पुस्तक परिचय
यह उपन्यास विभाजन के बाद दूसरी पीढ़ी के लेखक द्वारा लिखा गया है। विभाजन की त्रासदी तो पिता दादा परिवार ने भोगी थी। पर विभाजन का दर्द अगली पीढ़ी में जींस के द्वारा आया। अपने बड़ों से, समाज में अन्य बड़ों से जो सब कुछ भोग कर उधर से इधर आए थे, ने बहुत दर्द भरे किस्से सुनाए, परिवारों में टूटते दरकते संबंधों का कारण विभाजन के साथ गरीबी भी था अशिक्षा भी था। पैसा संबंधों पर विजय पा गया। शिक्षा तो सभी ने बहुत ली परन्तु लोग मुद्राराक्षस ही बनते चले गए। शहरीकरण और स्वार्थ ने संवेदनहीनता दी, कुछ बनने की चाह ने स्वार्थी बनाया।
उपन्यास में एक संयुक्त परिवार के टूटने और एकल परिवार बनने की घटनाएं सहज ही कथा के माध्यम से पता चलती हैं। जो विभाजन की कहानी नए कलेवर में जानना चाहते है उन्हें इस उपन्यास को अवश्य पढ़ना चाहिए। जितनी भी कहानियाँ बीच में चलती हैं चरित्र आते हैं सबके अपने अलग तौर तरीके हैं। पाठक स्वतंत्र है वह अपने समाज और पात्रों से उनकी तुलना कर के देखें और निर्णय निकालें, स्वार्थपरता, संवेदनहीनता, बेइमानी, हेराफेरी, लालच ने व्यक्ति को कहां लाकर रखा है। आशा है लेखक का श्रम व्यर्थ नहीं जाएगा। पाठक अगर लेखक को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएंगे तो उनका बड़ा उपकार होगा।
लेखक परिचय
मलिक राजकुमार शिक्षा: एल.एल.बी, एम.ए., पी-एच.डी. (हिंदी) प्रकाशन: 1. नदी बहती है (कविता संग्रह), 2. एक लड़की पारुल (कविता संग्रह), 3. संबंधों की नाव (कहानी संग्रह), 4. लामबहादुर के बैल (कहानी संग्रह), 5. शहतूत की आंख, 6. नींद का रिश्ता, कातिल (कहानी संग्रह), 7. एक त्रिशंकु (उपन्यास), 8. जड़ां दी तलाश (पंजाबी कहानी संग्रह), 9. पैरों तले पहाड़ (यात्रा वर्णन), 10. शहतूत की आँख (कहानी संग्रह), 11. दादका-नानका (पाकिस्तान यात्रा संस्कमरण), पर्यटन बनाम यात्रा, 12. बाईपास (उपन्यास), 13. प्रेम वल्लरी, 14. स्टेशन मास्टर (उपन्यास), 15. जड़ा दो तलाश (पंजाबी कहानी संग्रह, सिराय की कहानियाँ), 16. मलोहिया दा वेढ़ा (मलतान गाथा)। प्रकाशनाधीन : कीकर वाला चौक (उपन्यास) संपादन : सांझे अला (सिराकी कविता संग्रह), शब-ए-मालवा, (गज़ल संग्रह) संपादक : (सिरायकी खंड) पंजाबी संस्कृति, हिसार, जायसी ग्रंथावली (आचार्य रामचंद्र शुक्ल) अभिनस इमरोज त्रैमासिक गजल अंक वा मन्टो अंक । विशेष : विभिन्न विश्वविद्यालयों से इनके साहित्य तथा इनको लेकर अनेकों पी-एच.डी., एवं एम. फिल (शोध) हो चुके हैं। तथा रेडियो/दूरदर्शन अन्य कहानी वार्ता, कविताओं का रेडियां पर हिंदी, सिरायकी, पंजाबी एवं ब्रजभाषा में वाचन। केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के कार्यक्रमों में पचीस वर्षों से संलग्न हैं।
भूमिका
स्टेशन मास्टर उपन्यास मेरी लंबी मेहनत का परिणाम है जो अब आपके समक्ष पुस्तक रूप में हाजिर है यहां मैं बताना चाहता हूं कि मेरे पिता 1947 के विभाजन के बाद 1950 में आकर रेलवे में भर्ती हो गए मैं 1955 में पैदा हुआ मुझे अपने बचपन के बहुत सारे क्षण आज तक याद हैं। स्टेशन मास्टर उपन्यास की कथा आरंभ होती है जिला मियांवाली के एक छोटे से गांव कोटलजाम से जहां एक संयुक्त परिवार मिलकर रह रहा है बच्चे बड़े हो रहे हैं और परिवार में समस्याएं बढ़ रही हैं तभी अचानक समाज में बात होने लगी हैं कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान अलग-अलग देश बन जाएंगे कई लोग हैं जो इस बात पर विल्कुल भी विश्वास नहीं करते कई लोग हैं जो ऐसा होना देना चाहते हैं। समय बलवान होता है समय की इच्छा के अनुसार विभाजन आरंभ हो जाता है और जो परेशानियां दंगे आगजनी नारे और फिर इधर से उधर आना जाना अपने को सुरक्षित रखने का स्थान ढूंढना अपने परिवार और लड़कियों के बारे में सोचना यह सभी लोगों के बीच में समान है फिर धीरे-धीरे सारी परेशानियों को भोगते हुए कभी मालगाड़ी में जानवरों की तरह लद कर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन आते हैं। अंत में उनका पहला पड़ाव होता है जिसे वाघा बॉर्डर कहते हैं तब लगता है कि वह दुख के मारे हिंदुस्तान आ गए हैं रास्ते में खून खच्चर दहशत यह सारे दृश्य देखने को मिलते हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को पीड़ा देते हैं इन सब से बच कर जब भारत की भूमि पर आते हैं जब तथाकथित हिंदुस्तान की भूमि पर आते हैं तो लोगों को सांस में सांस आती है।
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