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राजस्थान के लोक नृत्य: Rajasthan's Folk Dance (An Old and Rare Book)

$39
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Specifications
Publisher: North Central Zone Cultural Centre, Allahabad
Author Shakuntala Bapna
Language: Hindi
Pages: 190 (B/W Illustrations)
Cover: HARDCOVER
10.00x7.5 inch
Weight 640 gm
Edition: 1989
HCC544
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Book Description
प्रस्तावना

नृत्य में मेरी बचपन से ही रुचि रही है। 1974 में जयपुर के श्रुति मंडल की विख्यात नृत्य रचना "धरती धोरां री" में नृत्यकार के रूप में मैंने भाग लेना आरम्भ किया। 1977 में शिकागो विश्वविद्यालय की अध्येता जोन अर्डमैन अपने शोध कार्य के लिए जयपुर आईं। उनका विषय था, "भारतीय समाज में संगीत राजस्थान में संरक्षण और कलाकार'। संयोग से श्रीमती अर्डमैन ने धरती घोरां री" नृत्य रचना और उसके रचनाकार को अपना अध्ययन का भाग बनाया। अमेरिका में राजस्थान के लिए विशेषज्ञ जानी गई श्रीमती अर्डमैन के शोध कार्य की पद्धति और उनके राजस्थान के लोकनृत्यों के अध्ययन में जिज्ञासा ने मुझे इस ओर प्रेरित किया। इस नृत्य रचना के रचनाकार राजस्थान की संस्कृति के अध्येता, विख्यात छाया चित्रकार श्री कौशल भार्गव ने प्रस्तुतीकरण का मौलिक और अत्यन्त सफल प्रयोग किया था। इस प्रस्तुति ने जहाँ हज़ारों दर्शकों को प्रभावित किया वहीं उसमें भाग लेने वाले कलाकारों में राजस्थान की सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जिज्ञासा पैदा की और तभी से मैंने लोक नृत्यों को निकट से और गम्भीरता से देखना प्रारम्भ किया। इस नृत्य रचना के साथ राजस्थान के अनेक अंचलों में जाकर कार्यक्रम देने के साथ ही इस प्रदेश की संस्कृति, विविधता और जनजीवन ने मेरे मन में एक उत्कंठा पैदा कर दी कि राजस्थान में बिखरे संस्कृति के रंगों को नज़दीक से देखा जाये ।

आखिर यह उत्कंठा क्यों? यही जिज्ञासा मेरे शोध की प्रेरक बनी। इसी बीच राजस्थान के अनेक मेलों में जाने का अवसर मिला और इन लोकनृत्यों की प्रेरक उस जीवन पद्धति को समझने का अवसर मिला। राजस्थान के जन जीवन और उसके उल्लास के वे क्षण जब मानव हृदय का आनन्द अभिव्यक्ति होता है, का अध्ययन करने का मैंने निर्णय किया। इस अध्ययन के लिए मुझे लोकनृत्य सबसे मुखर अभिव्यक्त लगी। इसमें मानव सवेदनाएँ स्पष्ट हो जाती हैं और आईने की तरह जीवन का प्रतिबिम्ब सामने आ जाता है। यही निश्चय कर मैंने राजस्थान के लोकनृत्यों पर शोध कार्य किया ।

राजस्थान के लोकनृत्यों पर यह अध्ययन अपने ढंग का मौलिक है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन को मूलतः मैंने राजस्थान विश्वविद्यालय की पी० एच० डी० उपाधि के लिए शोध प्रबन्ध के रूप में तैयार किया था। राजस्थान विश्वविद्यालय के परीक्षकों ने मेरे शोध प्रबन्ध "राजस्थान के लोकनृत्य" को प्रकाशित करने के लिए विशेष रूप से योग्य पाया था। पूर्व लिखित साहित्य के अभाव में मुझे क्षेत्र-कार्य (फील्ड वर्क) पर ही निर्भर रहना था। लोक नृत्य और संगीत मेले और त्योहारों पर ही अधिक देखने को मिलते हैं। अतः मैंने इन अवसरों के अनुसार ही भ्रमण किया।

लोक नृत्यों को मैंने जीवन पद्धति को माध्यम माना है। अतः अपने कार्य के लिए मैंने राजस्थान के उन्हीं क्षेत्रों और जातियों को चुना है जो आधुनिक खिचड़ी सभ्यता से अछूते हैं और जिन पर अपनी परम्पराओं का स्पष्ट प्रभाव है, जो विकास की सहज और निरन्तर प्रक्रिया में बह रहे हैं। अनुभवों और अनुभूतियों के आधार पर जो जीवन पद्धति प्रवाहित होती है वही जीवन्त होती है और वही चिरजीवी भी हो जाती है। इस चिन्तन से मुझे एक अत्यन्त रोचक किन्तु महत्वपूर्ण जानकारी मिली। इस पक्ष का अध्ययन शायद यह पहला ही हो अतः केवल इगित मात्र है। मेरे अन्तिम अध्याय में इसी पक्ष का विवेचन है। मेरा यह निष्कर्ष है कि लोक नृत्य जीवन का अनिवार्य अंग है। यही व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य को संतुलित रखता है।

उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक श्री हृदय नारायण श्रीवास्तव की प्रेरणा से इस शोध को पुस्तक के रूप में (नये कलेवर, नये चित्रों और नये ढंग से) पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

इस विषय को सात अध्यायों में विभक्त किया गया है। पहले अध्याय में ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि एवं व्याख्यायें और दूसरे में राजस्थान के भौगोलिक और सामाजिक सन्दर्भ का विवेचन किया है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जहाँ परम्परा का भान कराती है वहीं विकास के प्रभाव को प्रभावित करने वाले तत्व, भौगोलिक स्थिति और सामाजिक आस्थाओं की सूचना भी देती है। तीसरे, चौथे और पाँचवें अध्याय में लोकनृत्यों को वर्गीकृत कर प्रस्तुत किया गया है। क्षेत्रीय वर्ग में उन नृत्यों को लिया गया है जिनके क्षेत्र विशेष की पहचान बन चुकी है। जातीय वर्ग में "जन-जातियों को हमने सरकारी परिभाषा के हिसाब से ही माना है केवल मीणा जाति हमारे अध्ययन के आधार पर जन-जाति वर्ग में नहीं आती इसलिए इसे अन्य जाति वर्ग में लिया गया है। सरकारी मान्यता है कि "जो जातियाँ वनों और पहाड़ों की उपज से ही जीवन व्यतीत करती हैं वे अनुसूचित जनजाति हैं"। राजस्थान की मीणा जाति (सवाई माधोपुर और दौसा जिला) जिसे हमने अपने अध्ययन के लिए चुना, उपर्युक्त सरकारी व्याख्या के आधार पर जन-जाति वर्ग में नहीं आती, क्योंकि ये अधिकतर कृक्षक हैं या अब सरकारी अफसर हैं।

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