लेखक परिचय
डॉ. इन्दु शर्मा जन्म तिथि 19 जनवरी 1986 शैक्षिक योग्यता एम फिल्, पी-एच.डी. नेट (यू.जी.सी.) संस्कृत प्रभाकर (संगीत गायन)। शिक्षण अनुभव वरिष्ठ सहायक आचार्या के पद पर, संस्कृत एवं वेदाध्ययन विभाग, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, गायत्रीकुंज, शांतिकुंज, हरिद्वार (उत्तराखंड)। सम्प्रति- संस्कृत विभाग, गोविन्द गुरु जनजातीय वि. वि. बाँसवाड़ा, (राजस्थान)। सम्प्रति-विजिटिंग फैकल्टी संस्कृत एवं वेदाध्ययन विभाग, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, गायत्रीकुंज, शांतिकुंज, हरिद्वार (उत्तराखंड)। आपने अपनी सारस्वत यात्रा में काश्मीर शैवदर्शन को अपनी साधना का केन्द्र बनाते हुए अनवरत अपनी लेखनी को गति प्रदान की है। तथा प्रत्यभिज्ञाविमर्श एवं स्वातन्त्र्यवाद नामक दो पुस्तके इस विशेष विषय क्षेत्र को समर्पित की। काश्मीर शैवदर्शन को विद्वानों के मध्यम प्रचलित एवं प्रसारित करने में प्रयासरत आप अनेक शोध-पत्रों का भी वाचन एवं प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कर रही है। आपके आगम, निगम 'दर्शन', साहित्य, नाट्य, कला, वेंद, उपनिषद् आदि विषयों पर आदघृत चौवीस शोधपत्र राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके है। इसी के साथ आपने कार्यशालाओं एवं परिसंवादों में भी अपनी प्रतिभागिता अंकित की है। आप MHRD के NME-ICT प्रोजक्ट (द्वारा CEC नई दिल्ली) के UGC मॉडल पाठ्यक्रम के आधार पर विषय विशेषज्ञ के रूप मे सात व्याख्यान "Video Programme के माध्यम से भी दे चुकी है। आपके निर्देशन में विविध शोध-विषयों पर शोध कार्य भी हो चुके हैं। परमशिव की कृपा से आपकी लेखनी सम्प्रति एक और "काश्मीर शैवदर्शन" पर आधारित पुस्तक पर कार्य कर रही है।
पुस्तक परिचय
भारतीय दर्शन भारतीय मनीषा की सर्वोत्तम उपज है। समस्त दर्शन का प्रतिपाद्य "मोक्ष" ही है। दर्शन परम्परा में अनेक दर्शन हैं तदपि केवल षड्दर्शनों को ही भारतीय षड्दर्शनों की संज्ञा प्राप्त है। आगम परम्परा में काश्मीर शैव दर्शन का स्थान अद्वितीय है। इसे 'प्रत्यभिज्ञादर्शन' के नाम से भी जाना जाता है। प्रस्तुत पुस्तक "काश्मीर शैवदर्शन" के सिद्धान्तों को मनीषियों तक पहुंचाने का लघु प्रयास है। पुस्तक को पाँच अध्यायों में विभाजित किया गया है। पञ्चम अध्याय में "काश्मीर शैव दर्शन के समग्र सिद्धान्तों को जिज्ञासाओं को प्रश्नोत्तर के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तक जिज्ञासुओं और शोधार्थियों के लिए सार्थक सिद्ध हो, ऐसा पूर्ण प्रयास किया गया है। "शिवोऽहं, शिवोऽहं” की भावना के साथ यह प्रयास परमशिव के चरणारविन्दों में समर्पित है।
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