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सारण और राहुल- Saran and Rahul (Biography)

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Specifications
Publisher: Bihar Rashtrabhasha Parishad
Author Rahul Sankrityayan
Language: Hindi
Pages: 479
Cover: HARDCOVER
9.5x6.5 inch
Weight 750 gm
Edition: 2020
HCE405
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Book Description

अपनी बात

"सारण और राहुल" महापंडित सांकृत्यायन की मेरी जीवन यात्रा (आत्मकथा) के सारण से सम्बद्ध अंशों का संकलन है। सारणवासी अपने सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जिम्मेवारियों के प्रति सर्वदा प्रयत्नशील रहे हैं। इसी सामूहिक प्रयत्न के परिणामस्वरूप आजादी के पूर्व डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के नाम पर उत्तर भारत का एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान राजेन्द्र कॉलेज खुला । आजादी के बाद विश्वविद्यालय की मांग की जाती रही, जनांदोलन होते रहे । आखिर जयप्रकाश विश्वविद्यालय खुला। राजेन्द्र कॉलेज एवं जयप्रकाश विश्वविद्यालय के विविध पदों एवं जिम्मेवारियों के निर्वाह के ही दरम्यान राष्ट्रीय स्तर के ख्यात् विद्वानों/विशेषज्ञों को हमलोग व्याख्यान् के लिए बुलाते रहे हैं । राहुल एवं जयप्रकाश के जन्मदिन पर विश्वविद्यालय में देश स्तर के विद्वानों का आना-जाना लगा रहा। कवि केदार, समाजशास्त्री आनंद (जे.एन.यू.), इम्तियाज अहमद (जे.एन.यू.), मैनेजर पाण्डेय (जे.एन.यू), हरिवंश (पत्रकार एवं राज्यसभा के माननीय सभापति), सुनील (समाजवादी), योगेन्द्र यादव (पत्रकार), अरूण कमल (कवि) आचार्य राममूर्ति, रामवचन राय आदि ने आकर राहुल एवं भिखारी ठाकुर के महत्त्व एवं वैशिष्टय को केन्द्र मे रखकर सारण के प्रबुद्धजनों से संवाद करते रहे हैं। सारण के वातावरण को बौद्धिक एवं वैचारिक रूप से समृद्ध करने में निश्चित रूप से उपर्युक्त कवि/लेखकों की बड़ी भूमिका रही । राहुल और भिखारी ठाकुर देश के कबियों, लेखकों, नाटककारों को सर्वदा आकर्षित रहे । दोनों सारण के प्रबुद्धजनों को चिंतन मनन के लिए बाध्य करते रहे । इसी के परिणामस्वरूप सारण के प्रशासनिक केन्द्र छपरा के पूर्वी प्रवेश द्वारा पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के निर्देश पर भिखारी ठाकुर की नाट्यमंडली सहित मूर्त्ति लगी, जिससे कवि केदार जी बहुत प्रभावित हुए थे। यद्दी नहीं २००३ ई० में बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् के निदेशक पद पर रहते हुए मैंने "भिखारी ठाकुर रचनावली" के संपादन एवं प्रकाशन का निर्णय लिया । "भिखारी ठाकुर रचनावली" अत्यन्त लोकप्रिय हुयी जिसकी संभावना १९४७ ई० में राहुल जी ने व्यक्त की थी "भिखारी ठाकुर हमनी के एगो अनगढ़ हीरा हवे । उनकर में कुलि गुनबान बा, खाली एने ओने तनी तूनी छटि के काम हवे ।" इतना ही नहीं बल्कि राहुल जी ने अपने इस भाषण में भोजपुरी प्रांत बनाने की असरदार वकालत की थी- "हमनी के बोली के एगो फरका प्रान्त बने की चाहीं।" आज मातृभाषाओं के मृत होने का महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रश्न दुनिया के सामने खड़ा है । २१वीं शताब्दी में पूँजीवादी एवं भोगवादी समाज द्वारा उत्पन्न भाषाई सांस्कृतिक खतरे का आभास राहुल को असहयोग आंदोलन के संघर्ष के दरम्यान् हो गया था । वे लगातार मातृभाषाओं के साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं प्रजातंत्रात्मक महत्त्व की ओर जनता का ध्यान आकृष्ट करते हुए दिखायी पड़ते हैं। इस प्रकार आज की वैश्विक भाषाई समस्या है मृत होती दुनिया की मातृभाषायें । यह राहुल जी की अद्भूत प्रतिभा थी जो स्थानीय सांस्कृतिक भाषाई खतरे में वैश्विक समस्या की झलक देख सकती थी । यही तो मैनेजर पाण्डेय के विचार से स्थानीयता में वैश्विक समझदारी की अद्भूत और बारीक पकड़ है । इस संबंध में राहुल जी की दृष्टि अत्यन्त दूरदर्शी, सटीक तथा द्वन्द्वरहित थी । गाँधी जैसी उनकी स्पष्ट मान्यता थी पढ़ावे के सबसे सोझ अऊर जल्दी रहता आपन बोली में शिक्षा देहले बा । " (१९४७ ई० को गोपालगंज में भोजपुरी में दिये भाषण से) पुनः प्रयाग के एक हिन्दी गोष्ठी (१९४२-४३, २७ सितम्बर मेरी जीवन यात्रा) में कहते हैं - हमारे प्रजातंत्रों के संघर्ष के लिए भी एक सम्मिलित भाषा की जरूरत है, वह हिन्दी होगी। लेकिन साथ ही हमें अपनी जनता को शीघ्र साक्षर और शिक्षित बनाना है, यह काम मातृभाषाएँ ही कर सकती है" (३६६/राहुल वाङ्मय-१.२: जीवन यात्रा) । सारण की जनभाषा भोजपुरी (जिसे राहुल जी मल्लिका भी कहते थे) को ही वे अपने सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक बदलाव हेतु जन अभियान का माध्यम बनाते थे। असहयोग आंदोलन के दरम्यान भोजपुरी में ही वे अपना भाषण देते थे । १९२६ में छपरा जिले के कौंसिल चुनाव का विवरण देते हुए राहुल जी लिखते हैं कि "छपरा में मैंने जब से राजनीतिक काम किया, तबसे ही सभाओं में मेरा भाषण सदा वहाँ की भांषा भोजपुरी/मल्ली में होता था । इस चुनाव के समय उम्मीदवारों के पक्ष में मैंने कई नोटिसें इसी भाषा में निकाली, जिसकी पहिले तो लोगों ने उचित नहीं समझा, किन्तु जनता पर सीधी-सादी दीहाती भाषा का असर देख उन्हें उसके महत्त्व को स्वीकार करना पड़ा । “जे जगदीपा गाँव उजरलीं दूँठ कइलीं पीपर । से 'जगदीपा' आवतारों हाथे लेले मूसर" के हेडिंग से निकले नोटिस ने तो निरसू बाबू के विरोधी को 'जगदीपा' नाम दे डाला । (मेरी जीवन यात्रा-१/३०७) उनके नेतृत्व क्षमता एवं छपरा की जनभाषा के भाषणों पर डॉ॰ काशी प्रसाद जयसवाल की महत्त्वपूर्ण टिप्पणी है -"राहुल सांकृत्यायन जनता के आदमी हैं, एक प्रकार से गाँधी से भी ऊँचे स्तर के छपरा के बोली में दिये जानेवाले उनके भाषण राजेन्द्र बाबू के भाषणों से भी ज्यादा पसंद किये जाते थे ।" (स्वयंभू महापंडित, गुणाकर मुले, पृष्ठ ४०) राहुल जी अपनी जीवन यात्रा में लिखते हैं कि, "२६ जून १९४२ ई० से मैंने 'जपनियाँ राछछ' और दूसरे सात नाटकों को छपरा की भाषा (मल्लिका) में लिखा। मैं १९२१ ई० से अपने व्याख्यानों के लिए छपरा में वहाँ की ही भाषा को इस्तेमाल करते आया था। मैं इन मातृभाषाओं की क्षमता और समृद्ध शब्द भण्डार को अपनी आँखों से देखता था । सोवियत में जाने के बाद वहाँ की मातृभाषाओं की उपयोगिता को देखकर अच्छी तरह समझने लगा, कि हिन्दुस्तान में जनता को इन भाषाओं में बहुत काम करना है। इसी ख्याल से १९३९ ई० में छपरा से वहाँ की भाषा में एक अखबार निकालना चाहा था, उसी ख्याल को लेकर इन आठ नाटकों को लिखा (मेरी जीवन यात्रा-२/३५९) ।

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