प्रकाशकीय
भारत भूमि धर्म एवं आध्यात्मिक भूमि रही है। यह अवतारों, चमत्कारों, ऋषियों, संतों एवं महात्माओं की भी भूमि है। जब-जब इस धरा पर अत्याचार, असत्य, अधर्म बढ़ा है, तब-तब ऐसे सत्पुरुषों, महात्माओं या संतों का आर्विभाव हुआ है, जिन्होंने अपने शिक्षण, विचार एवं कार्य से युग को नई दिशा दी।
15वीं-16वीं शताब्दी के मध्ययुगीन भारतीय समाज में जब जातिवाद, धार्मिक कर्मकांड, छुआछूत और राजनीतिक उथल-पुथल चरम पर थी, तब श्री चैतन्य महाप्रभु (1486-1534) के विचारों और उनकी अनूठी शिक्षाओं ने एक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने केवल धर्म के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि तत्कालीन समाज की बुनियादी संरचना में बड़े बदलाव किए। उन्होंने अपनी मंडली में समाज के सबसे निचले तबके के लोगों को न केवल शामिल किया, बल्कि उन्हें सर्वोच्च स्थान भी दिया।
श्री चैतन्य महाप्रभु के अलौकिक जीवन, शिक्षण एवं कार्यों पर आधारित सुजाता जी की प्रस्तुत पुस्तक 'श्री चैतन्य देव' एक महत्त्वपूर्ण रचना है।
हमें प्रसन्नता है कि सर्व सेवा संघ-प्रकाशन 'श्री चैतन्य देव' पुस्तक का प्रकाशन कर रहा है। सुजाता जी ने बड़े ही प्रभावशाली ढंग से श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन से जुड़े विभिन्न आयामों एवं प्रेरणादायक प्रसंगों को पुस्तक में शामिल किया है। हम लेखिका के आभारी हैं कि उन्होंने यह पुस्तक हमें प्रकाशित करने का अवसर दिया।
अपने युग में चैतन्य महाप्रभु ने प्रेम-भक्ति आंदोलन के द्वारा समाज को एक सूत्र में बांधा था। आज जब देश चौराहे पर खड़ा है, ऐसे समय उनके शिक्षण-विचार की अहमियत बहुत बढ़ जाती है।
भूमिका
भारतीय संस्कृति का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है; यह उन महापुरुषों की जीवनगाथा भी है, जिन्होंने अपने विचार, आचरण और प्रेम से समाज की दिशा बदल दी। ऐसे ही युगपुरुषों में श्री चैतन्य महाप्रभु का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने ऐसे समय में जन्म लिया, जब भारतीय समाज धार्मिक आडंबर, जातिगत विभाजन, सामाजिक विषमता और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। उस युग में उन्होंने किसी शस्त्र या सत्ता का नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति, करुणा और संकीर्तन का मार्ग अपनाकर करोड़ों लोगों के हृदयों को स्पर्श किया।
श्री चैतन्य महाप्रभु को प्रायः केवल एक महान् वैष्णव संत या कृष्णभक्त के रूप में देखा जाता है, जबकि उनका व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। वे समाज-सुधारक, मानवतावादी, सांस्कृतिक जागरण के अग्रदूत तथा धार्मिक समन्वय के महान प्रवक्ता थे। उन्होंने जाति, कुल, वर्ण, लिंग और सामाजिक ऊँच-नीच के कृत्रिम भेदों को चुनौती देते हुए यह सिद्ध किया कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम, विनम्रता और भक्ति से होकर जाता है। उनका संकीर्तन आंदोलन केवल धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि सामाजिक समरसता और मानवीय एकता का सशक्त अभियान था।
इस पुस्तक का आधार मेरा शोधकार्य है। शोध के दौरान मैंने उपलब्ध प्राचीन एवं आधुनिक ग्रंथों, ऐतिहासिक स्रोतों तथा विभिन्न विद्वानों के मतों का तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास किया है।
आज का विश्व हिंसा, असहिष्णुता, कट्टरता, मानसिक तनाव और सामाजिक विखंडन जैसी अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। ऐसे समय में श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रेम, करुणा, सहिष्णुता, मानव-बंधुत्व और अहंकार-त्याग का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक उत्थान बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता और समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम से होता है।
भारतीय संत-परंपरा ने केवल आध्यात्मिक जीवन को ही नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय चिंतन को भी गहराई से प्रभावित किया है। महात्मा गांधी ने अनेक अवसरों पर उन संत-महापुरुषों के जीवन को आदर्श माना, जिन्होंने स्वेच्छा से सादगी, त्याग और लोकमंगल का मार्ग अपनाया। श्री चैतन्य महाप्रभु का जीवन भी इसी परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने सांसारिक वैभव और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का परित्याग कर प्रेम, भक्ति और मानव-सेवा को जीवन का लक्ष्य बनाया। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि स्थायी परिवर्तन बाह्य शक्ति से नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन, करुणा और प्रेम से संभव होता है।
इसका उद्देश्य केवल श्री चैतन्य महाप्रभु का जीवन-वृत्त प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, दर्शन, सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक योगदान तथा मानवतावादी दृष्टि का ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है। इस अध्ययन में उपलब्ध प्राचीन एवं आधुनिक स्रोतों, मूल ग्रंथों तथा विभिन्न विद्वानों के मतों का यथासंभव सम्यक् परीक्षण एवं तुलनात्मक विवेचन किया गया है। मेरा प्रयास किसी सांप्रदायिक आग्रह या पूर्वाग्रह के स्थान पर शोधपरक निष्पक्षता और ऐतिहासिक प्रमाणिकता को आधार बनाकर श्री चैतन्य महाप्रभु के बहुआयामी व्यक्तित्व को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना है।
आज जब विश्व हिंसा, असहिष्णुता, उपभोगवाद और मानवीय मूल्यों के संकट से जूझ रहा है, तब श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रेम, समरसता, सह-अस्तित्व और विश्वबंधुत्व का संदेश अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।
मेरा उद्देश्य किसी संप्रदाय विशेष का समर्थन या प्रचार करना नहीं, बल्कि श्री चैतन्य महाप्रभु के जौवन, दर्शन और उनके बहुआयामी योगदान को वस्तुनिष्ठ एवं शोधपरक दृष्टि से प्रस्तुत करना है। मैंने जहाँ तक संभव हुआ है, तथ्यों की प्रामाणिकता, ऐतिहासिक संदर्भों की विश्वसनीयता और विचारों की संतुलित प्रस्तुति का ध्यान रखा है।
यह पुस्तक शोधार्थियों, अध्यापकों, विद्यार्थियों तथा भारतीय संस्कृति के अध्येताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगी और श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन एवं विचारों के गंभीर अध्ययन की दिशा में एक विनम्र योगदान मानी जाएगी।
यदि यह पुस्तक पाठकों को श्री चैतन्य महाप्रभु के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को अधिक गहराई से समझने, उनके संदेश को आधुनिक जीवन से जोड़कर देखने तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के इस महान अध्याय के प्रति नई जिज्ञासा उत्पन्न करने में सफल होती है, तो मैं अपने श्रम को सार्थक मानूँगी।
मैं अपने उन सभी गुरुजनों, विद्वानों, ग्रंथकारों एवं शुभचिंतकों के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ, जिनके मार्गदर्शन और प्रेरणा ने इस शोध तथा इस पुस्तक को पूर्णता प्रदान करने में सहायता की।
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