हूँ जिन्होंने इस पुस्तक को बड़ी तत्परता और गहरी सुरुचि सम्पन्नता के साथ प्रकाशित कर आप तक पहुँचाने का श्रमसाध्य कार्य किया है। मैं आपके स्वस्थ जीवन एवं दीर्घायु की मंगल कामना करता हूँ।
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