प्रपद्यवाद क्या है?
'तारसप्तक' के प्रकाशन के साथ ही हिन्दी काव्यधारा में एक प्रकार की हलचल मच गयी । 'तारसप्तक' की कविताओं और उनकी शैली में लिखी जानेवाली बाद की कविताओं के लिए मुख्य रूप से छायावादी आलोचकों ने 'प्रयोगवाद' की संज्ञा प्रदान की। इसके पीछे 'तारसप्तक' के संयोजक और संपादक अज्ञेय की टिप्पणी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'तारसप्तक' में संकलित कवि 'प्रयोग' कर रहे हैं, राहों का अन्वेषण कर रहे है'। इस संकलन के अनेक कवियों ने अपने वक्तव्यों में प्रयोग शब्द का उल्लेख किया था । इसमे प्रयोग के नाम पर की गयी कविताएँ शिल्प एवं वस्तु दोनों ही दृष्टियों से परंपरित हिन्दी कविताओं से भिन्न थीं तथा इनमें विद्रोह की भावना भी परिलक्षित होती थी। इसलिए आलोचकों ने इसकी विशिष्ट पहचान के लिए तथा अपनी सुविधा के लिए इस काव्यधारा का नाम 'प्रयोगवाद' रख दिया और बाद में यही नाम प्रचलित हो गया। नये कवि, खासकर उनके तथाकथित प्रधान प्रवर्तक तथा पुरोहित अज्ञेय इस संज्ञा से संतुष्ट नहीं हुए । वे अपने नवीन प्रयोगों को किसी अभिधेयविशेष की संकुचित सीमा में निबद्ध नहीं करना चाहते थे, यही कारण है कि 'दूसरा सप्तक' की भूमिका में अज्ञेय ने 'प्रयोग' शब्द का प्रतिवाद किया और कहा कि प्रयोग अपने आप में इष्ट या साध्य नहीं है, वह साधन है और 'व्यक्ति सत्य' को 'व्यापक सत्य' बनाने के लिए तथा भाषा में अधिक सारगर्भित अर्थ भरने के लिए नियोजित किया जा रहा है। अतएव 'प्रयोग' का कोई वाद नहीं है ।
अज्ञेय की इस सफाई में स्पष्ट रूप से दुर्बलता की गंध आ रही थी इसलिए बिहार के तीन नये कवियों-नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार और नरेश ने मिलकर अज्ञेय द्वारा प्रयोगवाद संज्ञा के प्रतिवाद का विरोध किया और प्रयोगवाद की सार्थकता का समर्थन किया। इनका स्पष्ट कथन था कि सप्तकों में जिस काव्य की सैद्धांतिक व्याख्या हुई, वह 'प्रयोगशील' की व्याख्या थी, 'प्रयोगवाद' की नहीं। हिन्दी के समीक्षकों ने अज्ञेय की उपर्युक्त व्याख्या को 'प्रयोगवाद' की व्याख्या मान लिया । अतः इन तीन कवियो ने विशुद्ध प्रयोगवाद की आत्मा की रक्षा के निमित्त, नरेश द्वारा संपादित 'प्रकाश' नामक पत्त्र में सन् 1952 में प्रयोग-दश-सूत्त्री प्रकाशित की, जिसमें पहली बार प्रपद्यवाद को प्रयोगशीलता से भिन्न करके देखा गया। इन्होंने नये काव्य के सम्पूर्ण दायित्व को स्वीकार किया । इन्होंने अपने वाद के लिए 'प्रपद्यवाद' की संज्ञा रखी और नाम संकेत के लिए 'नकेन' का अभिधेय स्वीकार किया । 'नकेन' स्पष्ट रूप से प्रपद्यवादी कवियों के नामों के प्रथमाक्षरों का समाहार है। हिन्दी के आलोचकों ने इसी नाम संकेत को 'नकेनवाद' की संज्ञा प्रदान कर दी। लेकिन हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि प्रयोगवादी काव्यधारा के लिए इन कवियों ने जिस अभिधेय को स्वीकार किया है वह 'प्रपद्यवाद' है, जो प्रयोगवादी कविताओं के लिए एक संक्षिप्त और समाहार रूप है। 'प्रकाश' में प्रकाशित 'प्रयोग-दश-सूत्त्री' को इन कवियों ने प्रयोगवाद के घोषणा-पत्त्र का प्रारूप कहा है। दश-सूत्र निम्नलिखित हैं-
1. प्रयोगवाद भाव और व्यंजना का स्थापत्य है ।
2. प्रयोगवाद सर्वतंत्र-स्वतंत्र है, उसके लिए शास्त्र या दल निर्धारित नियम अनुपयुक्त है ।
3. प्रयोगवाद महान पूर्व व्यक्तियों की परिपाटियों को भी निष्प्राण मानता है।
4. प्रयोगवाद दूसरों के अनुकरण की तरह अपना अनुकरण भी वर्जित समझता है ।
5. प्रयोगवाद को मुक्त काव्य की नहीं, स्वच्छंद काव्य की स्थिति अभीष्ट है।
6. प्रयोगवाद प्रयोग को साधन मानता है, प्रयोगवादी साध्य ।
7. प्रयोगवाद की दृक्वाक्यपदीय प्रणाली है ।
8. प्रयोगवाद के लिए जीवन और कोष कच्चे माल की खान है ।
9. प्रयोगवाद प्रयुक्त प्रत्येक शब्द और छंद का स्वयं निर्माता है ।
10. प्रयोगवाद दृष्टिकोण का अनुसंधान है ।
प्रयोगवाद विशेष अथवा प्रपद्यवाद के दो नये सूत्र सन् 1954 ई. में प्रस्तुत किए गए-
11. प्रयोगवाद मानता है कि पद्य में उत्कृष्ट केन्द्रण होता है और यही गद्य और पद्म में अन्तर है।
12. प्रपद्यवाद मानता है कि चीजों का एकमात्र सही नाम होता है ।
उपर्युक्त सूत्रों से हम निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रपद्यवाद प्रयोग का दर्शन है, क्योंकि वह प्रयोग को साध्य मानता है और भाव तथा भाषा विचार तथा अभिव्यक्ति, आवेश तथा आत्मप्रेषण, तत्त्व तथा रूप-सभी में प्रयोग को आवश्यक समझता है। उसके अनुसार कविता न तो भावों विचारों अथवा दर्शनों में लिखी जाती है और न छन्दों, अलंकारों इत्यादि से ही, अपितु वह शब्दों में लिखी जाती है। प्रपद्यवाद मानता है कि कविता की वास्तविक प्रेरणा वस्तुस्थिति से ही मिलती है। वस्तु द्रष्टा के भीतर भाव-छवियाँ उत्पन्न करती है। इन छवियों के साथ द्रष्टा की असंगतियाँ मिलकर एक दृष्टि-बिन्दु उत्पन्न करती हैं और जब उस दृष्टि-बिन्दु से कवि वस्तु को देखता है, तब वह शक्ति के एक नए संश्लेषण के रूप में दिखाई पड़ती है। इस प्रकार कविता में सदा ही पुनर्निर्माण हुआ करता है ।
बाद में प्रकाशित नकेन-2 (प्रकाशन वर्ष 1981 प्रथम संस्करण) में प्रपद्यवाद के घोषणा-पत्र का प्रारूप (प्रपद्य अष्टादश सूत्री) प्रकाशित हुआ है । पूर्व-प्रकाशित 12 सूत्रों के अतिरिक्त इनमें छह सूत्र और जोड़े गये हैं-
13. प्रपद्यवाद आयाम की खोज है और उससे अभिनिष्क्रमण भी ठीक वैसे जैसे वह भाव और व्यंजना का स्थापत्य है और उससे अभिनिष्क्रमण भी ।
14. प्रपद्यवाद चित्रेतना है ।
15. प्रपद्यवाद मिथक का संयोजक नहीं, स्रष्टा है ।
16. प्रपद्यवाद बिम्ब का काव्य नहीं, काव्य का बिम्ब है।
17. प्रपद्यवाद सम्पूर्ण अनुभव है ।
18. प्रपद्यवाद अभिव्यक्त काव्य-रुचि है।
प्रपद्यवाद तरह-तरह से वस्तु-संश्लेष को देखता है और उसे नयी संगतियों में देख सकने के कारण ही प्रपद्यवादी कवि अपने आधार के लिए नैतिक स्वीकृति पाता है। स्वीकृत संगतियाँ व्यवहार में घिस पिट जाने के कारण व्यंजक नहीं होती। चूँकि वे स्वीकृत और नित्य अनुभूति होती हैं, इसलिए नयी संगतियों की जटिलताओं को शब्दों में निर्णीत करते चलना प्रपद्यवाद का दृष्टिकोण होता है ।
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