भूमिका
संघ कार्य का आधार संपर्क और स्नेह है। संपर्क से संबंध जुड़ता है। स्नेह की डोरी से संबंध सुदृढ़ हो जाता है। पूरे संघ कार्य के मूल में प्रमुख यही दो कारक हैं। अन्य कारक बाद में जुड़ते गए। ध्येय-निष्ठा अथवा ध्येय के प्रति समर्पण का भाव जागृत हो जाने के पश्चात् स्वयंसेवक स्वतः संघ कार्य में तल्लीन हो जाता है। किन्तु स्वयंसेवक बनाने में संपर्क और स्नेह के सूत्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। श्री रमेश प्रकाश जी के व्यक्तित्व में यह दोनों तत्त्व भरपूर मात्रा में थे। उनकी वाणी शर्करी थी, उनके पाँव में चकरी थी। करनाल में रहते हुए उनकी नगर-परिक्रमा बाइसाइकिल पर तो दिल्ली में एक पुराने स्कूटर पर होती थी। प्रत्येक आयु वर्ग और प्रत्येक कार्य में लगे हुए कार्यकर्ता के साथ निरंतर संपर्क में रहते थे। प्रत्येक स्वयंसेवक के परिवार के विषय में उन्हें पूरी जानकारी रहती थी। प्रत्येक स्वयंसेवक की कार्यक्षमता का आंकलन करने में उन्हें सिद्धता प्राप्त थी। रमेश प्रकाश जी का जन्म 02 नवम्बर 1933 में हुआ। संयोग से उस दिन गुरु नानक देवजी का प्रकाश पर्व अर्थात् उनका प्रकटोत्सव था। ऐसे पावन संयोग का प्रभाव इस बालक पर दिखाई देता है। गुरु महाराज की वाणी में वर्णित नैतिक शिक्षा 'दब के वाह, रज के खा ते वंड के छक अर्थात् खूब श्रम पूर्वक कमाओ खूब खाओ व परस्पर बांट कर खाओ के सिद्धांत का अनुसरण करने का उन्होंने जीवन में भरसक प्रयत्न किया। उनकी माताजी श्रीमती कृष्णा शर्मा कुशल गृहिणी व पिता जी श्रीमान सीताराम शर्मा व्यवसाय से अध्यापक थे। वह उपजिला शिक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त (ए.डी.आई.) हुए थे। दोनों का स्वभाव मृदु था। एक व्यक्ति के रूप में अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि रमेश प्रकाश जी सरल प्रकृति के व्यक्ति थे। एक बार जो उनसे मिल लेता वह उनका अपना हो जाता था। उनके संबंधों में निश्छलता और आत्मीयता रहती थी। छल कपट से सदैव दूर रहे। उनकी वाणी मधुर थी। उनको स्पष्टवादिता अपना वांछित प्रभाव दिखाती थी। उन्हें हमने कभी क्रोध में उबलते नहीं पाया। स्थिति का आंकलन कर उसे सुलझाने में वह सिद्धहस्त थे। कार्यकर्ताओं के मन में वह स्थान बना लेते थे. अतः कार्यकर्ता निःसंकोच उनके सम्मुख अपनी बात कह कर संतुष्ट हो जाते थे। उनकी संतुष्टि इस विश्वास में थी कि अब संतोषप्रद समाधान प्राप्त हो जाएगा। श्री रमेश प्रकाश जी जहाँ भी जाते थे स्वयंसेवकों में घुलमिल जाते। उनसे पहली बार मिलने वाला स्वयं ऐसा अनुभव करता था, मानो वह उनसे पहले से ही परिचित रहा हो। यह उनका विशेष गुण था। जिस कार्यकर्ता से परिचय हो जाता था वह उसे कभी भूलते नहीं थे। राजेन्द्र मित्तल जी के शब्दों का उल्लेख करना समीचीन होगा "रमेश जी से मेरा परिचय तब से है जब मैं पंजाब में प्रचारक था। जब उनसे पहली बार मुलाकात हुई तो लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं।" उनके प्रथम वार्तालाप में ही कार्यकर्ता उनके सहज स्वभाव के कारण उनसे समरस हो जाता था। श्री आलोक कुमार जी ने लिखा 'यह पहली मुलाकात और उनकी बातें सदैव मेरी स्मृति में रही। उसके बाद तो जीवन भर उनसे संपर्क रहा। उनकी एक विशेषता यह थी कि वह न तो उलझे तर्क देते थे और न ही क्लिष्ट भाषा में बात करते थे। एक व्यक्ति के रूप में उनका आचरण प्रशंसनीय रहा। वह सबको साथ लेकर चलने वाले तथा सभी के हितों के प्रति सदैव जागरूक रहे।'
पुस्तक परिचय
संघ कार्य रमेश प्रकाश जी के जीवन का अभिन्न अंग था। संघ विस्तार, स्वयंसेवक और शाखा यही उनके जीवन के आधार थे। एक बार रमेश प्रकाश जी और उनके भाई ब्रह्य जी शहर से घर की ओर लौट रहे थे। इसी बीच रास्ते में उनकी भेंट ब्रह्मकुमारियों से हुई। रमेश जी को सभी जानते थे लेकिन ब्रह्म जी को कम ही लोग जानते थे। ब्रह्मकुमारियों ने रमेश जी से पूछा, इनका क्या नाम है, रमेश जी ने कहा 'ब्रह्मकुमार' है। उनको लगा मजाक कर रहे हैं जबकि रमेश जी ने सही ही बताया था। ब्रह्मकुमारियों ने रमेश जी को आश्रम देखने का निमंत्रण दिया। रमेश जी और ब्रह्म जी उनके साथ आश्रम देखने चल दिए। आश्रम के अंदर आने के बाद उन्होंने रमेश जी से कहा आप पाँच मिनट तक अपनी आँखें बंद कर लो। पाँच मिनट के बाद आँखें खोलने पर ब्रह्मकुमारियों ने रमेश जी से पूछा तुम्हें आँखें बंद होने के दौरान क्या ध्यान में आया?
रमेश जी ने कहा- "वैरागी शाखा में व्यास रंजन जी नहीं आए थे। अब उनके घर जाकर पता करूँगा की क्यों नहीं आए थे। साथ ही आज वैरागी शाखा में स्वयंसेवक भी कम ही आए । अब मैं उन स्वयंसेवकों के घर जा रहा हूँ।"
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