भूमिका
महात्मा गाँधी जी ने जीवन और अभिव्यक्ति के हर क्षेत्र में अपनी ओर से एक नया आयाम जोडा है। जीवन के प्रत्येक पहलू पर उनका अपना स्वतंत्र चिंतन और लेखन मिलता है। विलायत के अध्ययन काल में भी गाँधी जी ने जो पढा उसका विशिष्ट मूल्य है। दक्षिण अफ्रीका में आंदोलन काल के दौरान उन्होंने हर मुद्दे का विचार किया है। अपने कारावास काल में अनेक ग्रंथों का स्वाध्याय किया। अनेक ग्रंथ लिखे, अनेकों का अनुवाद किया, बहुत बडी मात्रा में पत्र लेखन किया। यह विविध स्तरीय है, लगातार श्रेष्ठ ग्रंथों का अध्ययन किया, पत्रकारिता के माध्यम से जनता को सर्वोत्तम परसने का अखंड प्रयत्न किया। अनेक सम्मान्य व्यक्तियों से संवाद साधा, चरित्र चित्रण किया. अनेक स्थानों पर अपने सम्मान में हुए कार्यक्रमों के निमित्त अपने विचार प्रस्तुत किए, साहित्य सम्मेलनों के अध्यक्ष पद से विद्वत् जनों को संबोधित किया, रवींद्रनाथ जी टागोर को अगर कवि माना जाएँ तो गाँधी जी एक कविता थे, कला की बारीकियों एवं सूक्ष्मताओं के संबंध में अपने अधिकार का वर्णन करते हुए उन्होंने अपने आपको 'कला कोविद' कहा है। भाषा की गहरी और सूक्ष्म पकड गाँधी साहित्य की विशेषता मानी जा सकती है। उनके अंग्रेजी लेखन शैली को तो विद्वानों ने बाइबिल से तुलनीय माना है। गाँधी जी के बहुचर्चित ग्रंथ 'हिंद स्वराज' की भाषा शैली के बारे में विनोबा जी ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कभी सही कहा था कि वह औपनिषदिक शैली का लेखन है। गाँधी जी के साहित्य विचारों का अध्ययन अपने आपमें एक मूलभूत एवं अछूता विषय है। उनके सहित्य विषयक चिंतन के मूल में हमेशा की तरह भारतीय वैदिक परंपरा से ले कर गीता तक का विचार मिलता है। भारतीय संत साहित्य से भी वे गहराई तक प्रभावित दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं उनकी सर्वस्पर्शी प्रतिभा ने पाश्चात्य पंडितों से भी अपनी झोली भर ली है। प्लेटो के विचारों के साथ औचित्य सिद्धांत की मान्यता को उन्होंने सहज रूप में स्वीकार लिया है। अरस्तु, रस्किन, टॉलस्टॉय के साथ विचारक इमर्सन भी उन्हें मोहित करते हैं। उन्होंने कभी मगनलाल गाँधी को पत्र लिखा था कि इमर्सन की पढना भारतीय चिंतन को विदेशी पोशाक में पढ़ना है। गाँधी जी का मानना है कि साहित्य की कक्षा केवल उच्च विद्याविभूषित जनों तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए। वे चाहते हैं कि किसान और मजदूरों तक साहित्यकार की बात पहुँचे। भाषा, मातृभाषा तथा राष्ट्रभाषा के संबंध में गाँधी जी का स्वतंत्र चिंतन रहा है। भारतीय जनता को जोडने वाली कड़ी के रूप में वे हिंदी को मान्यता प्रदान करते हैं और उसके लिए आग्रही हैं। शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो इस बात के लिए वे बजिद हैं। वे इस देश की भाषाओं से भली भाँति परिचित थे। न केवल उत्तरी प्रदेश तक सीमित हिंदी या हिंदुस्तानी ही उनकी नजरों में थी वे दक्षिणी भाषाओं के भी गहरे जानकार हैं। गाँधी जी के साहित्य विषयक चिंतन का अध्ययन अनेक मनोरम तथ्यों की स्थापना करने में सक्षम है। उनका पत्र लेखन एक अनोखी धरोहर है। उनके लेखन का भाव अध्यापक की तरह आसान है। वे कठिन विषय को आसान शैली में समझाने के लिए कहते हैं। उनकी साहित्य विषयक चिंतन धारा गीता के शब्दों में 'लोकमहेश्वर' की आराधना प्रस्तुत करती है तो आचार्य रामचंद्र जी शुक्ल के शब्दों में 'सामाजिक मंगलेच्छा' का उद्गान करती है। गाँधी जी अनेकों के लिए साहित्य का विषय रहे। अनेकों के साहित्य के नायक रहे। उनके आंदोलन परवर्ती भारत के आंदोलनों की ऊर्जा बने। उनके आंदोलनों ने एक बृहत साहित्य परिवेश को आकार दिया। उनके चिंतन ने तीन पीढियों को समृद्ध किया। वे बराबर एक विचार क्रांति की मशाल उठाए कबीर की शैली में चलते और जलते हुए दिखाई देते हैं। उनका अपना जीवन और आंदोलन एक महाकाव्य का विषय है। उन्होंने जिस प्रकार से जीवन के लिए सत्य को आवश्यक माना उसी प्रकार से वे साहित्यकार की चेतना के मूल में भी सत्य की महिमा का गीत सुनाते हैं। साहित्य सत्य से सत्य तक की यात्रा है। उनकी यह दृढ धारणा रही है कि साहित्य की आत्मा सत्य और सत्य कथन ही है। सत्य की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने अहिंसा को आधार माना है। सत्य और अहिंसा उनके साहित्य विषयक चिंतन के दो प्रमुख पहलू हैं। गाँधी जी की भाषा में साहित्य 'धर्म और संस्कृति का सारांश' है।
लेखक परिचय
डॉ. विश्वास पाटील महात्मा गाँधी जी के जीवन, कार्य एवं दर्शन के मर्मज्ञ, ललित निबंधकार, सुवक्ता डॉ. विश्वास पाटील का जन्म 11 मार्च 1952 को नंदुरबार (महाराष्ट्र) में हुआ, उन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. तक शिक्षा प्राप्त की। वे शहादा महाविद्यालय में चालीस वर्षों तक प्राध्यापक रहे। स्नातकोत्तर प्राचार्य पद से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया। अब तक डॉ. विश्वास पाटील के गाँधी जी से संबद्ध ग्रंथ लेखन, संपादन तथा अनुवाद (गुजराती और मराठी से हिंदी अनुवाद) प्रकाशित है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-हिंदी पत्रकारिता और कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर', अमृत पुत्र साने गुरू जी, नारी तू नारायणी, 'हिंद स्वराज' के पंचप्राण, गाँधी कथा, कस्तूरी परिमल, गाँधी और युवा, गाँधी आहुति, गाँधी साधना, गाँधी : तपस्या आदि । डॉ. विश्वास पाटील को उनके साहित्यिक अवदान पर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश से अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए जिनमें तुलसी मानस प्रतिष्ठान, भोपाल का त्रिभुवन यादव स्मृति राष्ट्रीय पुरस्कार, जीवन कला मंदिर परभणी का 'ज्ञान विज्ञान' पुरस्कार, आचार्य विनोबा जी के स्वीय सचिव भाऊ दामोदर दास जी मुंदडा की स्मृति में प्रदत्त पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सौहार्द सम्मान पुरस्कार, महात्मा गाँधी सेवाव्रती पुरस्कार, पंडित किसनराव जी पाडळकर स्मृति पूर्णाचार्य पुरस्कार, महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा, पुणे का लक्ष्मीबाई कानुगो पुरस्कार, आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान पुरस्कार आदि प्रमुख हैं। डॉ. पाटील के रचना कर्म पर एक एम.फिल. तथा एक पी-एच.डी. स्तरीय शोध कार्य हैं। वे अनेक समितियों के पदाधिकारी एवं सदस्य हैं।
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