भाषा में मनुष्य की सर्जना विशिष्ट है, जहाँ भाषा एक सांस्कृतिक विश्व होती है। शनैः शनैः समुदायों में भाषा एक अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान का भी रूप लेती है, जिसमें भाषा के दो रूप अर्थात् 'लोक सम्प्रेषण' और 'संस्कृति रचना का आधार' शामिल होते हैं।
सम्प्रेषण और संस्कृति की ये शक्तियाँ, एक भाषा परम्परा के दो छोर हैं- सुदीर्घ काल में एक समृद्ध भाषा अपनी विशिष्ट ध्वनियाँ, मुद्राएँ, अर्थ और भंगिमाएँ विकसित कर लेती है। इसमें वह सारा समाज शामिल होता है, जो उस खास भाषा का उपयोग करता है। इस भाषिक समृद्धि में 'जीवन के अनुभव' और 'अनुभव के ज्ञान की भाषा' विकसित होना आरंभ हो जाती है। प्राचीन भाषाओं के पास कथन और अभिव्यक्तियों के अपने विशेष ढंग विकसित होने लगते हैं- जब हम किसी भाषा की कहावतें, मुहावरे, लोकोक्तियाँ आदि अध्ययन करते हैं, तब हमारे अवधान में 'जीवनानुभव के ज्ञान परम्परा की भाषिक अभिव्यक्तियाँ' और उनकी भंगिमाएँ ही होना चाहिये। वास्तव में यह भाषिक सम्पदा 'समूह अनुभव के जीवन के सार' और उसी के सूत्र हैं।
'सूत्र' की वास्तविक शक्ति उसके संक्षेपीकरण में होती है। यह अर्थों के भाषा में व्यक्त 'कूट पद' नहीं हैं, बल्कि वे संभव सामान्यता में बहुत प्रचलित और सुपरिचित अर्थों के भाषिक सूत्र जैसे होते हैं। उनके अर्थ खोलने और प्रकट करने किसी विशेष व्याख्या की आवश्यकता नहीं होती, वे समूह चित्त में पहिले ही सुपरिचित होते हैं- इसलिए एक विशेष स्थिति, घटना या दशा में ये भाषिक सूत्र पूरी स्थिति पर एक संक्षिप्त और सारपूर्ण टिप्पणी जैसे होते हैं- यहाँ भाषा बहुत अर्थवान और शक्तिशाली हो जाती है। किसी भाषा की सम्प्रेषण और रचना में अभिव्यक्ति की शक्ति को, यह सूत्र बहुत बढ़ा देते हैं। प्राचीन भाषाओं और लोक भाषाओं की शक्ति उनकी इन्हीं भाषिक सम्पदाओं में निहित होती है। अपेक्षाकृत नयी भाषाओं में, भाषिक सम्प्रेषण और अभिव्यक्तियों के सपाटपन और एकायामी होने का एक कारण यह भी है कि इनमें जीवन अनुभव की यह भाषा सम्पदा बहुत कम अथवा सीमित होती है।
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