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ऋग्वेद-संहिता भावानुवाद: जन जन की भाषा में- Rigved-Samhita Bhavanuvad: Jan Jan Ki Bhasha Mein

$59
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Motilal Banarsidass Publishing House, Delhi
Author Rajendra Kumar Gupta
Language: Sanskrit Text with Hindi Translation
Pages: 774
Cover: PAPERBACK
9.5x7.5 inch
Weight 1.14 kg
Edition: 2026
ISBN: 9789371003100
HCE019
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Book Description

निवेदन

परमपिता परमेश्वर को प्रणाम कर मैं उनसे और विज्ञ पाठकों से ऋग्वेद की जन जन की भाषा में इस भावनुवाद की अनाधिकार चेष्टारुपी अपनी धृष्टता के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ, क्योंकि न तो मैं संस्कृत भाषा का वि‌द्वान् हूँ, न ही मैंने वेद और शास्त्रों की विधिवत शिक्षा ग्रहण की है और न ही विभिन्न वि‌द्वानों द्वारा उनके हिंदी अनुवाद को पूर्णतया समझने की मुझमे सामर्थ्य ही है। वेद प्राचीनतम ग्रन्य हैं जिनके विषय में यजु. 36.1 में काव्यात्मक संकेत मिलता हैः ऋग्वेद जान और वाणी को प्रतिपादित करता है, यजुर्वेद मन को विकसित करता है जो सभी कार्यों का स्रोत है, सामवेद जीवन ऊर्जा और लक्ष्य को विकसित करता है और अथर्ववेद स्वयं, शरीर और इन्द्रियों जैसे आँखों और कार्नी को पूर्ण बनाता है। वेद मंत्रों के तीन प्रकार के अर्थ हो सकते हैं. याजिक आधिभौतिक (विज्ञान या क्रिया आधारित), आधिदैविक (महानता की स्तुति) और आध्यात्मिक। इसलिए अलग-अलग वि‌द्वानों ने वेद-मन्त्रों का अर्थ अलग-अलग संदर्भ लेकर भिन्न-भिन्न किया है।

मेरी अपनी समस्त अयोग्यता और अपात्रता के बावजूद, आज की पीढ़ी के लिए, ऋग्वेद जो चारों वेदों में सबसे प्रमुख और अन्य तीनों वेदों का मुख्य आधार है, जिसमें सब पदार्थों की स्तुति होती है अर्थात् ईश्वर ने जिसमें सब पदार्थों के गुणों का प्रकाश किया है, उसके भावानुवाद को सरल, सहज और समसामयिक जन जन की भाषा में, उसके अतिअल्प अंश को ही सही, साधारण जन तक पहुँचाने के अपने लोभ का मैं संवरण नहीं कर पाया। परिणाम स्वरूप यह ऋग्वेद संहिता भावानुवाद, जन जन की भाषा में विज्ञ पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है। इस कार्य का मुख्य आधार परम श्रध्येय स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी का ऋग्वेद का भाष्य है। मेरी समझ में श्रध्येय स्वामीजी का भाष्य लौकिक और परमार्थिक जीवन दोनों ही में वेदों की उपयोगिता का श्रेष्ठ उपहार है। यथा आवश्यकता अन्य वि‌द्वानों के अनुवादों का भी आश्रय लिया गया है। मैं परम श्रध्येय स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी का और अन्य सभी भाष्यकारों और अनुवादकों का हृदय से अत्यन्त आभारी और कृतज्ञ हूँ।

यूँ तो ऋग्वेद में दस मण्डल और दस हजार से अधिक मन्त्र हैं लेकिन ऋग्वेद के अधिकांश अनुवाद प्रायः सातवें मण्डल पर समाप्त होते हैं, क्योंकि इसकी संरचना विशिष्ट है और इसके संकलन का ऐतिहासिक संदर्भ भी विशेष है। दूसरे से सातवें मण्डलों की भाषा और शैली पहले और दसर्वे मण्डल की तुलना में अधिक प्राचीन और सुसंगत मानी जाती है और ये ऋग्वेद के मूल, सबसे प्राचीन और सबसे सुसंगत भाग माने जाते हैं, जिन्हें विशिष्ट पुरोहित परिवारों द्वारा संकलित किया गया था, जबकि पहला और दसवाँ मण्डल बाद के युग में जोड़े गए हैं और उनकी शैली व विषयवस्तु विविध है। यही अन्तर सातवें मण्डल को कई अनुवादकों के लिए एक स्वाभाविक समापन बिंदु बनाता है, क्योंकि यह संग्रह का मुख्य भाग दर्शाता है और अधिकांश अनुवादकों का ध्यान ऋग्वेद के इस मूल संग्रह पर ही केन्द्रित हो रह गया जिससे वे ऋग्वेद के प्राचीनतम और स्पष्ट भाग के सार को प्रस्तुत कर सकें। इसके अलावा सातवाँ मण्डल अग्नि और अन्य देवताओं को विशेष रूप से समर्पित ऋचाओं के लिए जाना जाता है और इसे वसिष्ठ परिवार द्वारा संकलित माना गया है, जो इसे अनुवाद के लिए एक सुसंगत इकाई बनाता है। अष्टम से दशम मण्डल अधिक जटिल और विविध हैं जिनमें दार्शनिक, मायावी और रहस्यपूर्ण सूक्तों का मिश्रण है जैसे पहेलियाँ, तंत्र-मंत्र, और ब्रह्माण्ड सम्बन्धी विचार और इनकी भाषा भी अधिक गूढ़ और असंगठित है, जिससे अर्थ निकालना कठिन हो जाता है। नवम मण्डल तो सोम को ही समर्पित है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुत भावानुवाद को भी सातवें मण्डल तक ही सिमित रखा गया है। इन सात मण्डलों के 620 सूक्त, 5974 मन्त्रों का अनुवाद 5132 पदों में किया गया है। इस अनुवाद में दशम मण्डल का 129 वॉ-नासदीय सूक्त' जो एक बहुचर्चित और महत्त्वपूर्ण सूक्त है और सृष्टि रचना से सम्बन्धित है, उसे भी शामिल किया गया है। इस सूक्त में 7 मन्त्र हैं जिनका अनुवाद 12 पद में किया गया है।

इस प्रस्तुति में मेरा प्रयास रहा है कि जहाँ पूर्ववर्ती मन्त्रों के आशय का दोहराव हो रहा हो, उस अंश को पुनः दोहराया न जाए। यह पुस्तक के आकार को सिमित रखने के लिए भी अत्यन्त आवश्यक था। साथ ही वेद की ऋचाओं में उपमाओं और अलंकारों का भी उनका अर्थ समझाने के लिए मुक्तहस्त से प्रयोग किया गया है। मेरा प्रयास रहा है कि ऋचाओं के भाव को सीधी-सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाए अतः जहाँ आवश्यक नहीं लगा, इस अनुवाद में उपमाओं और अलंकारों के प्रयोग से बचा गया है। वेद प्राकृत गुर्णा का विषय करनेवाले होने के कारण, यहाँ उनका वही पक्ष जो जीवन में व्यवहारिक सिद्ध हो, मुख्यतः वर्णित किया गया है। ऋग्वेद में देवताओं को प्रकृति की अधिष्ठाता शक्तियों के रूप में विभिन्न प्रकार से चित्रित किया गया है यथाः इन्द्र, अग्नि आदि देवताओं का प्रयोग राजा, परमेश्वर आदि के संदर्भमें किया गया है।

संस्कृत भाषा में वेद मन्त्रों का अर्थ संदर्भ अनुसार-व्यवहारिक संदर्भ में साधारण जन के लिए, राजाओं के संदर्भ में और देवताओं और परमात्मा के संदर्भ में अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग किया है अतः इस अनुवाद में कहीं-कहीं पर एक ही मन्त्र का अलग-अलग वि‌द्वानों ‌द्वारा अलग-अलग संदर्भ में किया अनुवाद भी सम्मिलित किया गया है जिससे मन्त्र के भाव को उन सदर्भों में भी समझा जा सके। ऋग्वेद में निहित गूढजान, इस सरल पदरूप प्रस्तुति में कहीं गौण न हो जाय इसलिए फुटनोट्स द्वारा जगह-जगह उसे यथोचित रूप से स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। पाठकों से निवेदन है कि वे इन पर्दा को फुटनोट्स के साथ पढ़कर मन्त्रों में निहित भाव को ग्रहण करें।

पाठकों की सुविधा के लिए पुस्तक में मूल संस्कृत मन्त्रों के साथ उनका सारतत्व जन-साधारण की भाषा में दिया गया है और इस पाठ्य को सुरुचिपूर्ण और उसकी निरंतरता और तारतम्यता बनाए रखने के लिए मूल मन्त्रों का शब्दतः अनुवाद न कर उनके भाव को ग्रहण करने का प्रयास किया गया है, जिसके चलते कहीं-कहीं पर एक ही मन्त्र का अनुवाद एक से अधिक पदों में और कहीं-कहीं पर एक से अधिक मन्त्रों का अनुवाद एक या अधिक पर्दो में बन पड़ा है। पाठ्य की तारतम्यता बनाये रखने के लिये और भाव की स्पष्टता को ध्यान में रखते हुए इस भावानुवाद में प्रत्येक मन्त्र का अलग से अर्थ न करके पूरे-पूरे सूक्तों का भावानुवाद किया गया है। आशा है पाठकों को पढने में यह सुरुचिपूर्ण लगेगा।

इस अनुवाद में जो त्रुटियाँ रह गयी हैं, उनके लिए मैं विज पाठकों से क्षमाप्रार्थी हूँ।

श्रीगुरुजनों का यह कृपाप्रसादरूपी कार्य उनके श्रीचरणों में सादर समर्पित है।

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