प्राक्कथन
दशम शताब्दी के पूर्वार्द्ध में कवि श्रीत्रिविक्रमभट्ट द्वारा रचित नलचम्पू (नल-दमयन्ती कथा) को चम्पूकाव्यों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सात उच्छ्वासों में विभक्त यह श्लेष प्रधान काव्य है। इसके जैसा उत्तम समङ्ग श्लेष का प्रयोग संस्कृत साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। नलचम्पू की कथा का आधार महाभारत प्रतीत होता है। नलदमयन्ती के वियोग के जिस दुःखद मोड़ पर दमयन्ती कथा का समापन नलचम्पू में होता है। उसके बाद पाठकों के मन में अनेंक जिज्ञासाएँ उत्पन्न हो जाती हैं कि आगे क्या हुआ? स्वयंवर का आयोजन हुआ या नहीं? यदि हुआ तो दमयन्ती ने इन्द्रादि लोकपालों में से किसका वरण किया? तदनन्तर राजा नल की मनोदशा कैसी है? इत्यादि प्रश्नों के उत्तर जानने की उत्कण्ठा सहृदय पाठकों के मन में जागृत होना स्वाभाविक है। अब प्रश्न उठता है कि कथा को मोड़ पर छोड़ना कवि को अभीष्ट था या किसी कारणवश आगे की कथा लिखी नहीं जा सकी यदि कवि ने जानबूझकर इस कथा को कथा समाप्ति का संकेत मात्र देकर छोड़ दिया तो इसका भी कोई बड़ा कारण होगा। इन्हीं प्रमुख प्रश्नों एवं मिश्र (चम्पू) काव्य से सम्बन्धित कुछ प्रश्नों के समाधान के लिए मेरी प्रवृत्ति इस पुस्तक को लिखने में हुई। नलचम्पू के अध्ययन एवं विश्लेषण से पता चलता है कि त्रिविक्रमभट्ट नवीन विचारधारा के कवि थे। संस्कृत साहित्य में इनसे पहले गद्य और पद्य काव्यों की रचना होती आ रही थी। उस परम्परा से अलग हटकर इन्होंने गद्य-पद्य मिश्रित चम्पूकाव्य का एक परिष्कृत एवं नवीन रुप प्रस्तुत किया। इसी प्रकार इनसे पूर्व संस्कृत वाङ्मय में केवल सुखान्त पद्धति की रचनाओं की परम्परा चली आ रही थी। इन्होंने उससे अलग हटकर दुःखान्त रचना का सूत्रपात किया और अपनी प्रवृत्तिगत नवीनता को दिखाने के लिए ग्रंथ को इस दुःखद मोड़ पर लाकर छोड़ दिया। त्रिविक्रम की इस दुःखान्तता में भी सुखान्तता के भाव समूल विद्यमान है क्योंकि त्याग में जो सुख है वह भोग में नहीं मिल सकता। अन्योन्य दर्शनोपरान्त नल-दमयन्ती का अनुराग पूर्ण सुसंस्कृत और दृढ़ हो गया है। नल के त्याग और ब्रह्मतेज के सामने लोकपालों की तेजस्विता मलिन पड़ गई है। दूसरी ओर दमयन्ती के सत्य धर्मनिष्ठ शरीर के सामने जाने का साहस देवताओं को नहीं है। नल-दमयन्ती परिणय का मार्ग सर्वथा विघ्नशून्य हो चूका है। इस प्रकार परिणय मार्ग की सफलता ने ग्रंथ की सुखान्तता को स्पष्ट कर दिया है।
लेखक परिचय
डॉ. नृपांशु लता 19 अप्रैल, 1989 ई. ग्रामरगाव-वास जिला-हजारीबाग, झारखण्ड शिक्षा : प्राथमिक शिक्षा हजारीबाग। उच्च प्राथमिक शिक्षा राम विद्यालय, दिग्वार दारू हजारीबाग। माध्यमिक शिक्षा महेशरा उच्च विद्यालय महेशरा दारू, हजारीबाग, वर्ष 2004 ई. 1 इण्टरमीडिएट कला संत कोलम्बा महाविद्यालय हजारीबाग, वर्ष 2006 ई.। पुरस्कृत: झारखण्ड प्रथम श्रेणी में दशम स्थान प्राप्त मेधा प्रमाण पत्र। स्नातक संस्कृत (प्रतिष्ठा) संत कोलम्बा महाविद्यालय, हजारीबाग, वर्ष 2000 ई. 1 पुरस्कृत प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त पुरस्कृत प्रमाण पत्र। स्नातकोत्तर संस्कृत, स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग, वर्ष 2011 ई.। पुरस्कृत प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान (गोल्ड मेडलीस्ट) बी.एड.. संत कोलम्बा महाविद्यालय, हजारीबाग, वर्ष 2013 ई. प्रथम श्रेणी यू.जी.सी. नेट जून 2014 ई. सी.बी.एस.सी. नेट दिसम्बर 2014 ई. पी-एच.डी. विनोबा भावे विश्वविद्यालय, अध्यापन: हजारीबाग, जनवरी 2022 ई. अतिथि प्राध्यापक संत कोलम्बा महाविद्यालय, हजारीबाग 06 जनवरी 2015 से 12 दिसम्बर 2018 तक झारखण्ड कर्मचारी आयोग द्वारा नियुक्ति-स्नातकोत्तर प्रशिक्षित शिक्षक (संस्कृत) के रूप में पदस्थापित परियोजना 2 उच्च विद्यालय, चरही, हजारीबाग-13 दिसम्बर 2018 से 03 जनवरी 2022 तक झारखण्ड लोक सेवा आयोग द्वारा नियुक्त सहायक प्राध्यापक 04 जनवरी 2022 से : रमा देवी बाजला महिला महाविद्यालय, देवघर, सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका, झारखण्ड, मे संस्कृत विभागाध्यक्ष के रूप में अध्यापनरत ।
पुस्तक परिचय
नलचम्पू के अध्ययन एवं विश्लेषण से पता चलता है कि त्रिविक्रमभट्ट नवीन विचारधारा के कवि थे। संस्कृत साहित्य में इनसे पहले गद्य और पद्य काव्यों की रचना होती आ रही थी। उस परम्परा से अलग हटकर इन्होंने गद्य-पद्य मिश्रित चम्पूकाव्य का एक परिष्कृत एवं नवीन रूप प्रस्तुत किया। इसी प्रकार इनसे पूर्व संस्कृत वाङ्मय में केवल सुखान्त पद्धति की रचनाओं की परम्परा चली आ रही थी। इन्होंने उससे अलग हटकर दुःखान्त रचना का सूत्रपात किया और अपनी प्रवृत्तिगत नवीनता को दिखाने के लिए ग्रंथ को इस दुःखद मोड़ पर लाकर छोड़ दिया। त्रिविक्रम की इस दुःखान्तता में भी सुखान्तता के भाव समूल विद्यमान है क्योंकि त्याग में जो सुख है वह भोग में नहीं मिल सकता। अन्योन्य दर्शनोपरान्त नल-दमयन्ती का अनुराग पूर्ण सुसंस्कृत और दृढ़ हो गया है। नल के त्याग और ब्रह्मतेज के सामने लोकपालों की तेजस्विता मलिन पड़ गई है। दूसरी और दमयन्ती के सत्य धर्मनिष्ठ शरीर के सामने जीने का साहस देवताओं को नहीं है। नल-दमयन्ती परिणय का मार्ग सर्वथा विघ्नशून्य हो चुका है। इस प्रकार परिणय मार्ग की सफलता ने ग्रंथ की सुखान्ता को स्पष्ट कर दिया है।
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