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चीता, बरड़ एवं मेर सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन (1700 ई. से 1950 ई. तक): Cheeta, Barad Evam Mer Sanskritik Evam Aitihasik Adhyayan (1700 E. Se 1950 E. Tak)

$28
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: Royal Publications, Jodhpur
Author Prabha Bhatt
Language: Hindi
Pages: 152
Cover: HARDCOVER
9.0x6.0 Inch
Weight 320 gm
Edition: 2022
ISBN: 9789391127107
HCE955
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Book Description

पुस्तक परिचय

 

सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद से उन्नीसवीं सदी के आरम्भ तक राजपूताना एक विस्तृत रण क्षेत्र रहा है। यहाँ का इतिहास शौर्य साहस देशभक्ति और आत्म त्याग का इतिहास है। यह वह वीर भूमि है जिसके सम्बन्ध में कर्नल टॉड ने ठीक ही लिखा है कि "राजस्थान में कोई छोटा राज्य भी ऐसा नहीं है जिसमें (यूरोप की) धर्मोपली जैसी रणभूमि न हो और शायद ही ऐसा कोई नगर मिले जहाँ ग्रीक वीर लियोनिडास के समान मातृभूमि पर बलिदान होने वाला वीर पुरुष उत्पन्न न हुआ है। अपनी गौरव गाथाओं की स्मृतियों में लपेटा हुआ यह प्रदेश अद्वितीय है, इतने महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के इतिहास का इसमें निवास करने वाली जातियों के सामाजिक परिवेश का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक पहलुओं का उनके भूत व वर्तमान की एक साफ दृष्टि लेकर अनुसंधान कर एक सांस्कृतिक अध्ययन का धरातल तैयार करना एक सामाजिक वैज्ञानिक के लिये महत्त्वपूर्ण कदम होगा तथा इस अभूतपूर्व राज्य के लिये महत्त्वपूर्ण देन होगी। हम स्वाभाविक तौर पर दिन-प्रतिदिन के अनुभव, भौतिक एवं वैचारिक विश्वासों के दायरों की परतों में गुजरते हुए, आशाओं व स्वप्नों की दुनिया से विचरण करते हुये, हमारे पुरातन व्यतीत हुए कल पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि गहरी जड़ों वाले प्रभाव हमारे वर्तमान को प्रभावित करते हैं। इसी परिपेक्ष में इतिहास साक्षी है कि राजस्थान राजाशाही व सामन्तशाही का गढ़ रहा है। जांगल प्रदेश, मत्स्य देश, राज्य मरू, राजपूताना आदि अवस्थाओं व नामों से गुजरता हुआ इस प्रदेश का अपने इतिहास में कर्नल टॉड के द्वारा वि. सं. 1886 (सन् 1829)2 में पहली बार 'राजस्थान' शब्द का प्रयोग हुआ। इस प्रान्त के 21 राज्य, 2 खुदमुख्तियार (जागीरें) और बीचों-बीच में एक छोटा-सा भाग अँग्रेजी इलाके का था जो अजमेर मेरवाड़ा के नाम से जाना जाता था 1. जेम्स टॉड-"एनल्स एण्ड एन्टीक्वीटीज ऑफ राजस्थान", जिल्द-एक (भूमिका सन् 1829 का संस्करण) । पिछली एक शताब्दी से भी अधिक समय से राजस्थान के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक जीवन में व्यापक परिवर्तन हुये। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के सूर्योदय के साथ-साथ सामन्ती शासन की समाप्ति देशी रियासतों का विलय व सम्पूर्ण क्षेत्र राजस्थान के रूप में उभरकर भारत राष्ट्र का राज्य बना। उसके इस प्रचण्ड परिवर्तन चक्र में अजमेर मेरवाड़ा अछूता नहीं रह सका। उसका भी इसमें विलय हुआ और आज यह राजस्थान राज्य का नाभिस्थल माना जाता है।

1. अजमेर-मेरवाड़ा : भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिचय :

ए अजमेर-मेरवाड़ा 25° 23 30" और 26° 41 अक्षांस तथा 73° 47 30" एवं 75° 27 0" देशान्तर के मध्य स्थित है। अजमेर-मेरवाड़ा जो वर्तमान में अजमेर जिले का एक भू-भाग है, 2771 वर्गमील क्षेत्र में फैला हुआ था। ब्रिटिश शासनकाल में अजमेर दो जिलों क्रमशः अजमेर एवं मेरवाड़ा में विभक्त था जिनका क्षेत्रफल क्रमशः 2069 और 641 वर्गमील था। अजमेर, उदयपुर एवं पाली जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में मेर जाति के निवास के कारण इन जिलों के सीमावर्ती क्षेत्र को मेरवाड़ा कहा जाता है। मेर जाति को प्राचीन शिलालेखों में मिहर, मेर एवं मेव नामों से उल्लेखित किया गया है। ब्रिटिश शासनकाल में अजमेर जिले में मेरों के कुछ प्रमुख गाँवों एवं ब्यावर का क्षेत्र सम्मिलित होने के कारण यह क्षेत्र अजमेर-मेरवाड़ा कहलाता था। उस समय इसमें 380 गाँव सम्मिलित थे। अरावली पर्वत की सुन्दर श्रृंखलाएँ जो दिल्ली से आरम्भ होती हैं, वेणी के आकार में बल खाती हुई अजमेर-मेरवाड़ा के उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम में फैली हुई है। इस क्षेत्र में अरावली पर्वत श्रृंखलाओं की 3075 फुट ऊँची 'गोरम' चोटी स्थित है, जो दर्शनीय है। अजमेर क्षेत्र सदैव से नदियों से वंचित रहा है। पुष्कर के समीप से लूनी नदी जिसका रूख प्रारम्भ से ही मारवाड़ की ओर है, इस क्षेत्र से एकदम रूठकर जाती दिखाई पड़ती है तथा दूसरी ओर बनास नदी जो ठीक इसके विपरीत दिशा में बहती है जो चम्बल नदी से जाकर मिलती है। इन दोनों प्रमुख नदियों के मुँह मोड़ लेने के कारण इस क्षेत्र का भाग्य एक प्रकार से श्रीविहीन हो गया। खारी व डाई नदियाँ जिले के दक्षिणी-पूर्वी भू-भाग के अंशों को ही प्रभावित करती हैं। सागरमती जो अजमेर की परिक्रमा-सी करती है, गोविन्दगढ़ में सरस्वती संगम करती हुई मारवाड़ में लूनी के नाम से प्रख्यात होकर कच्छ की खाड़ी में गिरती है। अजमेर में बहुत कम एवं अनिश्चित वर्षा (जिससे आये दिन अकाल तथा सूखे की स्थिति बनी रहती है) होती है,

2.ऐतिहासिक सन्दर्भ : अजमेर-मेरवाड़ा का विस्तृत भू-भाग जो आज अजमेर के नाम से विख्यात है, एक लम्बे समय तक सांभर के चौहान शासकों के अधीन रहा है। सांभर के चौहान शासकों की जिस शक्ति का आरम्भ वासुदेव के काल से हुआ था, वह शक्ति पृथ्वीराज के प्रथम पुत्र अजयराज के समय में अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। इसलिये भारतीय इतिहास में अजयराज के काल को साम्राज्य निर्माण का काल माना जाता है। 12 प्रसिद्ध इतिहासकार फरिश्ता ने अपनी पुस्तक 'तारीख-ए-फरिश्ता' में यह उल्लेख किया है कि अजमेर का अस्तित्व 997 ईस्वी में भी था, परन्तु समकालीन इतिहासकार फरिश्ता के इस मत से सहमत नहीं है। 13 'पृथ्वीराज विजय' में कहा गया है कि "अजयराज ने दिल्ली के मुसलमान शासकों से युद्ध करके अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा की एवं 1113 ईस्वी के आस-पास अजमेर (अजयमेरू) की स्थापना की जो बाद में चौहान साम्राज्य की राजधानी बना। ' '14 राजस्थान के प्रमुख इतिहासकार डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने 'राजस्थान का इतिहास' में अजयराज का वर्णन करते हुये लिखा है कि "उसने 1113 ईस्वी के लगभग अपने नाम से अजयमेरू (अजमेर) की स्थापना की। राजस्थान के ही एक अन्य प्रमुख इतिहासकार गोरीशंकर ओझा ने चित्तौड़ में प्राप्त कुछ प्राचीन सिक्कों एवं नये ऐतिहासिक शोधों के आधार पर यह प्रमाणित किया है कि अजयराज ने 1110 ईस्वी में अजमेर की स्थापना की। ओझा के अनुसार " अजयराज जो भारतीय इतिहास में अजयपाल के नाम से भी विख्यात है, 1110 ईस्वी के आस-पास इस क्षेत्र का शासक था। उसने प्रारम्भ में 'नग' नामक पहाड़ पर एक दुर्ग बनाने का प्रयास किया, परन्तु उसमें वह सफल नहीं हो पाया।

अक्षय अतीत की प्रतिध्वनि में इतिहास एवं संस्कृति के स्वर समवेत रूप से गुंजायमान रहते हैं जो संघर्ष और संक्रमण के युग में सांस्कृतिक इतिहास बोध के सूक्ष्म तत्व बनकर मानव के भावात्मक आग्रह में झलकते हैं। अरावली पर्वत श्रृंखला में आबाद चीता, मेर एवं बरड़ एक ऐसा ही जातीय समूह है जिसने इस्लाम और ईशाइयत के निरंतर संघर्ष के उपरांत भी अपने सनातन आस्था विश्वास से जीवन-मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखा। इस शोध-प्रबंध में आक्रान्ताओं के विध्वंस से दुर्ग एवं देवालिया की विखंडित वीथिकाओं में व्याप्त इतिहास की अंतर वेदना को पूर्ण जीवंतता के साथ पुनः उजागर किया गया है। यह शोध कार्य इस जातीय समूह की सांस्कृतिक चेतना का ही नहीं अपितु दुर्गों की विखंडित अट्टालिकों से मेरवाड़ा को देखने की इतिहास परक प्रवृत्ति है जो राजस्थान ही नहीं अपितु भारतीय मूल इतिहास वे सामाजिक सांस्कृतिक इतिहास की टूटती कड़ियों का पुनः संयोजन करती है। यह शोध कार्य भारतीय सनातन धर्म एवं क्षत्रिय गुणों से ओतप्रोत मरणा ने मंगल गिणे समर चढ़े मुख नूर के भाव को जीवित रखने वाली चीता, मेर, बरड़ जाति के गौरवशाली इतिहास का पुनः अंकन भी करता है। यह समाज धार्मिक सहचर्य एवं सहअस्तित्व का गुण सामाजिक समरसता का पर्याय है जहाँ एक ही परिवार में हिन्दू और मुस्लिम संस्कार साथ-साथ चलते हैं। शोध-प्रबंध लोकाचार में व्याप्त उन सांस्कृतिक तत्वों का उद्घाटक है जिससे वर्तमान के इतिहासविद् एवं युवा पीढ़ी अतीत से साक्षात्कार करेगी। इतिहास एवं सांस्कृतिक गवेषणा की इस प्रशस्ति में इतिहास अंधकार से प्रकाश और गतिमान होगा।

 

लेखक परिचय

 

डॉ. श्रीमती प्रभा भट्ट शिक्षा : एम.. (इतिहास), पीएच.डी. जन्म : हाथरस (यू.पी.), 22 अगस्त 1948 प्राध्यापन कार्य : मीरा कन्या महाविद्यालय उदयुपर, महारानी सुदर्शना महाविद्यालय बीकानेर, राजकीय महाविद्यालय अजमेर विभागाध्यक्ष : राजकीय महाविद्यालय अजमेर लोहिया राजकीय महाविद्यालय चुरू बी.आर. मिर्धा महाविद्यालय नागौर से राजकीय कन्या महाविद्यालय झुन्झुनू प्राचार्या पद से सेवानिवृत्त वर्तमान में अजमेर निवास.

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