है। इसे निर्जरा एवं मुक्ति का साधन माना गया है। का विशेष स्थान रहा है। ध्यान साधना को उच्चस्तरीय तप में परिगणित किया गया जैन धर्म-दर्शन के प्राचीन आगमों में एवं मध्यकालीन ग्रन्थों में ध्यान साधना दर्शनों के ध्यान सिद्धान्तों व प्रक्रियाओं में बहुत समरूपता भी है। विशेष रूप से हैं। पर साथ ही जैन धर्म के ध्यान सिद्धान्त तथा प्रक्रिया व अन्य भारतीय धर्म एवं जैन धर्म में ध्यान और बौद्ध धर्म को विपश्यना तो समतुल्य एवं समकालीन ही लगते हैं। ध्यान की दृष्टि से विभिन्न धर्मों में तुलनात्मक अध्ययन की स्वप्रेरणा मुझमें जगी एवं वर्तमान विपश्यनाचार्य श्रद्धेय श्री सत्यनारायण जी गोयन्का, जिनके अथक प्रयासों से विपश्यना का देश-विदेशों में प्रचार-प्रसार हुआ, ने भी मुझे इस जैन धर्म-दर्शन में ध्यान सिद्धांत व प्रक्रिया दोनों ही स्वतंत्र रूप से उपलब्ध प्रकार के अध्ययन के लिये प्रोत्साहित किया। इसके पूर्व परम श्रद्धेय आचार्य श्री हस्तीमल जी महाराज सा. एवं आचार्य श्री हीराचन्द जी महाराज सा. ने भी मुझे जैन धर्म में ध्यान और उसके प्रयोग व प्रसार करने के लिए निरन्तर प्रेरित किया। सर्वप्रथम जैन-आगम आचारांग सूत्र में 'विपश्यी' शब्द का प्रयोग हुआ है। अन्य शब्द आचारांग सूत्र में जो आये, वे हैं' पस्सना', 'अनुपस्सना' आदि। यह उल्लेखनीय है आचारांग सूत्र भगवान महावीर का प्रथम उद्बोधन था, जो उन्होंने करीब 2550 वर्षों पूर्व के समानार्थक शब्द बौद्ध धर्म के ग्रन्थों में ही प्रचलित है, किन्तु तुलनात्मक अध्ययन का दिया। सामान्यतः यह समझा जाता है कि ' अनुपस्सना', 'पस्सना', 'विपश्यना' आदि निष्कर्ष यह है कि उस समय भारत के विभिन्न धर्मों और विशेष रूप से श्रमण परम्पराओं में सामान्यतः एक ही शब्दावली का प्रयोग होता था। 'विपश्यना' या 'विपश्यी' आदि शब्द भी विभिन्न धर्मों व साधना प्रणालियों में उपलब्ध हैं। इसी प्रकार आनापान (आते-जाते श्वांस को देखने की क्रिया) शब्द का प्रयोग, जो विपश्यना क्रिया का अभिन्न अंग है, जैन ग्रंथों एवं अन्य धर्मों के ग्रंथों में भी है। विपश्यना पद्धति का मूल आधार 'यथाभूत तथागत' अर्थात् जो जैसा है उसको वैसा ही देखना है अर्थात द्रष्टा भाव व साक्षी भाव से देखना है। अपनी ओर से 'कुछ नहीं करना' है। अतः प्रत्येक अनुकूल-प्रतिकूल संवेदना के अनुभव के प्रति समभाव रखना होता है। इसमें राग-द्वेष का कोई स्थान नहीं है। समभाव पुष्ट करना ही इस साधना का लक्ष्य है।
कन्हैयालाल लोढ़ा का जन्म धनोप (जिला-भीलवाडा, राजस्थान) में मार्गशीर्ष कृष्णा द्वादशी संवत् 1979 में हुआ। आप हिन्दी में एम.ए. हैं तथा साहित्य गणित, भूगोल, विज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन, अध्यात्म आदि विषयों में आपकी विशेष रूचि है। आपकी लघुवय से ही सत्य-धर्म के प्रति अटूट आस्था एवं दृढ़ निष्ठा रही है। आपने जैन-जैनेतर दर्शनों का तटस्थतापूर्वक गहन मंथन कर उससे प्राप्त नवनीत को 300 से अधिक लेखों के रूप में प्रस्तुत किया है। आपका चिन्तन पूर्वाग्रह से दूर एवं गुणग्राहक दृष्टि के कारण यथार्थता से परिपूर्ण होता है। विज्ञान और मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में जैन धर्म दर्शन पुस्तक पर आपको स्वर्गीय प्रदीप कुमार रामपुरिया स्मृति पुरस्कार', 'दुःख-मुक्ति सुख प्राप्ति पुस्तक पर 'आचार्य श्री हस्ती-स्मृति-सम्मान पुरस्कार सकारात्मक अहिंसा शास्त्रीय और चारित्रिक आधार पुस्तक पर गौतम गणधर पुरस्कार तथा 'साहित्य-साधना पर मुणोत फाउण्डेशन पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। प्रस्तुत पातंजल योगसूत्र अभिनव निरूपण' कृति के अतिरिक्त आपकी निम्नलिखित प्रमुख कृतियाँ प्रकाशित है: दुःख-मुक्ति: सुख प्राप्ति, 2. जैन धर्म जीवन धर्म, 3. कर्म सिद्धान्त, 4. सेवा करें: सुखी रहें, 5. सैद्धान्तिक प्रश्नोत्तरी, 6. जैन तत्त्व प्रश्नोत्तरी, 7. दिवाकर रश्मियाँ, 8. दिवाकर देशना, 9. दिवाकर वाणी, 10. दिवाकर पर्वचिन्तन, 11. श्री जवाहराचार्य सूक्तियाँ, 12. वक्तृत्व कला, 13. वीतराग योग (लघु), 14. जैनागमों में वनस्पति विज्ञान, 15. जीव-अजीव तत्त्व, 16. पुण्य-पाप तत्त्व, 17. आखव संवर तत्त्व, 18. निर्जरा तत्त्व, 19. सकारात्मक अहिंसा, 20. सकारात्मक अहिंसा (शास्त्रीय और चारित्रिक आधार), 21. दुःख रहित सुख, 22. ध्यान शतक, 23. वीतराग योग, 24. कायोत्सर्ग, 25. जैन धर्म में ध्यान, 26. वीतराग ध्यान की प्रक्रिया, 27. Boundless Bliss 28. बन्ध तत्त्व, 29. मोक्ष तत्व, 30. विपश्यना ध्यान (मुद्रित है)। अखिल भारतीय जैन विद्वत् परिषद् के अध्यक्ष होने के साथ आप श्वेताम्बर, दिगम्बर दोनों जैन सम्प्रदायों के आगम-मर्मज्ञ जैन विद्वान् हैं। आप एक उत्कृष्ट ध्यान साधक, चिन्तक, गवेषक हैं। प्रस्तुत पुस्तक आपके जीवन, चिन्तक एवं सत्य दृष्टि का एक प्रतिबिम्ब है’
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