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वील्होजी की वाणी में दार्शनिकता- Veelhoji ki Vani Mein Darshanikta

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Specifications
Publisher: Jambhani Sahitya Academy, Rajasthan
Author Maya Bishnoi
Language: Hindi
Pages: 87
Cover: HARDCOVER
9x6 inch
Weight 250 gm
Edition: 2012
ISBN: 9788192537535
HCD178
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Book Description
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पुस्तक परिचय
साधु-संतों के उपदेशामृत के दो प्रमुख उद्देश्य रहे हैं-एक अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियों को वाणी देना और द्वितीय जन समुदाय को आत्मज्ञान की प्रेरणा देना। ऐसे ही एक संत पुरुष थे वील्होजी। उन्होंने भी अपनी वाणी में ऐसा कुछ कहा जिससे असंख्य लोगों ने प्रेरणा ली और शांति अनुभव की। वील्होजी का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब पानीपत की प्रथम लड़ाई हो चुकी थी। देश में मुगलों का शासन स्थापित हो चुका था। खानवां के युद्ध में मेवाड़ के राणा सांगा भी हार चुके थे। देश में इस्लाम का प्रचार अधिक होने लगा था। वील्होजी के गुरु जाम्भोजी (1451-1536 ई.) भी अन्तर्ध्यान हो चुके थे। ऐसे विकट समय में संत वील्होजी ने बिश्नोई पंथ की बागडोर संभाली। पंथ का सीधा सा अर्थ है-रास्ता। एक ऐसा रास्ता जिस पर सभी चल सकते हैं। बिश्नोई पंथ भी एक ऐसा ही पंथ है, जिसमें सभी धर्मों, जातियों एवं पंथों के लोग शामिल हुए थे, जिसकी स्थापना गुरु जाम्भोजी ने की थी। संत वील्होजी ने भी उसी पंथ पर चलते हुए इस कार्य को आगे बढ़ाया। आज जिस पर्यावरण प्रदूषण की बात जो लोग करते हैं, उसको सर्वप्रथम गुरु जाम्भोजी ने ही पहचाना था और उनके शिष्य वील्होजी ने अपने 'खुटे कोरड़े' के सिद्धान्त से इसकी मुनादी की थी पर्यावरण संरक्षण के लिए सर्वप्रथम बलिदान करमां और गोरां ने वि.सं. 1661 में रामासड़ी गांव में दिया था। जिस का उल्लेख वील्होजी की साखी में बाखूबी हुआ है। गुरु जाम्भोजी स्वयं विष्णु थे और उन्होंने लोगों को भी विष्णु स्मरण का संदेश दिया था, जिसका उल्लेख सर्वप्रथम तेजोजी चारण ने अपने ग्रंथ 'विसन विलास' में किया है। इसी बात का जिक्र वील्होजी ने अपनी रचना विसन छतीसी में किया है। संत वील्होजी ने अनेक कथा-काव्यों, साखियों, हरजसों, दूहों साखियों की रचनाएं की थी, जिनमें मानव कल्याण की सभी बाते हैं। उनका एक हरजस देखिये अलाह अलेख निरंजण देव, किण विध करूं तुम्हारी सेव। उनकी वाणी में भी ऐसी ही दार्शनिक बातें कूट-कूट कर भरी हुई हैं, जिसको समझाने का प्रयत्न श्रीमती माया बिश्नोई ने किया है। आशा है इस पुस्तक को पढ़ने से आम पाठक के मन में जिज्ञासा उत्पन्न होगी और वह गुरु जाम्भोजी, विश्नोई पंथ और संत वील्होजी के विषय में अधिक जानने को उत्सुक होगा। पुस्तक लेखन के लिए श्रीमती माया बिश्नोई को एवं पुस्तक प्रकाशन के लिए जांभाणी साहित्य अकादमी, बीकानेर को बहुत-बहुत बधाई हो।

लेखक परिचय
डॉ. माया बिश्नोई जन्म: 28 दिसम्बर, 1974 गाँव शेरेका, जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान) शिक्षा महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर से हिन्दी साहित्य विषय सहित स्नातक, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र से एम.ए. (हिन्दी) एवं बी.एड. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र से 'वील्होजी की वाणी में दार्शनिकता' विषय पर एम. फिल (हिन्दी) हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार से अंग्रेजी-हिन्दी अनुवाद स्नातकोत्तर डिप्लोमा राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से 'मृणाल पांडे के साहित्य में स्त्री-विमर्श के विविध आयाम एक अध्ययन' विषय पर पी.एच.डी. (हिन्दी) प्रकाशन : प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों में अनेक लेख प्रकाशित रूचि : अध्ययन, लेखन एवं सम्पादन अध्यापन अनुभव : कोलम्बस उच्च विद्यालय, हिसार (हरियाणा) न्यू कल्पना चावला शिक्षण संस्थान, चिकनवास, हिसार (हरियाणा)

भूमिका
मध्यकालीन सन्त साहित्य में बिश्नोई पंथ के प्रवर्तक गुरु जम्भेश्वर का विशेष स्थान हैं। संतों की सामाजिक परिवर्तन में विशेष भूमिका रही है। जो उपदेश गुरु जम्भेश्वर ने दिये कालान्तर में उनका प्रचार-प्रसार उनके शिष्यों ने किया। श्रुति परम्परा में बिश्नोई सन्तों ने उनकी वाणी को सुरक्षित रखा। गुरु जम्भेश्वर के अन्तर्धान होने के बाद उनकी परम्परा के मुख्य शिष्य वील्होजी ने उनकी शिक्षाओं को आधार मानकर अनेक रचनाऐं की, जिनमें गुरु जम्भेश्वर का चरित्र चित्रण तो है ही, इसके साथ ही हमें इनमें मध्यकालीन भक्ति-साहित्य का प्रवाह भी देखने को मिलता है। एम. फिल. (हिन्दी) में लघु शोध प्रबन्ध लिखने के लिये विषय चयन का प्रश्न जब मेरे सामने उपस्थिति हुआ, तो मेरा ध्यान अनायास ही डॉ. कृष्णलाल बिश्नोई द्वारा लिखित ग्रन्थ 'वील्होजी की वाणी की ओर गया। मैंने सोचा क्यों न इस विषय पर नवीन दृष्टिकोण से लिखा जाए। मेरा जन्म बिश्नोई समाज में होने के कारण मुझे वील्होजी के बारे में प्रारम्भिक जानकारी थी ही, मैंने उनकी साखियों, कथाएँ, हरजस आदि गुरु जम्भेश्वर के जागरण में सुन रखी थी। इसका एक दूसरा कारण यह भी रहा कि वील्होजी का जन्म स्थान रेवाड़ी (हरियाणा) था, परन्तु उनका कर्म क्षेत्र मारवाड़ रहा। यह कैसी विडंबना रही कि ऐसे सन्त पुरुष की वाणी से हम हरियाणा वासी अनभिज्ञ ही रहे। मैंने सोचा क्यों न इस लघु शोध द्वारा मानव मात्र को उनकी वाणी में दार्शनिक तत्त्व का परिचय करवाया जाए। विषय के चयन के सम्बन्ध में जब मेरी बात डॉ. बाबूराम, प्राध्यापक, हिन्दी-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरिणाया से हुई, तो उन्हें भी यह नवीन विषय बहुत पसन्द आया। उनके कुशल निर्देशन में इस लघु शोध प्रबन्ध का कार्य सन् 2000 में सम्पन्न हुआ। जिसके लिए मैं उनका आभार व्यक्त करती हूँ। इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करने की योजना डॉ. कृष्ण लाल विश्नोई की रही है। इस कार्य में उनका दिशा निर्देश हमे समय-समय पर मिलता रहा है। शोध कार्य को वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित रूप देने के लिये प्रस्तुत लघु शोध प्रबन्ध को पांच अध्यायों में विभाजित किया गया है।

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