गौतम बुद्ध का जन्म ईसा की छठी शताब्दी पूर्व (563 ई.पू.) में हुआ था। गौतम बुद्ध का जन्म लम्बिनी (कपिलवस्तु) नामक शालवन में हुआ था। प्राचीन कोशल जनपद के प्रधान नगर कपिलवस्तु के शाक्य लोगों के गणराज्य में सिद्धार्थ का जन्म हुआ था। गौतम बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। गौतम बुद्ध का अन्य नाम तथागत, अर्हत्ता है। गौतम बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन तथा माता का नाम महामाया था। सिद्धार्थ के जन्म के कुछ दिन बाद महामाया अपनी शरीर को त्याग दिए। महामाया के महापरिनिर्वाण के बाद सिद्धार्थ का लालन-पालन इनकी विमाता प्रजापति गौतमी ने की। तथागत का जन्म, सम्बोधि एवं महापरिनिर्वाण पूर्णिमा के दिन हुआ था। सिद्धार्थ की पत्नी का नाम यशोधरा और पुत्र का नाम राहुल था। गौतम बुद्ध का महापरिनिर्वाण 426 वि.पू. अस्सी वर्ष की उम्र में मल्ल गणतन्त्र की राजधानी कुशीनगर में हुआ। कुशीनगर वर्तमान समय में कसया, जिला गोरखपुर उत्तरप्रदेश में है।
भगवान बुद्ध बाल्यावस्था से ही दूसरे व्यक्ति को दुःखी देखकर स्वयं भी दुःखी हो जाते थे। मानव के दुःख को कैसे दूर किया जा सकता है? इस बात के विषय में गौतम बुद्ध चिंतन करते रहते थे। कहा जाता है कि एक दिन गौतम बुद्ध महल के बाहर टहल रहे थे, इसी समय उन्होंने चार व्यक्ति को देखा। प्रथम रोगग्रस्त व्यक्ति को देखा, दूसरा वृद्ध व्यक्ति को देखा, तीसरा मृत व्यक्ति को देखा तथा अन्त में चौथा संन्यासी व्यक्ति को देखा। इन दृश्यों का सिद्धार्थ के भावुक हृदय पर बहुत प्रभाव पड़ा। उनकी संसार से विरक्ति पक्की हो गई। दुःख से मानव क्यों दुःखी होते हैं? दुःख का क्या कारण है? दुःख को कैसे दूर किया जा सकता है? क्या दुःख का अन्त संभव है? इत्यादि प्रश्न उनके हृदय एवं मन में उत्पन्न होते थे। अन्त में उन्होंने सांसारिक सुख को त्याग कर ज्ञान प्राप्त करने का निश्चय किया। सिद्धार्थ मानव के दुःख का अन्त' करने का निश्चय कर लिया। इसी उद्देश्य से गौतम बुद्ध ने एक दिन रात में गृहत्याग कर दिए और संन्यास को अपनाया।
भगवान् बुद्ध गृहत्याग करने के बाद कई वर्षों तक गुरु की खोज में घूमते रहे। एक दिन उन्होंने आलारकालाम को गुरु बनाए। आलार कालाम के बाद रुद्रकरामपुत्र को गुरु बनाए। अन्त में स्वयं ज्ञान प्राप्त करने के लिए बोधगया के पास छह वर्षों तक तपस्या की। अन्त में बोधगया के पास 'उरुवेला' नामक स्थान में आर्य सत्यों का साक्षात्कार किया। भगवान् बुद्ध सर्वप्रथम काशी के निकट मृगदाव (इसिपत्तन-सारनाथ) में पंचवर्गीय भिक्षुओं के सामने अपने धर्म अर्थात् अपने ज्ञान का प्रथम उपदेश दिया। इस प्रथम उपदेश को बौद्ध-साहित्य में धर्मचक्रप्रवर्तन के नाम से जाना जाता है। भगवान् बुद्ध ने अपना उपदेश 'मागहीं (मागधी) में दिया। मागही को ही वर्तमान समय में पाली के नाम से जाने जाते हैं।
भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके ज्ञान को त्रिपिटक (तीन पिटक) में संकलन किया। बौद्ध ग्रन्थ तीन पिटक (पेटारी) हैं विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्मपिटक । 'विनय' का अर्थ है नियम। विनयपिटक में भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के आचरण से सम्बन्धित नियमों का उल्लेख है। विनयपिटक के तीन भाग हैं- सुत्तविभंग, खन्धक और परिवार। सुत्तपिटक में धर्म से संबंधित बातों का वर्णन है। सुत्तपिटक के पाँच निकाय (संग्रह) हैं अर्थात् पाँच बड़े विभाग हैं, यथा -दीघनिकाय, मज्झिम निकाय, संयुक्त निकाय, अंगुत्तर निकाय और खुद्दक निकाय।
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