132 वर्षों के इतिहास में पहली बार नागरीप्रचारिणी सभा प्रेमचंद-साहित्य के अत्यंत संक्षिप्त; लेकिन मूल्यवान अंश का प्रकाशन कर रही है। यों, सभा के साथ प्रेमचंदजी का संबंध बहुत पुराना और गहरा है-पचास के दशक के अंत में प्रेमचंदजी की मृत्यु के बाद; उनके छोटे भाई महताब राय नागरीप्रचारिणी सभा में 'प्रेस मैनेजर' के पद पर काम करते थे। अनेक पुराने प्रकाशनों पर आज भी लिखा मिल जाता है- 'मुद्रक : महताब राय, नागरी मुद्रण, वाराणसी'। यही नहीं, एक दौर में प्रेमचंद का छापाखाना भी वाराणसी-स्थित सभा परिसर के पड़ोस में था। प्रेमचंदजी लगभग रोज़ अपने प्रेस में दोपहर के खाने की छुट्टी होने पर सभा आ जाते थे। विश्वप्रसिद्ध कला संग्रहालय - भारत कलाभवन- तब सभा में ही था; उस संग्रहालय के संस्थापक-अभिभावक राय कृष्णदास भी यहीं मिल जाते थे। दोनों मूर्धन्यों की बैठकी जम ही जाती थी।
आगे चलकर प्रेमचंदजी से सभा का एक रिश्ता और बना जब उपन्यास-सम्राट के जन्मस्थल लमही-स्थित घर के आगे की वह पुश्तैनी जमीन महताब राय ने सभा को अर्पित कर दी जहाँ उपन्यास-सम्राट का जन्म हुआ था। वह अर्पण-पत्र सभा के पास है। यों, 8 जुलाई; 1958 को बनारस कचहरी में हुई अर्पण-पत्र की रजिस्ट्री के काग़ज़ात पर महताब राय के पुत्रों- सर्वश्री रामकुमार, कृष्णकुमार, विनयकुमार, नंदकुमार और कौशलकुमार के भी हस्ताक्षर हैं। ध्यान दें-1470 स्क्वायर फीट का यह भूखंड प्रेमचंदजी के भाई ने बेचा नहीं, सभा को निःशुल्क अर्पित किया था।
हालाँकि इसके कुछ ही दिनों बाद प्रेमचंद-परिवार के कुछ दूर के रिश्तेदार सर्वश्री श्यामलाल और संजीवन राय ने उस भूखंड से लगी हुई 4580 स्क्वायर फीट जमीन सभा को 1500 रुपये में बेची। इस प्रकार सभा के पास स्मारक के लिये कुल 6050 स्क्वायर फ़ीट का इकट्ठा भूखंड हो गया। यह सब कुछ श्री महताब राय की उदारता और सभा के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजबली पांडेय के सत्प्रयत्नों का प्रतिफल था।
आश्विन 22 संवत् 2016 अर्थात् 9 अक्टूबर, 1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने उस स्मारक का शिलान्यास किया। बांग्ला के सुप्रसिद्ध कथाशिल्पी ताराशंकर वंद्योपाध्याय ने उस कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी।
सभा प्रतिवर्ष 31 जुलाई और 8 अक्टूबर को उस पुण्यभूमि पर विचार-गोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती रही; लेकिन यह भी सच है कि संसाधनों की कमी से सभा के कार्यकर्ता उस स्थल को अपने संकल्पों के अनुरूप विकसित न कर सके। बहरहाल, सभा ने अपनी ज़मीन चहारदीवारी से घेर ली, दो पक्के कमरे बनवा लिए, जन्मस्थल पर पक्का चबूतरा निर्मित कर लिया और चबूतरे पर प्रेमचंदजी की आवक्ष प्रतिमा को प्रतिष्ठित कर दिया। अगले ही वर्ष - संवत् 2023 (सन् 1960) में इस रूप में स्मारक का उद्घाटन राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल और सभा के हितैषी बाबू संपूर्णानंद ने किया।
लंबे अंतराल के बाद, सन् 2006 में उत्तर प्रदेश सरकार ने लमही के समग्र सांस्कृतिक उत्थान का मानचित्र बनाकर नागरीप्रचारिणी सभा से वह ज़मीन अनुरोधपूर्वक माँगी। सभा ने आगे बढ़कर वह भूखंड निःशुल्क सरकार को दे दिया।
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