पुस्तक परिचय
आर्यसमाज और डॉ० अम्बेडकर स्वर्गीय डॉ० कुशलदेव शास्त्री जी द्वारा लिखित महत्वूपर्ण पुस्तक है। यह पुस्तक आर्य समाज की सामाजिक सुधारक भमिका को केंद्र में रखते हुए डॉ० भीमराव अंबेडकर के साथ उसके वैचारिक एवं ऐतिहासिक संबंधों का गहन और प्रमाणिक अध्ययन प्रस्तुत करती है। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज ने वैदिक सिद्धांतों के आधार पर जाति आधारित भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध जिस सशक्त आंदोलन का संचालन किया, उसके प्रभाव और व्यापकता को इस कृति में तथ्यात्मक रूप से रेखांकित किया गया है। पुस्तक में यह स्पष्ट किया गया है कि गुण-कर्म-स्वभाव आधारित वर्ण व्यवस्था, स्त्री-शिक्षा, शूद्रातिशूद्र उत्थान, सामाजिक समता और मानव गरिमा जैसे विषयों पर आर्य समाज का दृष्टिकोण न केवल प्रगतिशील हैं, अपितु व्यवहारिक भी हैं। लेखक ने यह भी दर्शाया है कि डॉ० अंबेडकर आर्य समाज की इन सुधारवादी गतिविधियों, उसके नेताओं और उसके सामाजिक प्रयासों से भली-भाँति परिचित थे। हमें न केवल अम्बेडकर जी के निर्माण में आर्यसमाज के अभूतपूर्व योगदान का परिचय भी इसी पुस्तक के माध्यम से मिलता है अपितु कई संदर्भों में उन्होंने आर्य समाज की भूमिका को स्वीकार किया था। मनुस्मृति में जातिवाद समर्थक मिलावटी भाग के परित्याग और वेदों के पुरुष सूक्त आदि मन्त्रों की स्वामी दयानन्द कृत सत्य व्याख्या से ही जातिवाद की सामाजिक समस्या का निराकरण हैं। यह कृति प्रचलित धारणाओं और वैचारिक भ्रांतियों का तार्किक विश्लेषण करते हुए यह सिद्ध करती है कि आर्य समाज का आंदोलन केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय एकता और समरस समाज की स्थापना का एक व्यापक प्रयास था। भारतीय सामाजिक सुधार आंदोलनों, आर्य समाज के इतिहास और वैदिक मानवतावादी चिंतन को समझने के इच्छुक पाठकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है। हमारे देश की जातिवाद की सामाजिक समस्या का निराकरण जातिगत राजनीति करने वाले नेता नहीं अपितु निष्पक्ष, प्राणी मात्र को मनुर्भव की भावना से देखने वाले आचरणवान, स्वाध्याशील, त्यागी, तपस्वी विद्वान ही कर सकते हैं। यह ग्रन्थ ऐसे ही महान तपस्वी की कृति है।
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