पराशर उवाच: Thus Spake Parashara

पराशर उवाच: Thus Spake Parashara

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Item Code: NZA682
Author: डॉ. सुरेश चन्द्र मिश्र:Dr. Suresh Chandra Mishra
Publisher: Pranav Publication
Language: Hindi
Edition: 2013
ISBN: 9789381748039
Pages: 221
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch
Weight 280 gm

पराशर उवाच

शताध्यायी बृहत्पाराशरी के विशाल और व्यापक कलेवर से चुन चुन कर ऐसे खास और दैनिक व्यवहारोपयोगी पाराशरी नियमों का खुलासा करने वाला अनोखा ग्रन्थ अपने योग्य पाठकों के खास आग्रह पर बहुत आसान हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है पाराशरी नियम मूल ग्रन्थ में इधर उधर बिखरे हैं, जिन्हें रोजाना व्यवहार में लाने के लिए आम पाक तो क्या विद्वान् ज्योतिषियों को भी मूलग्रन्थ में काफी इधर उधर भटकना पड़ता है यह रचना इस अभाव की पूर्ति करती है हजारों मूल पाराशरी श्लोकों का सार क्रमबद्ध, तुरन्त इस्तेमाल करने में आसान तरीके से पेश करते हुए यहां समुद्र को एक कलश में पेश करने का अकिंचन प्रयास किया गया है

महर्षि पराशर के सिद्धान्तों की आत्मा का साक्षात्कार;

लगभग 4500 श्लोकों का सम्पूर्ण सारग्राही वास्तविक उदाहरण सहित विवेचन;

ग्रह राशि क्षत्र का विवेचन;

विशेष लग्नों का विचार;

सोलह वर्गो का स्पष्ट विचार;

बारह भावों का फल कहने के नियम;

राजयोगादि विविध योग योगकारक ग्रहों का विवेचन;

आयुर्दाय मारक भेद;

व्यवसाय निर्णय, ग्रहों की अवस्थाएं;

बयालीस दशाभेद, दशाभेद, के आधारभूत नियम;

अष्टकवर्ग, रश्मि सुदर्शन चक्र;

ग्रहदोष, शाप उनकी शान्ति;

स्त्री नक्षत्र जातक; नाड़ी मुहूर्त विचार;

विविध विषय विवेचन

 

 

अनुक्रमणिका

 

1

ग्रह विचार

12-19

2

उपग्रह (अप्रकाश ग्रह) विचार

20-24

3

राशि विचार विशेष

25-45

4

लग्न विचार

46-55

5

भाव विचार

56-82

6

विविध योग विचार

83-91

7

राजयोग विचार

92-96

8

धनयोग विचार

97-99

9

कार्यक्षेत्र विचार

100-103

10

ग्रहदशा विचार

104-118

11

राशिदशा विचार

119-144

12

दशाफल विचार

145-153

13

अष्टकर्ता विचार

154-166

14

ग्रहरश्मियों का विचार

167-168

15

सन्यास योगों का विचार

169-171

16

ग्रह भाव बल का स्पष्ट विचार

172-184

17

इष्ट कष्ट या शुभ अशुभ बल विचार

185-190

18

आयुर्दाय विचार

191-201

19

स्त्री ज्योतिष विचार

202-206

20

पूर्वशाप विचार

207-216

21

विविध विषय विचार

217-221

 

 

 

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