'धर्म' शब्द अत्यंत व्यापक है और वह समस्त प्राणियों तथा समस्त महाभूतों के गुण और लक्षण तथा सामर्थ्य एवं वृत्ति को दर्शाता है। मनुष्य के संदर्भ में धर्म का अर्थ है मानव धर्म। मानव के लिए सनातन धर्म में धर्मशास्त्रीय विधान एवं प्रावधान व्यापकता से विवेचित हैं। वस्तुतः भारतवर्ष में धर्मशास्त्रों का प्रणयन अत्यंत प्राचीन काल में हुआ था और इस प्रकार हजारों वर्ष पूर्व से धर्मशास्त्र अस्तित्व में हैं।
इस संदर्भ में समकालीन भारत राष्ट्र में हिंदू समाज की स्थिति को सम्यक् रूप से समझने के लिए सर्वप्रथम धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित मानव धर्म के सभी पक्षों को समझना आवश्यक है। वर्तमान भारत में राज्य का जो स्वरूप है, उसमें सनातन धर्म की क्या विधिक स्थिति है, इसे भी जानना आवश्यक है और फिर इस संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में समकालीन भारत राष्ट्र में हिंदू समाज की स्थिति और स्वरूप के विषय में स्पष्टता अपेक्षित है।
धर्मशास्त्रों में धर्म संबंधी विस्तृत विवेचना है। अत्यंत प्राचीनकाल से धर्मशास्त्रों के अंतर्गत बहुत से विषयों की विवेचना होती रही है। इनमें से आधारभूत रूप से महत्त्वपूर्ण है धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित मानव धर्म। उल्लेखनीय है कि मनुस्मृति का मूल नाम मानव धर्मशास्त्र ही है। ऋग्वेद में मनु को ही मानव जाति का पिता कहा गया है।
तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है कि मनु ने जो कुछ कहा है, वह मनुष्य के लिए औषधि है, अर्थात् उसमें सदा स्वस्थ और रोगरहित एवं सबल रखने की विधि है। यही वात ताण्ड्य-महाब्राह्मण में भी कही गई है।
महाभारत में अनेक स्थलों पर मनु का उल्लेख है। यह भी कहा गया है कि मनु राजशास्त्र प्रणेता हैं। इसके साथ ही ब्रह्म द्वारा दिए गए उपदेशों और ज्ञानशास्त्र को विशालाक्ष, इंद्र, बाहुदंतक, बृहस्पति एवं शुक्राचार्य ने संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया। शांतिपर्व में लिखा है कि स्वायंभुव मनु के लिखे ग्रंथ के आधार पर ही शुक्राचार्य और बृहस्पति ने अपने-अपने ग्रंथों का प्रणयन किया।
इस प्रकार लेखन की प्राचीनतम परंपरा का उल्लेख भारतवर्ष में हुआ है। यूरोप में जहाँ लेखन की कोई प्राचीन परंपरा उपलब्ध नहीं थी, वहाँ उन्होंने वाचिक परंपरा के जरिए प्राचीन बातों को याद रखा और इसे ही 'ओरल ट्रेडिशन' कहा गया। रोचक बात यह है कि 20वीं शताब्दी में यूरोपीय ईसाइयों ने भारत में भी अपने यहाँ की नकल में 'ओरल ट्रेडिशन' की बात कह दी और उनके उत्साही अनुयायियों ने भारत में भी मुख्यतः वाचिक परंपरा होने की बात लिखनी शुरू कर दी। जबकि ज्ञात इतिहास में और उपलब्ध सभी ग्रंथों तथा साक्ष्यों के अनुसार भारत में प्राचीनतम काल से लेखन और अध्यापन की परंपरा रही है।
मनु महाराज कहते हैं कि अनादि परमेश्वर ने कर्मों का विवेक और ज्ञान प्रदान किया है तथा धर्म और अधर्म का स्वरूप निश्चित किया है और यह स्पष्ट बताया है कि धर्म से ही सुख प्राप्त होगा और अधर्म से दुःख। मनुष्य में द्वंद्वात्मक भाव सदा रहते हैं और उसे पुरुषार्थपूर्वक धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि सुख उसी में है।
उल्लेखनीय है कि वैदिक संहिताएँ और श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र तथा धर्मसूत्र हिंदू समाजशास्त्र के आधार रहे हैं। श्रीमद्भगवद्गीता को समस्त उपनिषदों का और भारतीय तत्त्व ज्ञान का सार कहा गया है। अतः गीता सबसे महत्त्वपूर्ण समाजशास्त्रीय ग्रंथ है। वाल्मीकिय रामायण और महाभारत के अनेक पर्वों में समाजशास्त्रीय मान्यताओं और आधारों का विस्तृत विवेचन है। साथ ही मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारदी स्मृति, बृहस्पति, अंगिरा, शंख, पाराशर एवं कात्यायन स्मृति सहित अनेक धर्मशास्त्र हैं, जिनका प्रतिपाद्य सनातन धर्म के अनुयायियों के जीवन में प्रतिफलित होता रहा है। लोक-व्यवहार में आने वाले नियमों, मान्यताओं, परंपराओं और कसौटियों का प्रतिपादन धर्मशास्त्र करते हैं। इनमें से प्रत्येक की टीकाएँ और भाष्य समाज में 19वीं शताब्दी तक व्यवहार के निर्णायक शास्त्र रहे, जिनमें मेधातिथि और गोविंदराज तथा कुल्लूक की मनुस्मृति पर टीका मुख्य थी। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य स्मृति पर विश्वरूप और विज्ञानेश्वर की टीकाएँ प्रसिद्ध हैं। टीकाओं का यह क्रम 19वीं शताब्दी तक निरंतर चलता रहा है।
उदाहरणस्वरूप हम मिताक्षरा टीका को ले सकते हैं, जिसका अनुपालन 19वीं शताब्दी में हो रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में कार्यरत कर्मचारियों ने सती की कुछ घटनाओं को बंगाल में अतिरंजित रूप से प्रचारित किया। जबकि यह तथ्य छुपा लिया गया कि याज्ञवल्क्य स्मृति की मिताक्षरा टीका में प्रतिपादित विधवा स्त्री का पति की संपत्ति में प्रथम अधिकार होता था। इसलिए परिवार के लोग आशंकित रहते थे कि कहीं उन्हें संपत्ति में कोई हिस्सा न मिले।
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