किसी भी देश और समाज के निर्माण में पत्रकारिता की विशिष्ट भूमिका होती है। दैनंदिन जीवन में विविध प्रकार की गतिविधियों के संकलन में मानवजाति का तापमान पत्रकारिता के माध्यम से मापा जा सकता है। यह वह कसौटी है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण जनता के बाह्य और आन्तरिक व्यक्तित्व और परिवेश को उद्घाटित करने में सफलता मिलती है। समकालीन संदर्भ में इसका दायित्व और बढ़ गया है, क्योंकि आधुनिक पत्रकारिता विज्ञान के साथ गठबंधन पर उस चरम शिखर पर पहुँचने की घोषणा कर रही है, जहाँ से जमीन की पड़ताल भी आवश्यक है और आकाश का व्योमविहारी दृश्य भी अवलोकनीय है। पत्रकारिता के अन्तर्गत रेडियो और दूरदर्शन को ग्रहण कर लेना जहाँ उसके जीवन-दर्शन को व्यापक बनाने की ओर विनिर्दिष्ट करता है वहीं इसकी गुणवत्ता सह-आत्मालोचन के लिए भी प्रेरित करता है। समकालीन पत्रकारिता की बाहें इतनी लम्बी है कि उसमें वह सबकुछ समाहित है जिसकी विवक्षा हम आज की जिन्दगी में पाते हैं। विषय की व्यापकता और समकालीन जिन्दगी के अहसास ने मुझे इस संदर्भ में सोचने-विचारने के लिए उस समय से विवश किया जबसे मैं एम०ए० हिन्दी में विशिष्ट पत्र के रूप में 'पत्रकारिता' को रखी।
'समकालीन हिन्दी पत्रकारिता' की उपादेयता आठ अध्यायों में वर्गीकृत है। समकालीनता तथा आधुनिकता एक ऐसा व्यापक शब्द है, जिसे पारिभाषित करना एक कठिन कार्य है। इसे परम्पराबोध के साथ-साथ देखा परखा जा सकता है। इसलिए प्रथम अध्याय के 'पूर्व-पीठिका' के रूप में रखा गया है। इसे पत्रकारिता के ऐतिहासिक विकास को ध्यान में रखकर पत्रकारिता की प्रारंभिक स्थिति, भारतेन्दु युग और स्वतंत्रता पूर्व-युग के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इससे इतिहासबोध के साथ-साथ समकालीन स्थिति को जोड़ने में सुविधा हुई है। इस व्यापक परिदृश्य को संकेतात्मक रीति से स्पष्ट किया गया है। प्रथम अध्याय तो रीढ़ की हड्डी है।
द्वितीय अध्याय में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, पत्रकीय तथा अन्यान्य परिवेश के रूप में वस्तुस्थिति से साक्षात्कार है। मेरी मान्यता है कि प्रत्येक पत्रकार अपने परिवेश की संवेदना से व्यापक सामग्री ग्रहण करता है और पाठकों तक पहुँचाता है। इसलिए प्रमुख तत्त्वों के संग्रहण में परिवेश की उपयोगिता को रेखांकित किया गया है। इसमें शोध का आधारफलक प्रतिबिम्बित हुआ है।
तृतीय अध्याय 'पत्रकारिता की विकास दिशा' से संबंधित है। इसमें विकास दिशा को भिन्न-भिन्न रूपों में दर्शाने का विनम्र प्रयास है। इसके आधार पर आलोचनात्मक दृष्टि उपलब्ध करने में सहायता मिली है। इस अध्याय की पूर्णतः संगति चतुर्थ अध्याय में हुई है।
चतुर्थ अध्याय में 'पत्रकारिता के विविध रूप' का अध्ययन दो भागों में विभक्त किया गया है। प्रकाशन की दृष्टि से दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, वार्षिक पत्रिकाओं का व्योरा देते हुए उसके मूल्यांकन की भूमिका प्रस्तुत की गई है। विषयवस्तु की दृष्टि से पत्रकारिता के अनेक रूप हो सकते थे, किन्तु इन्हें दस भागों में विभक्त किया गया है। अन्य रूपों को इन्हीं विभाजनों में समाहित करने का विनम्र प्रयास है। ब्रेल पत्रकारिता समकालीन पत्रकारिता की अन्यतम उपलब्धि होने के कारण महत्त्वपूर्ण है। इसलिए इससे संबंधित जो भी सामग्री मिल सकी उसकी परिचर्चा मैंने परिचयात्मक रूप में कर दी है। इस अध्याय तक आते-आते परिदृश्य स्पष्ट हो गया है। आगे के सभी अध्यायों में इसका विनिमेय पक्ष मूल्यांकन के साथ उपलब्ध है।
पंचम अध्याय 'पत्रकारिता की विशिष्ट उपलब्धियाँ' से संबंधित है। पैंतालिस वर्षों की अनेक उपलब्धियों को दो रूपों में रखकर देखने का प्रयास किया गया है। सम्पादन कला की दृष्टि से इसके अनेक आयाम उपस्थित किये गए हैं तथा सामाजिक संदर्भ की दृष्टि से भी समकालीन पत्रकारिता का मूल्यांकन किया गया है। मूल्यांकन की कई रीतियाँ और पद्धतियाँ हो सकती थीं किन्तु सभी व्यावर्तक दृष्टिकोण को दो रूपों में समाहित कर लेने में आवश्यक प्रतीत हुई। इस अध्याय में इसकी विवक्षा है।
षष्ठ अध्याय 'पत्रकारिता और सरकारी नीति' से संबंद्ध है। समकालीन पत्रकारिता के क्षेत्र में जितनी उपलब्धियाँ हासिल हुई उनके संबंध में सरकार की क्या नीति रही-उनकी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं का इजहार करना आवश्यक था। इसलिए विविध पत्रकार संगठन, उनकी मान्यताएँ, उनके पारस्परिक द्वन्द्व और संघर्ष, प्रेस आयोग और सरकारी नीति, बदलते हुए परिवेश के साथ वेजबोर्ड की मान्यताओं तथा प्रेस कानून की परिचर्चा आवश्यक समझी गई। इनकी विशद् चर्चा से शोध को सम्पुष्ट किया गया है।
सप्तम अध्याय में पत्रकारिता के आवश्यक परिणाम के रूप में जन-संपर्क को आधार मानकर जनसंपर्क माध्यम के रूप में 'समकालीन पत्रकारिता की भूमिका' को स्पष्ट किया गया है। इस पर विस्तार से बहुत सारी बातें हो सकती थीं किन्तु इसके तीन उपविभाग बनाकर सभी को इसी के अन्तर्गत रखने का प्रयास में की हूँ। पत्र-पत्रिकाएँ जनसंपर्क का सबल माध्यम रही है और आज भी हैं। रेडियो और दूरदर्शन भी जनसंपर्क के सशक्त माध्यम सिद्ध हो रहे हैं। समकालीन संदर्भ में इसकी उपयोगिता को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । किन्तु, इसका यह अभिप्राय नहीं कि रेडियो और दूरदर्शन के आगमन से पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया-बेरौनक हो गई है। इसमें तीनों के अपने-अपने महत्त्व को दर्शाते हुए उनके गुण-दोषों पर सांकेतिक विवरण दिया गया है। मेरी यह मान्यता रही है कि वैज्ञानिक संयंत्र विकास का परिणाम है लेकिन इससे सर्वाधिक सबल स्तंभ 'पत्र-पत्रिका' का अवमूल्यन किसी रूप में नहीं हुआ है।
अष्टम अध्याय आलोचनात्मक निष्कर्ष के आधार पर अपनाये गये सार तत्त्वों का संकेत है। जिसमें 'पत्रकारिता की सीमाओं' को दर्शाने का प्रयत्न लक्षित है । इस सीमा निर्धारण में मैंने ऐतिहासिक दृष्टि का उपयोग किया है।
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