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स्त्री-चिंतन और विमर्श: Istri Chintan aur Vimarsh

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Specifications
Publisher: Sasta Sahitya Mandal Prakashan
Author Rekha Sethi, Rizwana Fatima
Language: Hindi
Pages: 390
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 Inch
Weight 420 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789348765963
HCC032
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Book Description

भूमिका

     

 

भारत में उत्तर-आधुनिकता के उदय के साथ, बीसवीं सदी के अंतिम दशक के साहित्यिक परिदृश्य में समाज के हाशियाकृत वर्ग की आवाजों को महत्त्व देने के लिए शुरू हुई मुहिम के अंतर्गत, स्त्री-विमर्श ने दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श के ही समानांतर अपनी जगह बनाई। उसके बुनियादी सरोकारों में सबसे ज्यादा बल 'जेंडर' और 'लिंग' को अलगाने पर रहा। 'जेंडर' की अवधारणा को सामाजिक निर्मिति मानकर उसे 'लिंग' की प्रकृति से अलगाया गया और यह भी स्वीकार किया गया कि लैंगिक असमानताएँ प्राकृतिक न होकर समाज द्वारा स्त्री-पुरुष में किए गए अंतर से उत्पन्न होती हैं। इस विमर्श का प्रमुख संदर्भबिंदु बनी-पितृसत्ता। स्त्री अस्मिता की पूरी यात्रा पितृसत्ता के विरोध और संघर्ष व मुक्ति की कामना से जुड़ गई। पितृसत्ता के जितने भी रूप हो सकते हैं, उनके बरक्स स्त्री अस्मिता को कैसे जताया जा सकता है, स्त्री-विमर्श में इसकी ओर विशेष ध्यान दिया गया। इसमें एक और खास बात रही- युनिवर्सल सिस्टरहुड या सार्वभौम बहनापा। संचार क्रांतियों के बाद सारा संसार एक-दूसरे से जुड़ रहा था। इस स्थिति में, दुनिया भर की औरतें भी अपने दुख-दर्द में एक-दूसरे के साथ बहनापा महसूस कर रही थीं। साहित्य में स्त्री-विमर्श इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाकर चल रहा था। सैद्धांतिकी के बड़े सवालों से लेकर स्त्री जीवन के संघर्षशील सामाजिक यथार्थ तक, उसमें स्त्री संबंधी अनेक सवालों की छटपटाहट दिखाई देती है। उसकी परिव्याप्ति शास्त्र से लेकर लोक तक विस्तार पाती है।

स्त्री-विमर्श की सैंद्धातिक यात्रा में समय-समय पर हुए स्त्री-मुक्ति आंदोलनों का भी प्रभाव रहा, जैसे समान वेतन की माँग, अपनी देह पर अपने अधिकार की माँग (राइट टू अबॉर्शन) आदि। इसी तरह से पॉलिटिकल आंदोलनों में स्त्रियों की भागीदारी के साथ 'न्यूक्लियर डिसआर्मामेंट' की बात होने लगी जिसके अंतर्गत यह प्रतिस्थापित किया गया कि अगर कभी आणविक युद्ध होता है, तो स्त्रियों की भूमिका शांति स्थापित करने वालों में होगी। शांति की अवधारणा उनकी सोच से ही आएगी। वे शांति के प्रयत्न इसलिए भी करेंगी क्योंकि युद्ध की हिंसा का सबसे अधिक आघात उन्हीं को झेलना पड़ता है। इस कड़ी में भी दुनिया की तमाम औरतों के बीच एक रिश्ता बन रहा है। ये सभी मुद्दे पश्चिम में स्त्रीवाद की तीन लहरों के रूप में सामने आए। इसके साथ ही यह चर्चा भी होती रही कि स्त्रीवाद को किस दृष्टि से देखा जाए? इस आधार पर रेडिकल नारीवाद, उदारवादी नारीवाद, मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी, मानवतावादी आदि नारीवाद की अनेक प्रमुख धाराएँ सामने आई। इन सभी धाराओं में स्त्रीवाद की अवधारणा अलग-अलग रूप में प्रकट हुई किंतु पूरा बलाबल इस बात पर ही था कि वे पितृसत्ता से कैसे जूझती हैं और मुक्ति की कामना का स्वरूप क्या हो? ये सब स्त्री-विमर्श के ऐसे प्रमुख बिंदु हैं जिन्हें कमोवेश सब जानते हैं और जिन्हें विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाता है। इसकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य, समाज तथा मानविकी के सभी विषयों में दिखाई पड़ती है। इसी बीच में एक थ्योरी 'इंटरसेक्शनेलिटी' की भी सामने आई जो 1989 में के. डब्ल्यू, क्रेनशॉ द्वारा ब्लैक फेमिनिज्म के संदर्भ में प्रस्तावित हुई। इसका बल इस बात पर है कि स्त्रीवाद एकरूप नहीं होता। इंटरसेक्शनेलिटी की थ्योरी का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उसने यह सवाल उठाया कि मुक्ति की बात कौन कर रहा है? किस जगह से बोल रहा है? इस दृष्टि से देखा जाए तो लिंग और जेंडर को अलगाने मात्र से समस्या नहीं सुलझती। हमारी सामाजिक और जैविक निर्मिति-दोनों का संबंध हमारी अस्मिता और अस्तित्व दोनों से है। सामाजिक असमानताएँ तथा घेरे बंदियाँ, जैसे स्त्री के जीवन को नियंत्रित करती हैं, वैसे ही पुरुष के जीवन को भी नियंत्रित करती हैं। यदि किसी पुरुष से पूछा जाए तो शायद वह बताएगा कि उसके लिए भी पुरुष होना उतना ही कठिन है जितना स्त्री के लिए अपने स्त्रीत्व को पहले से सुनिश्चित चौखटों में अटाकर जीना। वह भी अपनी संवेदनशीलता व भावात्मकता को अभिव्यक्त नहीं कर पाता क्योंकि एक सामाजिक नियंत्रण उसके ऊपर भी लगातार बना रहता है। साहित्य में पुरुष की इस लाचारी की अभिव्यक्ति हुई है। उषा प्रियंवदा की कहानी 'वापसी' इसका सशक्त उदाहरण है कि कैसे परिवार के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाते हुए एक पुरुष उस परिवार के लिए फालतू हो जाता है। साहित्यकार उस पीड़ा को समझकर संवेदनशीलता से अभिव्यक्त करता है। चाहे स्त्री हो या पुरुष, एक बात तय है कि रचनाकार का दायित्व अपने कथ्य, अपने संवेद्य की प्राण वस्तु में जाकर उसे अभिव्यक्त करना है और यह चुनौती स्त्री व पुरुष दोनों के लिए बराबर बनी रहती है। यह अकारण नहीं है कि पुरुष की इस पीड़ा की कहानी एक स्त्री ने लिखी और स्त्री की विवशता की बेहतरीन कहानी 'दोपहर का भोजन' अमरकांत

 

पुस्तक परिचय

 

पिछले कुछ समय में स्वी-रचनाशीलता का दायरा बढ़ा है। स्वियों ने केवल अपनी समस्याओं पर ही नहीं लिखा बल्कि देश-दुनिया के सभी मुद्दे, युद्ध और हिंसा, प्रकृति और पर्यावरण की चिंताएँ, उनके साहित्यिक सरोकारों में शामिल हैं। यह बात और है कि हमारी आलोचना पद्धतियों ने स्त्री लेखन में केवल स्त्री समस्याओं पर ही ध्यान केंद्रित किया है। इसीलिए स्त्री-विमर्श को साहित्यिक मुख्य धारा से अलग जन-क्षेत्र मानकर, उत्तकी सांकेतिक उपस्थिति दर्ज हुई है। यह अनिवार्य रूप से स्त्री-लेखन की कमज़ोरी न होकर साहित्यिक आलोचना की तंगदिली का परिणाम है। आलोचना का धर्म है कि वह रचना के मर्म तक पहुंच कर उसी से सवाल पूछे और उसके भीतर छिपे हुए छोटे-छोटे अंतःपाठों को उजागर करे। स्त्री-साहित्य को पढ़ने की इस प्रक्रिया में रचना और आलोचना दोनों के पाठ बदलेंगे। बड़ी चुनौती जेंडर को बदलने की नहीं है, बड़ी चुनौती सत्ता और वर्चस्व के चीखटों को तोड़ने की है। -चिंतन और विमर्श' पुस्तक की संकल्पना एक उदारवादी संकल्पना है। इसमें स्त्री-साहित्य से संबंधित अनेक प्रकार के लेख व निबंधों को एक साथ रखा गया है। चिंतन और विमर्श के बीच की तरलता यहाँ उपस्थित है। स्त्री रचनाकारों की कलम से विविध विषयों पर लिखे गए निबंध सम्मिलित हैं जो स्त्री रचनाशीलता और स्त्री की वैचारिकता का प्रखरतावादी स्वर हैं। कुछ लेख बाज़ार, सिनेमा और स्त्री-छवि पर केंद्रित हैं। बाज़ार ने स्त्रीवादी चिंतन की अपनी तरह इस्तेमाल किया। परिवार में स्त्री का चुप रह जाना यदि एक प्रकार का अनुकूलन है तो बाज़ार में स्त्री-मुक्ति को दैहिक मुक्ति का पर्याय बना देना एक दूसरे प्रकार का अनुकूलन है। इनके अतिरिक्त अल्पसंख्यक, दलित तथा आदिवासी महिलाओं के अपने मसले हैं। स्त्री-चिंतन और विमर्श के विस्तार को समझने के कुछ अनछुए पहलू भी हैं जैसे 'जेंडर और अनुवाद', 'इको फेमिनिज्म' या फिर 'यात्रा करती स्त्रियाँ' आदि। इन सबको समेटकर ही इस पुस्तक का संयोजन हुआ है। हमारी यही कोशिश है कि एक समावेशी अध्ययन सामग्री प्रस्तुत कर सकें जो इस विषय के विस्तार को समझने में सहायक हो। यह पुस्तक विद्यार्थियों व शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होगी।

 

लेखक परिचय

 

प्रो. रेखा सेठी, दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में प्रोफेसर हैं। साथ ही वे प्रतिष्ठित आलोचक, संपादक तथा अनुवादक हैं। उन्होंने अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में, विशेष रूप से यूरोप और अमेरिका में शोध-पत्र प्रस्तुत किए हैं। 2023 में उन्हें 'वातायन अंतरराष्ट्रीय शिक्षा सम्मान' से सम्मानित किया गया। उनकी अब तक सत्रह पुस्तकें तथा 100 से अधिक शोध-पत्र, साहित्यिक आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।

डॉ. रिजवाना फ़ातिमा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. फिल तथा पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने केयर इंडिया संस्था के लिए 'हमारा आसमान' नाम से पाठ्यक्रम की पुस्तकों का सह-संपादन किया है। उनके लेख समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।

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