आर्षकवि प्रणीत वाल्मीकि रामायण की कथा को आधार मानकर संस्कृत एवं हिंदी वाङ्मय में अनेक कृतियों का अध्ययन किया गया है। इसी संदर्भ में रामकथा की एक मुख्य पात्र उर्मिला को विस्मृति के गह्वर से निकालकर हिंदी साहित्य में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने 'साकेत' महाकाव्य की रचना की। संस्कृत साहित्य में पं. भवानीदत्त शर्मा के द्वारा 'सौमित्रिसुंदरीचरित' का प्रणयन किया गया। ध्यातव्य यह कि दोनों रचनाकारों ने कवीन्द्र रवीन्द्र के 'काव्येर उपेक्षिता नारी' एवं आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रचित 'कवियों की ऊर्मिला विषयक उदासीनता' से प्रभावित होकर उपर्युक्त उभयकाव्य की सर्जना की है।
'साकेत' या 'सौमित्रिसुन्दरीचरित' पर मनन-चिंतन नहीं हुआ है, ऐसा कहना समीचीन नहीं, पर तुलनात्मक दृष्टि से इनका अध्ययन अभी तक संभव नहीं हुआ है। फलतः यह विषय अत्यंत नवीन है। इस शोध-प्रबंध का मूलोद्देश्य इतिद्वय यथा 'साकेत' एवं 'सौमित्रिसुन्दरीचरित' का तुलनात्मक अध्ययन करना है।
इस परिप्रेक्ष्य में आधार ग्रंथ वाल्मीकि रामायण एवं अध्यात्म रामायण के परिपार्श्व में रखकर रामचरितमानस के कतिपय संवादों की विवेचना एक उपलब्धि के रमणीय उद्यान का दर्शन कराती है, जिसका अर्क समुचित स्थल पर लिए बिना गुप्तजी एवं शर्माजी नहीं रह सके। ऐसे में आधारग्रंथ ही नहीं अपितु पूरे उत्तरवर्ती हिंदी रामकाव्य परंपरा में तुलसी की पहचान अक्षुण्ण है और इसके आधार पर रचे गये दोनों ग्रन्थ अपने संवादों की सर्वोपरिता के साथ औचित्य का निर्वाह करते हुए सदा प्रासंगिक बने रहेंगे ऐसी मेरी मान्यता है।
शोध-प्रबंध के पहले अध्याय के भाग (क) में महाकवि मैथिलीशरणगुप्त के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है तथा भाग (ख) में 'साकेत' का सामान्य परिचय देकर उसकी विशेषताओं को रेखांकित किया गया है।
दूसरे अध्याय के भाग (क) में पं. भवानीदत्त शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर व्यापकता के साथ विचार किया गया है तथा भाग (ख) में शर्मा प्रणीत सौमित्रिसुन्दरीचरित का सामान्य आख्यान प्रस्तुत किया गया है।
तीसरे अध्याय में साकेत एवं सौमित्रिसुन्दरीचरित के कथानकों का संक्षिप्त विवरण अंकित किया गया है।
चौथे अध्याय में दोनों ग्रंथों की कथावस्तु एवं चारित्रिक साम्य-वैषम्य को गुणधर्म के आधार पर चिह्नित किया गया है।
पाँचवे अध्याय के भाग (क) में दोनों ग्रंथों की कथावस्तु के आधार पर प्रकाश डाला गया है। वहीं भाग (ख) में उभय रचनाकारों द्वारा कथानक में किए गये परिवर्तन एवं परिवर्द्धन का प्रभाव भी वर्णित है।
छठे अध्याय में उपसंहार है।
शोध-प्रबंध के पीयूषघट को पा लेने के लिए बेतहासा हाँफते हुए मुझ मृग के लिए निर्देशक ज्ञानवृद्ध, आकाशधर्मी, डॉ. रामगोपाल पाण्डेय के बहुमूल्य सुझावों, समय-समय पर आवश्यक निर्देशों हेतु मैं उनका सदा कृतज्ञ रहूँगा।
रामकथानुरागी पिता पं. गिरिजा तिवारी नित्य रामचरितमानस का पाठ करते रहे, माता तुलसी देवी तो विशेष पढ़ी लिखी न थी पर वह भी नियमित मानस पाठ करती रही। पिताजी तो मेरे अल्पवय में ही स्वर्गारोहण कर गये, पर माताजी का सान्निध्य परिणय संस्कार, प्राप्त करने तक रहा। उन्हीं के आशिष से मेरे मन में रामकथा के प्रति विशेष लगाव है, फलतः आज भी वर्ष में एक बार मानस पाठ अवश्य होता है और घर का वातावरण राममय दीखता है। नित्य ठाकुरजी के भोग लगने के बाद ही हमलोग भोजन करते हैं। अतः मैं उन दिव्यात्माओं को हृदय से नमन करता हूँ।
शोधकार्य के प्रति प्रारंभिक उत्साहकर्त्ता की कड़ी में देववाणी के सपूत डॉ. आचार्य कपिलदेव शर्मा (डी. लिट), डा. अच्युतानंद पाण्डेय 'वैद्यराज', साहित्यिक गुरू स्व. पं. चंद्रभूषण शर्मा 'भूषण' (असम के प्रथम हिंदी कवि), बाल्यकालीन पिता का साया सिर से उठने पर नंद की भूमिका निभानेवाले पं. दुःखहरण तिवारी जो अभी दिवंगत हो गये, उन सभी को शत-शत नमन।
शोध प्रज्ञता हेतु प्रेरणा-क्षीर पिलानेवाले मातुल श्री प्रदीप नारायण शर्मा, श्रीराम-सीता का आस्पद प्राप्त करनेवाले दम्पती श्री अम्बिका प्रसाद शर्मा 'पंकज' (कवि एवं साहित्यकार) एवं श्रीमती मिथिलेश देवी शर्मा, अग्रज द्वय श्री रामविनोद तिवारी, श्री दिनेश तिवारी (समाजसेवी), साहित्यिक गुरू के आत्मज (मेरे गुरूभाई) श्री सुरेश कुमार शर्मा एवं डॉ. अमलेश वर्मा आदि ने जो मेरी सहायता की है उसके लिए मैं आभार प्रकट करता हूँ।
अन्य सुविज्ञों ने मुझे सहयोग किया है, उनमें अग्रणी हैं गुरूदेव डा. जगदीश नारायण चौबे (अवकाश प्राप्त प्रो. पटना विश्वविद्यालय), डॉ. उपेंद्र झा (कुलपति), डॉ. उमेश शर्मा (पूर्व कुलपति), डॉ. श्रीपति त्रिपाठी (धर्मशास्त्र विभाग) एवं अमरनाथ शर्मा (सहायक) का. सिं. द. संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा, डॉ. (श्रीमती) मिथिलेश कुमारी मिश्र (दीदी)-उपनिदेशक बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, वर्त्तमान प्राचार्य डॉ. बालमुकुंद मिश्र एवं सेवानिवृत प्राध्यापक प्रो. लालबाबू तिवारी (श्री गणेश गिरिवरधारी संस्कृत महाविद्यालय बख्तियारपुर, पटना) आदि का मैं विशेष आभारी हूँ।
Hindu (हिंदू धर्म) (13739)
Tantra (तन्त्र) (1004)
Vedas (वेद) (727)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2084)
Chaukhamba | चौखंबा (3180)
Jyotish (ज्योतिष) (1561)
Yoga (योग) (1169)
Ramayana (रामायण) (1334)
Gita Press (गीता प्रेस) (723)
Sahitya (साहित्य) (24809)
History (इतिहास) (9051)
Philosophy (दर्शन) (3634)
Santvani (सन्त वाणी) (2629)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist