प्राक्कथन
महाभारत में राजनीति शास्त्र की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जैसे हाथी के पाँव में सब प्राणियों के पाँव आ जाते हैं, उसी प्रकार राजनीति शास्त्र में सब शास्त्र समा जाते हैं। इसका मूल कारण यह है कि राज्य हमारे समाज का एक महत्वपूर्ण संगठन है। पूर्व और पश्चिम के तत्व वेत्ता, विचारक और मनीषी अत्यन्त प्राचीन काल से इससे सम्बन्ध रखने वाले विभिन्न विषयों पर चिन्तन करते रहे हैं। इस पुस्तक में 'कुछ' प्रसिद्ध विचारकों के विचारों का अत्यन्त सरल, सरस, सुबोध और संक्षिप्त परिचय दिया गया है, ताकि यह पुस्तक सामान्य पाठकों के लिए तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों में इस विषय का अध्ययन करने वालों के लिए उपयोगी और लाभप्रद हो सके। इसमें निर्धारित सभी विचारकों के प्रमुख विचारों का बड़े रोचक और प्रामाणिक रूप में वर्णन किया गया है। इस पुस्तक में प्राचीन एवं मध्यकालीन विचारकों के राजनीतिक चिन्तन की सामान्य विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए पश्चिमी जगत् के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण विचारक प्लेटों के विचारों का वर्णन किया गया है। प्लेटों पश्चिम में सुव्यवस्थित राजनीतिक चिन्तन करने वाला पहला दार्शनिक था। 'रिपब्लिक' उसकी अमर कृति है। इसमें उसने एक आदर्श राज्य का चित्रण करते हुए दार्शनिकों द्वारा शासन करने के निराले सिद्धान्तों का, सम्पत्तिविषयक एवं परिवार विषयक साम्यवाद काय आदर्श राज्य की भौगोलिक स्थिति और जनसंख्या तथा विवाह और परिवार-विषयक व्यवस्था, शिक्षा पद्धति तथा आदर्श राज्य के मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। यहाँ इन सबका संक्षिप्त विवेचन अत्यंत सुबोध रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्लेटो के बाद प्लेटो के बाद उसके शिष्य अरस्तु की सुप्रसिद्ध रचना 'पॉलिटिक्स' के आधार पर अरस्तु के प्रमुख विचारों-राज्य के स्वरूप, दास प्रथा, सम्पत्ति और परिवार विषयक विचार, शिक्षा-पद्धति, आदर्श राज्य आदि पर प्रकाश डाला गया है। पश्चिमी जगत् में मध्ययुग के राजनीतिक चिन्तन की प्रमुख विशेषताओं का स्वरूप स्पष्ट करते हुए धर्म और राज्य के संघर्ष का विवेचन किया गया है तथा यूरोप के शंकराचार्य-सन्त थामस एक्विनास के राज्य विषयक, कानून और न्याय सम्बन्धी विचारों का प्रतिपादन करने के बाद, मध्य युग के ही सिसरो, संत अगस्टाइन तथा मार्सिलियो ऑफ पाडुवा के जीवन, रचनाओं और राज्य एवं धर्म सम्बन्धी विचारों का सुस्पष्ट प्रतिपादन किया गया है
लेखक परिचय
शैक्षणिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका का निर्वहन करने वाली, राजनीतिक चिंतक के रूप में चर्चित, प्रगतिशील विचारों की संवाहक प्रोफेसर शिल्पा त्रिपाठी का जन्म काशी की पावन धरती पर हुआ। इनकी शिक्षा दीक्षा बी.एच.यू. वाराणसी में ही संपन्न हुई। 1992 में पी-एच.डी. की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात, वे सतत शैक्षणिक संस्थाओं में अपना सम्यक योगदान प्रदान करती रही। 2002 से अद्यतन वे दयानंद एंग्लो वैदिक महाविद्यालय में आचार्य के पद पर कार्यरत हैं। उनके 50 से अधिक अनुसंधान पत्रक प्रतिष्ठित अनुसंधान पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने राज्य व राष्ट्रीय स्तर की अनेक संपोहियों व कार्यशालाओं एवं परीक्षाओं का आयोजन किया है। इसके अतिरिक्त प्रो. त्रिपाठी ने अनेक संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, अभिनव कार्यक्रमों, पुनश्वर्या कार्यक्रमों, चयन समितियों, निरीक्षण मंडलियों, वैधानिक निकायों आदि में विशेषज्ञ के रूप में प्रचुरता से प्रतिभाग किया है। वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के आजमगढ़ केंद्र की समन्वयक भी हैं। शिक्षण करने तथा अनुसंधान कार्य को करने-कराने व परामर्श-निर्देशन देने का उनका दीर्घ अनुभव है। तीन दशकों से अधिक के अपने शिक्षण व अनुसंधान तथा प्रशासनिक कार्य के दौरान अर्जित विविधतापूर्ण अनुभवों के आधार पर उन्होंने इस पुस्तक की रचना की है एवं उदाहरणों उद्धरण व आलेखों से इसे अधिकाधिक समृद्ध बनाने का प्रबास किया है।
पुस्तक परिचय
राजनीतिक दर्शन के इतिहास में प्लेटो की रिपब्लिक से लेकर जॉन रॉल्स की ए थ्योरी ऑफ जस्टिस तक, दर्शन के कई महानतम् और सबसे व्यापक रूप से अध्ययन किए गए कार्य शामिल हैं। इस पुस्तक में हम निर्विवाद रूप से कतिपय महान विचारकों के कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इस पुस्तक की सचसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें ऐसे विचार शामिल हैं जिनकी रचना के मूल संदभों की निरंतर प्रासंगिकता है। यह पुस्तक इस विश्वास के साथ लिखी गई है कि दर्शनशाख के इतिहास का अध्ययन अप्रचलित विचारों के एक संग्रहालय की यात्रा जैसा नहीं होना चाहिए, बल्कि अतीत के महान विचारकों के विचारों के साथ एक चुनौतीपूर्ण और स्फूर्तिदायक जुड़ाव के साथ किया जाना चाहिए।
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