श्री श्री दया माता (1914-2010)
योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया/सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फेलोशिप की अध्यक्ष तथा आध्यात्मिक प्रमुख (1955-2010)
शान्ति, निस्तब्धता, आन्तरिक सन्तुलन तब तक मात्र शब्द हैं जब तक हम वास्तव में अपने से मिलने वाले किसी व्यक्ति में उनकी अभिव्यक्ति देख नहीं लेते- अथवा स्वयं अपने आप में उनकी अभिव्यक्ति अनुभव नहीं करते। परमहंस योगानन्दजी के साथ व्यतीत किये गए लगभग बीस वर्षों के समय में, मुझे प्रतिदिन उनसे प्रकट होने वाली शान्ति के प्रभामण्डल का अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह प्रभामण्डल उन्हें एक अद्भुत क्षमता प्रदान करता था कि वे अपने सम्पर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों का सम्पर्क उन सब की आत्माओं में विद्यमान शान्ति के गहन स्रोत के साथ करा सकते थे।
हमारे युग में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति हुई है, परन्तु प्रायः ऐसा प्रतीत होता कि इस प्रगति से केवल बाह्य परिस्थितियों में ही सुधार होता है जिसके लिए हमें अपने व्यक्तिगत जीवन में बढ़े हुए तनाव तथा जटिलता का भारी मूल्य चुकाना पड़ता है। जैसे-जैसे सन्तुलन की खोज को अधिकाधिक प्राथमिकता दी जा रही है, संसार भर में लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि सम्भवतः प्राचीन योग विज्ञान ही सबसे अधिक आवश्यक "नवीन” विज्ञान है। शरीर, मन एवं आत्मा के मध्य सामन्जस्य स्थापित करने की कालातीत योग पद्धतियाँ आन्तरिक शान्ति प्राप्त करने के लिए सही अर्थों में एक प्रभावशाली प्रणाली प्रदान करती हैं।
परमहंसजी के ज्ञान-कोष से हमें योगासनों में सर्वाधिक बहुमूल्य "आसन" की शिक्षा प्रदान की जाती है: जैसा कि वे प्रायः कहते थे, "विखण्डित जगतों के धमाकों के मध्य अडिग खड़े रहना।" आन्तरिक सुरक्षा में, उस "शान्ति में जो समस्त बोध से परे है" आश्रय प्राप्त करना - सच्ची आध्यात्मिकता इस वचन को पूरा कर सकती है, और यह पुस्तक इसी पर केन्द्रित है।
परमहंस योगानन्दजी ने यह शिक्षा प्रदान की थी कि शान्त आन्तरिक निस्तब्धता के लिए कायरतापूर्ण ढंग से शक्तिशाली सक्रिय कार्यों को त्यागने की आवश्यकता नहीं है। निस्सन्देह, एक अग्रदूत के रूप में भारत की ध्यान की शिक्षाओं का पाश्चात्य जगत् में सफलतापूर्वक प्रचार-प्रसार करने जैसी उनकी व्यक्तिगत असाधारण बाह्य उपलब्धियों के लिए एक अत्यन्त गतिशील एवं रचनात्मक व्यक्तित्व की आवश्यकता थी। उन्होंने अपने कार्य का संचालन किसी एकान्त गुप्त-स्थान पर नहीं, अपितु न्यूयॉर्क, शिकागो, लॉस एंजेलिस जैसे शहरों तथा पृथ्वी के सर्वाधिक अशान्त स्थानों के कोलाहल के मध्य रहकर किया था! इसके उपरान्त भी सदैव उनकी चेतना आत्मा की प्राकृतिक अविचलित शान्ति में आनन्दपूर्वक केन्द्रित रहती थी।
परमहंसजी के एक अनुयायी को उनके बारे में एक दृष्टान्त अत्यन्त प्रिय था। यह दृष्टान्त परमहंसजी की उस शान्ति की शक्ति का एक सहज प्रदर्शन था, जो सौभाग्यवश उनके साथ पुनः घटित नहीं हुआ। न्यूयॉर्क शहर में, एक सड़क पर तीन बन्दूकधारी लुटेरों ने उन्हें रोका। उन्होंने सरलता से उनकी ओर देखा, और कहा: "क्या तुम्हें धन चाहिए?" यह लो।" यह कहते हुए उन्होंने अपना बटुआ बाहर निकाला। किसी अज्ञात कारण से बन्दूकधारी अपने स्थान से बिल्कुल भी नहीं हिले। उनकी उपस्थिति में उनके माध्यम से प्रकट होने वाले आध्यात्मिक स्पन्दनों से वे लुटेरे पूर्णतः स्तम्भित हो गये थे। अन्ततः उनमें से एक के मुंह से अचानक ही यह निकला, "हम आपसे क्षमा माँगते हैं। हम ऐसा नहीं कर सकते।" वे मुड़े और वहाँ से भाग गये।
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