भूमिका
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्रतिरोध और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का इतिहास भगवान बिरसा मुंडा (1875-1900 ई.) के उल्लेख के बिना अधूरा है। वर्तमान खूंटी जिले (तब के लोहरदगा) के उलिहातु में जन्मे बिरसा मुंडा आदिवासी समुदाय की एकीकृत शक्ति के प्रतीक थे। उनका 'घरती आबा' रूप लोगों का उनके प्रति सम्मान और भावनात्मक बंधन दोनों को समाहित करता है। धार्मिक उन्मादी से उद्धारकर्ता भगवान के रूप में पूजा जाना और उसके बाद जनजातीय गौरव के प्रतीक के रूप में स्वीकृत बिरसा मुंडा की यात्रा एक गहन परिवर्तन का उद्घोष है। और यह न केवल एक व्यक्ति की विरासत का बल्कि एक पूरे समुदाय की आत्म-चेतना का परिवर्तन है। उनका 25 वर्षीय जीवनकाल उस अकल्पनीय यात्रा का समावेश है, जिसमें एक हाशिए का मुंडा युवक मिशनरी प्रभाव से अलग वैष्णव मान्यता के बीच से रास्ता तय करता हुआ तीव्र आध्यात्मिक जागरण और भविष्यवक्ता का प्रतीक वन लोगों को संगठित करता है और छोटानागपुर पठार में ब्रिटिश साम्राज्यवाद, ईसाई हस्तक्षेप और शोषक तत्वों के विरुद्ध क्रांतिकारी कमांडर बन कर उलगुलान का नेतृत्व करता है। बिरसा मुंडा का यह रूप सदैव गहन अकादमिक पुनर्परीक्षण की माँग करता रहेगा। ऐसे हुतात्मा पर लेखनी चलाना स्वयं को धन्य करने जैसा तो है ही, इसका महत्व तब और भी बढ़ जाता है, जब समय उनकी जन्म जयंती के 150वें वर्ष का हो और उनके सम्मान में इसे 'जनजातीय गौरव वर्ष' के रूप में देश मना रहा हो। व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विरसा मुंडा को समझना हमेशा से चुनौती भरा रहा है, क्योंकि उनके व्यक्तित्व के कई रूप हैं और वे समय के साथ नई मान्यताओं को ग्रहण करते रहे हैं। धार्मिक उन्मादी, प्रस्तुत शोध-उन्मुख ग्रंथ 'धरती आवा भगवान बिरसा मुंडा धार्मिक उन्मादी से जनजातीय गौरव तक' बिरसा और उलगुलान आंदोलन की स्थापित जीवनी लेखन और विशद्ध रूप से राजनीतिक व्याख्याओं से आगे बढ़ने का एक प्रयास है। पुस्तक की केंद्रीय परिकल्पना बिरसा की चेतना और सक्रियता के विकास और उसे लेकर मिशनरी एवं औपनिवेशिक सोच के साथ-साथ आज के भारत में उन्हें लेकर उत्पन्न परिदृश्य को संबोधित करती है। विरसा पर शुरुआती चरण का लेखन पारंपरिक कथा, भविष्यवाणी, विरसाइत पंथ की स्थापना और नैतिक सुधार के उत्साही आह्वान के रूप में चिहिनत है. जिसमें उनका स्वरूप एक 'धार्मिक उन्मादी' के रूप में चित्रित है. जिसे मिशनरी और औपनिवेशिक आख्यान ने गढ़ा है। हालांकि यह एक युवा की तीव्र और परमानंदमय धार्मिक जोश की अवधि थी, और यह कोई भटकाव नहीं था, जैसा कि मिशनरी लेखन और औपनिवेशिक सोच से परिलक्षित होता है। यह तो वह आवश्यक कसौटी थी जिसमें उपनिवेश और ईसाई मिशनरी विरोधी राजनीतिक विचारधारा का जन्म हुआ था। इस पुस्तक में अंतर्विषयक मानकों का प्रयोग करते हुए यह दर्शाने की कोशिश की गई है कि कैसे शुरुआती 'उन्माद' जो एक प्रामाणिक मुंडा पहचान की आध्यात्मिक खोज और खुंटकट्टी (सामुदायिक भूमि स्वामित्व) की वापसी में निहित था, सहजता से 'बिरसा राज' हासिल करने के उद्देश्य से संगठित राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। यह पुस्तक विरसा के आंतरिक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक परिवर्तन से लेकर सामाजिक एकजुटता और संस्कृतीकरण के एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में विरसाइत सिद्धांत के गठन तक, और अंत में, ब्रिटिश राज और ईसाई मिशनरियों के दोहरे उत्पीड़न के विरुद्ध संगठित सैन्य प्रतिरोध तक की व्याख्या करने की कोशिश करती है। बिरसा मुंडा की चिरस्थायी विरासत केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की नहीं है, बल्कि एक दार्शनिक कार्यकर्ता की है जिसने हाशिए के समुदाय की राजनीतिक मुखरता को उत्प्रेरित करने के लिए आध्यात्मिक पुनरुद्धार को प्रेरित किया। यह आशा की जाती है कि यह प्रयास उस व्यक्ति, उसके द्वारा बनाए गए पंथ और उसके नेतृत्व में हुई क्रांति की एक समृद्ध, अधिक जटिल समझ प्रदान करेगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि राष्ट्रीय इतिहास में ही नहीं, बल्कि स्वदेशी प्रतिरोध और उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों के वैश्विक विमर्श के भीतर भी उनका स्थान सटीक रूप से समझा जाए। यह पुस्तक उसी यात्रा का पता लगाने का प्रयास करती है। यह इस बात की पड़ताल करती है कि कैसे बिरसा मुंडा का आध्यात्मिक आंदोलन, जो स्वदेशी आस्था और पारिस्थितिक नैतिकता में निहित था, धीरे-धीरे औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध एक राजनीतिक विद्रोह में विकसित हुआ, जिसकी परिणति 1899-1900 ई. का उलगुलान था। यह इस बात की भी जाँच करती है कि कैसे औपनिवेशिक इतिहास-लेखन ने अक्सर उनके आस्था-आधारित विद्रोह को महज कट्टरता के रूप में गलत तरीके से प्रस्तुत किया, जबकि जनजातीय जनता के लिए यह पहचान, गरिमा और स्वायत्तता की मुखरता का प्रतीक था। ऐतिहासिक रिकॉर्ड, परंपराओं और सामाजिक-सांस्कृतिक विश्लेषण के माध्यम से यह पुस्तक बिरसा की विरासत की पुनर्व्याख्या करती है। यह उन्हें केवल लोककथाओं तक सीमित एक मिथकीकृत व्यक्ति के रूप में नहीं देखता, बल्कि एक क्रांतिकारी विचारक के रूप में भी देखता है, ताकि आस्था, प्रतिरोध और सामाजिक न्याय के बीच के संबंध के रूप में फिर से वह पारिभाषित हो सकें। बिरसा का संदेश आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि भारत स्वदेशी अधिकारों, सांस्कृतिक अस्तित्व और पर्यावरणीय पहलू के सवालों से जूझ रहा है। इसलिए यह पुस्तक 'धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा धार्मिक उन्मादी से जनजातीय गौरव तक' केवल एक ऐतिहासिक अध्ययन मात्र नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रवाद, आध्यात्मिकता और इतिहास को आकार देने वाली हाशिए की आवाजों की शक्ति के बारे में हमारी समझ पर पुनर्विचार करने का एक आमंत्रण है। यह पुस्तक बिरसा मुंडा की गाथा को महज उपनिवेश-विरोधी प्रतिरोध का एक क्षेत्रीय इतिहास लेखन नहीं है, बल्कि यह औपनिवेशिक भारत में आध्यात्मिक संप्रभुता, राजनीतिक अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान के अंतर्संबंध को समझने के लिए एक आधारभूत ग्रंथ है। यह पुस्तक भगवान बिरसा मुंडा और उनके उलगुलान की यात्रा का समालोचनात्मक और अंतर्विषयक ऐतिहासिक अध्ययन करते हुए उन स्थापित द्वैतवादों से परे जाने की कोशिश करती है, जिसमें बिरसा मुंडा को 'भगवान' (धार्मिक भविष्यवक्ता) और 'क्रांतिकारी' (राजनीतिक नेता) के रूप में चित्रित किया गया है। यह पुस्तक यह बताती है कि भले ही उलगुलान का आवेग अल्पकालिक रहा हो, परंतु यह केवल 'धार्मिक उन्माद' या सहस्राब्दी-वादी नहीं था। यह तीव्र आध्यात्मिक जागरण के साथ-साथ सामूहिक जनजातीय अभिमान, दृढ़ता और आत्म-पहचान से जुड़ा था। औपनिवेशिक प्रशासकों और मिशनरी पर्यवेक्षकों ने अक्सर बिरसा की भविष्यवाणियों, उपचार अनुष्ठानों और नैतिक शुद्धता के उपदेश को एक कट्टरपंथी के प्रलाप या 'धार्मिक उन्माद' का परिणाम कहकर खारिज कर दिया। बाद के राष्ट्रवादी और नृवंशविज्ञान संबंधी वृत्तांतों में भी इस आध्यात्मिक चरण को कभी-कभी एक राजनीतिक कार्रवाई के लिए एक आवश्यक कदम के रूप में माना गया। यह पुस्तक तर्क देती है कि उन्माद, वास्तव में, सामुदायिक लामबंदी के लिए आवश्यक कदम था। बिरसाइत पंथ द्वारा प्रदान किए गए गहन आध्यात्मिक अनुशासन और दैवीय सुरक्षा की भावना ने भविष्य के विद्रोह के लिए नैतिक और मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। गैर-जनजातीय धार्मिक प्रथाओं, शराब और अधीनस्थ देवी-देवताओं की पूजा को छोड़ने की माँग करके, बिरसा मूल रूप से मुंडा समुदाय के आत्म-बोध और उनकी पैतृक भूमि, खुंटकट्टी व्यवस्था, के साथ उनके संबंध को पुनर्जीवित और शुद्ध कर रहे थे। यह आध्यात्मिक दृढ़ता और सांस्कृतिक संप्रभुता को पुनः प्राप्त करने की दिशा में पहला कदम था, जो जनजातीय गौरव का सार है। इसलिए यह परिवर्तन धर्म से राजनीति की ओर बदलाव नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक उत्साह की अग्नि में गढ़ी गई एक नवीनीकृत धार्मिक पहचान का राजनीतिकरण है।
लेखक परिचय
डॉ. शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय का जन्म झारखंड के गढ़वा जिले के मंडरा गाँव में हुआ था। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव से पूरी की। इन्होंने उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय और राँची विश्वविद्यालय से पूरी की। इसके बाद वे नियमित लेखन कार्य करते रहे एवं करीब 10 वर्षों तक 'प्रभात खबर' और 'दैनिक जागरण' के राँची संस्करण के संपादकीय विभाग में कार्यरत रहे। उनके कई लेख और विचार आकाशवाणी, राँची से प्रसारित हो चुके हैं। उनके दर्जनों शोध लेख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। वे अखिल भारतीय प्राच्य विद्या संस्थान, भारतीय इतिहास कांग्रेस जैसे संस्थानों के सदस्य हैं। वे भारतीय इतिहास संकलन समिति, झारखंड प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। इसके अलावे वे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला के रिचर्स एसोसिएट्स भी रहे हैं। उनके द्वारा लिखित पुस्तक झारखंड के विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल हैं। इनकी कुछ प्रमुख पुस्तकें इस प्रकार हैं: 1. छोटानागपुर का आर्थिक इतिहास, 2. छोटानागपुर का किसान आंदोलन, 3. प्राचीन भारत का इतिहास (प्रारंभ से पूर्व गुप्तकाल तक), 4. प्रचीन भारत का इतिहास (गुप्तकाल से पूर्व मध्यकाल तक), 5. आधुनिक यूरोप का इतिहास (1789 ई. से 1871 ई. तक), 6. झारखंड का इतिहास (प्रारंभ से 1857 ई. तक), 7. झारखंड का इतिहास (1857 से 2000 ई. तक), 8. झारखंड का इतिहास और संस्कृति, 9. अमेरिका का इतिहास, 10. अमर शहीद जयमंगल पाण्डेय और रामगढ़ बटालियन का स्वातंत्र्य समर, 11. स्वतंत्रता सेनानी गणेश प्रसाद वर्मा : क्रांतिपथ से गांधीपथ तक आदि।
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