'ताड़ का पेड़' मेरे आत्मव्यंजक निबन्धों का दूसरा संग्रह है। इसमें पचीस निबन्ध हैं जिन्हें समय-समय पर लिखा गया है। विषय आधुनिक जीवन जगत् से लिए गये हैं। मैंने जो सुन-पढ़कर किसी विषय के सम्बन्ध में विचार-मंथन किया है, उन्हें इन निबंधों में उतार दिया है। इसी से विषयी और विषय दोनों का संगम इन निबन्धों में मिल सकता है। दैनंदिन जीवन में अनेक प्रकार के लोगों से मुलाकात होती है। उनके विचारों से अवगत होना पड़ता है। नीर-क्षीर विवेक की जरूरत पड़ती है। अतः देखे, भोगे क्षणों और आप्त पुरुषों के अनुभव से जो कुछ मिला है, उसे इनमें संजो दिया गया है।
शोधक हृदय के उड़ान के लिए ये निबन्ध मेरे बड़े आत्मीय बने हैं क्योंकि उनका हर उड़ान मेरे लिए परितोष बनता है और तज्जनित आनंद का हेतु भी। स्वामी शिवानंद जी की बातें हर समय कौंध जाती हैं जिनके साथ चालीस वर्ष की अवधि सत्संग में बीती। उनकी बातें त्रिकालिक सत्य की भाँति हर क्षण समक्ष रहती हैं। यदि उनका उच्छिष्ट भी उसमें हो तो यह महाप्रसाद ही होगा।
प्रियवर हेमंत कुमार ने कठिन श्रम और उत्साह से इन्हें टंकित कर प्रेस के योग्य बनाया है, उन्हें कितना आसीसूँ। प्रिय डॉ० सन्तोष द्विवेदी ने मुद्रण पूर्व सुधार कर प्रकाशन के योग्य बनाया है, इनको बहुत-बहुत आशीष। परमप्रिय 'बच्चन' को इन्हें पढ़कर तोष होगा, ऐसा विश्वास है।
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