भूमिका
इस समय भारतवर्ष में अनेक प्रकार के रीति-रिवाज रूढ़ियों के रूप में प्रचलित हो रहे हैं। हमारे पूर्वपुरुषों ने देश, काल और परिस्थिति के अनुसार जिन्हें उपयोगी समझकर प्रचलित किया था, आज वे विकृत रूप में पालन किये जा रहे हैं। हमारे देशवासियों में यह एक विशेषता है कि वे पुरानी बातों को बड़ी श्रद्धा और तत्परता से पालन करते हैं। पुरुष-समाज की अपेक्षा स्त्री-समाज के अन्तःकरण में यह बात विशेषतया सुदृढ़ हो गई है कि हर बात में पुरानी प्रथाओं का पालन करना ही परम धर्म है। इसी विचार को सम्मुख रखकर सद्गृहस्थों की स्त्रियाँ पुरानी रीतियों का पालन करती हैं। मैं इस बात की कदापि पक्षपातिनी नहीं हूँ कि पुरानी सब बातों या रीतियों को छोड़कर नवीन का ही अवलम्बन किया जाय। पर मैं इस पक्ष में तो अवश्य हूँ कि जिन रीतियों का पालन किया जाय, उनके कारण, महत्त्व और हानि-लाभ को पहले, खूब समझ लिया जाय। इससे करनेवाले को सन्तोष होता है, उनकी विशेष उपयोगिता से वह लाभ उठा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर दूसरों को उनका महत्त्व समझा सकता है। आजकल गृहस्थों की स्त्रियाँ जिन अनेक रीति-रिवाजों का पालन करती हैं, वह केवल अन्धविश्वास के कारण ही। अनेक बार कई गृहदेवियों से यह पूछा गया कि "अमुक रूढ़ि का पालन आप क्यों करती हैं, अमुक क्रिया करने का क्या फल है, इससे क्या लाभ है, यह क्यों किया जाता है, इसे न करने से क्या हानि है इत्यादि"; परन्तु शोक के साथ लिखना पड़ता है कि सदा यही उत्तर मिला कि "हम इनका कुछ भी कारण नहीं जानतीं। बहुत दिनों से यह प्रथा चली आई है। इससे हम भी इसका पालन करती हैं, क्योंकि बड़ों की चाल को छोड़ना पाप है, इत्यादि।" यह उत्तर सुनकर मन में बड़ा असन्तोष हुआ। साथ ही यह विचार भी उत्पन्न हुआ कि इस समय की सब प्रचलित रूढ़ियों पर प्रश्नोत्तर के रूप में एक निबन्ध लिखकर किसी स्त्री-उपयोगी पत्रिका में छपवा दिया जाय। इसी विचार को कार्यरूप में परिणत करने के लिए प्रयाग से प्रकाशित होनेवाली 'गृहलक्ष्मी' नामक मासिक पत्रिका में इस लेख-माला को प्रकाशित करना आरम्भ किया। उस समय यही अनुमान था कि 3-4 अंकों में यह लेखमाला समाप्त हो जायगी; परन्तु विचार करने पर अनेक नये प्रश्न उत्पन्न होते गये, जिनका उत्तर लिखा तो एक छोटी-सी पुस्तक तैयार हो गई। तब इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का विचार हुआ। अनेक प्रकार के रीति-रिवाजों को, जिनका मुझे ज्ञान था, इसमें लिखने और उनको स्पष्ट सुबोध करके समझाने की भरसक चेष्टा की है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य, भोजन और विज्ञान-सम्बन्धी अनेक प्रश्नों को उपयोगी और ज्ञातव्य समझकर इसमें जोड़ दिया है। यदि स्त्री-समाज का इस पुस्तक से कुछ भी ज्ञान बढ़ा और मनोरंजन हुआ, तो इन पंक्तियों की लेखिका अपने परिश्रम को सफल समझेगी। इस पुस्तक में भाषा, विषय-ज्ञान और लेखन-शैली-सम्बन्धी अनेक त्रुटियाँ रह गई होंगी, जिनके लिये यह अल्पज्ञ लेखिका क्षमा चाहती है और पाठिकाओं से केवल विषय की ओर ध्यान देने का साग्रह, सादर और नम्र निवेदन करती है। बड़ौदा निवासी पं. आत्मारामजी राजरत्न, हृषीकेश आयुर्वेद विद्यालय के अध्यापक पं. धर्मानन्द आयुर्वेदाचार्य तथा पं. बालकरामजी शुक्ल आयुर्विज्ञानाचार्य तथा तुलसीपुर के पं. भैरवदत्त जी ने इस पुस्तक का निरीक्षण और संशोधन किया है और इसे प्रकाशित कराने को उत्साहित किया है। अतः उनकी इस कृपा के लिए मैं उक्त महानुभावों की बड़ी कृतज्ञ हूँ।
पुस्तक परिचय
पुरुष-समाज की अपेक्षा स्त्री-समाज के अन्तःकरण में यह बात विशेषतया सुदृढ़ हो गई है कि हर बात में पुरानी प्रथाओं का पालन करना ही परम धर्म है। इसी विचार को सम्मुख रखकर सद्गृहस्थों की स्त्रियाँ पुरानी रीतियों का पालन करती हैं। मैं इस बात की कदापि पक्षपातिनी नहीं हूँ कि पुरानी सब बातों या रीतियों को छोड़कर नवीन का ही अवलम्बन किया जाय। पर मैं इस पक्ष में तो अवश्य हूँ कि जिन रीतियों का पालन किया जाय, उनके कारण, महत्त्व और हानि-लाभ को पहले, खूब समझ लिया जाय। इससे करनेवाले को सन्तोष होता है, उनकी विशेष उपयोगिता से वह लाभ उठा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर दूसरों को उनका महत्त्व समझा सकता है। आजकल गृहस्थों की स्त्रियाँ जिन अनेक रीति-रिवाजों का पालन करती हैं, वह केवल अन्धविश्वास के कारण ही। अनेक बार कई गृहदेवियों से यह पूछा गया कि "अमुक रूढ़ि का पालन आप क्यों करती हैं, अमुक क्रिया करने का क्या फल है, इससे क्या लाभ है, यह क्यों किया जाता है, इसे न करने से क्या हानि है इत्यादि"; परन्तु शोक के साथ लिखना पड़ता है कि सदा यही उत्तर मिला कि "हम इनका कुछ भी कारण नहीं जानतीं। बहुत दिनों से यह प्रथा चली आई है। इससे हम भी इसका पालन करती हैं, क्योंकि बड़ों की चाल को छोड़ना पाप है, इत्यादि।" यह उत्तर सुनकर मन में बड़ा असन्तोष हुआ। साथ ही यह विचार भी उत्पन्न हुआ कि इस समय की सब प्रचलित रूढ़ियों पर प्रश्नोत्तर के रूप में एक निबन्ध लिखकर किसी स्त्री-उपयोगी पत्रिका में छपवा दिया जाय। इसी विचार को कार्यरूप में परिणत करने के लिए प्रयाग से प्रकाशित होनेवाली 'गृहलक्ष्मी' नामक मासिक पत्रिका में इस लेख-माला को प्रकाशित करना आरम्भ किया। उस समय यही अनुमान था कि 3-4 अंकों में यह लेखमाला समाप्त हो जायगी; परन्तु विचार करने पर अनेक नये प्रश्न उत्पन्न होते गये, जिनका उत्तर लिखा तो एक छोटी-सी पुस्तक तैयार हो गई। तब इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का विचार हुआ। अनेक प्रकार के रीति-रिवाजों को, जिनका मुझे ज्ञान था, इसमें लिखने और उनको स्पष्ट सुबोध करके समझाने की भरसक चेष्टा की है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य, भोजन और विज्ञान-सम्बन्धी अनेक प्रश्नों को उपयोगी और ज्ञातव्य समझकर इसमें जोड़ दिया है। यदि स्त्री-समाज का इस पुस्तक से कुछ भी ज्ञान बढ़ा और मनोरंजन हुआ, तो इन पंक्तियों की लेखिका अपने परिश्रम को सफल समझेगी।
Hindu (हिंदू धर्म) (14040)
Tantra (तन्त्र) (1046)
Vedas (वेद) (733)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2138)
Chaukhamba | चौखंबा (3455)
Jyotish (ज्योतिष) (1636)
Yoga (योग) (1209)
Ramayana (रामायण) (1311)
Gita Press (गीता प्रेस) (714)
Sahitya (साहित्य) (25423)
History (इतिहास) (9382)
Philosophy (दर्शन) (3706)
Santvani (सन्त वाणी) (2598)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist