लेखक परिचय
प्रो. गोपाल भारद्वाज जोधपुर के विश्वविद्यालय सहित अन्य विश्वविद्यालयों एवं उच्च शिक्षा व शोध की संस्थाओं में एन्थ्रोपोलॉजी-सोशियोलॉजी के शिक्षण व शोधकर्मी समाजविज्ञानी रहे हैं। विषयगत लेखनों, अनुवादों, शोध प्रकाशनों सहित साहित्य, पत्रकारिता, मीडिया, लघु फिल्म आदि के अंतर्गत सतत सृजेता व सक्रिय रहे प्रो. भारद्वाज एक जाने-माने विचारक, संवाद निर्वाहक, एकेडेमिक एक्टिविस्ट एवं लोकशिक्षणनिष्ठ रहे हैं। "उक्त सभी, भले ही, शिक्षा, आजीविका व कर्मशील सक्रियता के मेरे क्षेत्र रहे हों, किन्तु यह भी मुझे कैसी आत्ममुग्ध प्रवंचना लगती है (प्रसाद जिसे 'गर्वरथ में तुरंग सा जुतना' कहते हैं) कि अपने विविध प्रकाशनों, सम्मानों, पुरस्कारों एवं कृतित्व आदि की सूची भी मैं यहां दूं, कि किन्हें क्या वास्ता रहा है इनसे, और क्या रहेगा भी? हां, गीता व उपनिषदों की उंगली पकड़ी तो संभव है कि इनके मेरे पद्यानुवाद समय पथ पर बने भी रह सकें!" "गीता व उपनिषदों का प्रभाव घटित होगा तो व्यक्ति में कैसा पुरुषार्थ तो कर्मशील रहेगा किन्तु कौनसी प्रवृत्तियां गौण भी हो जाएंगी, कैसे सार्थक जीवन के रूप में..."
पुस्तक परिचय
"गीता व उपनिषदों को संस्कृत व दर्शन के आचार्य, संत, संन्यासी, धर्मगुरु, प्रवचनकर्ता, संस्कृत व दर्शन के पढ़ाने व पढ़ने वाले शिक्षाकर्मी आदि जिस रूप में लेते हैं उनसे इक्कीसवीं शताब्दी के बुद्धिजीवियों व सृजनकर्मियों, शिक्षकों व शोधकर्ताओं, विविध विषयों के वैज्ञानिकों, प्रशासन व प्रबंधन के पदधारियों, इंजीनियर डॉक्टर-विधिवेत्ता आदि आधुनिक व्यवसायकर्मियों (प्रोफेशनल्स), सैन्य व सुरक्षाकर्मियों, राजनेता व जनप्रतिनिधियों, स्वास्थ्य-योग-संतुलित जीवन में रुचि रखने वालों, आज के युवकों तथा अन्यान्य जिज्ञासुओं के लिए इन ग्रंथों में जो सुलभ है तथा जो आवश्यक व अनिवार्य है, क्या उसकी प्राप्ति व पूर्ति होती है? आज के समय का हमारा आधुनिक जीवन जितना अधिकाधिक भौतिक, भोगोपभोगवादी, समस्या व संकटग्रस्त तथा आधा-अधूरा व सिमटा-सिकुड़ा होता जा रहा है, उससे बचाव और एक बेहतर व संतुलित जीवन के रचाव के लिए, जैसा कि अनेक प्रबुद्ध विचारकों, ज्ञानियों-गुणियों और अनुभव पाए व्यक्तियों ने माना है, गीता व उपनिषदों के अध्ययन-संलगन का भी निश्चित ही योगदान हो सकता है! गीता व उपनिषदों के मेरे पद्यानुवादों का, कुछ तो यह आशय व ऐसी अपेक्षा भी है..."
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