खुद को त्रासदी के बीज से उपजा बरगद मानता हूँ। सिल्फ़ पहाड़ के दूसरी तरफ़ वाली दुनिया की बातें करती हैं। किताबें बहुत पढ़ी और किताबों पर छपी स्याही से बहुत कुछ सीखा लेकिन कभी सोचा भी नहीं था कि जो बातें हम दोनों ने कैफियत में कही या फिर पूरे होशोहवास में कही वे बातें यूँ स्याही का बदन ओढ़े सामने आ जायेंगी।
इस स्याही में कितना खून है और कितना पसीना, इतना गणित किसको आता है?
मैं खुद को साहित्यकारों का क़र्जदार मानता हूँ। कर्ज हमेशा सूद के साथ लौटाया जाता है। मंटो या स्वदेश दीपक की आत्मा जब कर्ज का हिसाब माँगेगी तो मैं अपनी लिखी आठ-दस कविताएँ और कुछ सूत्र वाक्य उनके हवाले कर दूँगा। यही सूद होगा।
इन कविताओं का शिल्प कमज़ोर हो सकता है। मगर इन कविताओं को लिखने के क्रम में जिस मानसिक उद्वेलन से गुज़रा हूँ उसके कारण मुझमें थोड़ी मनुष्यता बची रही है।
मैं अपने गद्य में अतिरेक को छूकर लौटता रहा हूँ लेकिन इन कविताओं के लिए कह सकता हूँ कि ये मेरे ज़िस्म से होकर गुज़री हैं।
किसी भी किताब की भूमिका को बहुत ज़रूरी मानता रहा हूँ और जीवन में सारे ज़रूरी काम टालता रहा।
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