जीवन में आनंद और सुख सब चाहते हैं, परन्तु लोग दुःखी दिखते हैं, क्योंकि दुःख मुक्ति के मार्ग पर चलते नहीं। अतः आनंद से वंचित हैं। इसीलिए 'जीने की राह' को जानना जरुरी है और उसी को कविता में लिपिबद्ध किया गया है। आध्यात्मिक जीवन की परिपक्वता पर कविता और लेख दोनों दिए हैं। गीता में ध्यान योग, आनन्दमय जीवन जीने के लिए सेवा, दान, मैत्री और सहनशीलता की महत्ता पर लिखा है। सेवा, दान और मैत्री के बिना जीवन अधूरा ही नहीं निरर्थक है। क्रोध आदि कषाय जीवन को कलुषित करते हैं, तो उनसे मुक्ति पाने के लिए ध्यान की साधना आवश्यक है। अपना सत्य स्वयं ढूंढें क्योंकि स्वयं की अनुभूति से ही सत्य से साक्षात्कार होगा। जैन जगत के आप्त पुरुष श्रीमद राजचन्द्र का आत्मसिद्धि शास्त्र का विवेचन किया है, जिससे अक्षय आनद की प्राप्ति हो सके। जीने की राह बहुत सरल है और कठिन भी। सही मार्ग पर चलें तो मार्ग सीधा और सरल है, परन्तु जब दो नाव पर सवार होते हैं, तो मार्ग कठिन ही नहीं दुष्कर हो जाता है। दो विरुद्ध मार्गों पर चलना चाहें तो किसी भी लक्ष्य पर पहुँचना असंभव है। जीने की राह का सीधा मार्ग अपनायें और जीवन आनंदमय बनायें।
अजमेर जिले के बिजयनगर ग्राम में वर्ष 1938 में जन्मे रणजीतसिंह कूमट ने मेट्रिक की परीक्षा के बाद अजमेर व दिल्ली में शिक्षा प्राप्त की। दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से अर्थशास्त्र में एम.ए. कर तीन वर्ष तक व्याख्याता का कार्य किया। 1962 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में प्रवेश प्राप्त किया। प्रशिक्षण के बाद राजस्थान में विभिन्न पदों यथा जिलाधीश, दुग्ध संघ, ग्रामीण विकास, शिक्षा, राजस्व एवं स्वास्थ्य विभागों में सचिव व अंत में राजस्थान राजस्व मंडल के अध्यक्ष के पद से नवम्बर 1995 में सेवा निवृत्त हुए। 1977 में इंग्लैंड में तीन माह का प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1994 में विश्व बैंक के साथ समझौता करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका गए। श्री कूमट की छवि एक ईमानदार, मेहनती व गरीबों के प्रति सहानुभूति रखने वाले निष्पक्ष अफसर की रही है। सामाजिक क्षेत्र में अनेक गैर सरकारी संस्थाओं का उच्चस्थ पदों से निर्देशन किया। श्री महावीर स्मारक सेवा समिति व वर्द्धमान सेवा समिति की स्थापना, महावीर इंटरनेशनल अपेक्स व राजस्थान प्रौढ़ शिक्षा समिति के अध्यक्ष, राजस्थान भारत स्काउट गाइड के चीफ कमिश्नर, श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी स्वाध्यायी संघ गुलाबपुरा के अध्यक्ष व श्री महावीर विकलांग सहायता समिति के संयुक्त सचिव रहे। 1999 में बिजयनगर में 'श्री प्राज्ञ कुंदन वल्लभ चिकित्सालय' की स्थापना के लिए 14 बीघा भूमि का निःशुल्क आबंटन कराया और 5 वर्षों तक अध्यक्ष रहे। महामहिम राष्ट्रपति द्वारा भारत स्काउट गाइड में चीफ कमिश्नर के पद पर सराहनीय सेवाओं के लिए "सिल्वर एलिफेंट" पुरस्कार से सम्मानित किया। माता-पिता व जैन संतों से धार्मिक संस्कार मिले। जैन आगम, भगवदगीता, रामायण, बाइबल, बौद्ध ग्रन्थ, योग शास्त्र, विवेकानंद साहित्य आदि का अध्ययन किया व विपश्यना ध्यान सीखा। वीतराग ध्यान के शिविर लगा कर अनेक साधकों व साधिकाओं को ध्यान की विधि में प्रशिक्षण दिया। 1988 में 'मुझे मोक्ष नहीं चाहिए' और 2004 में 'देह और मन से परे' का प्रकाशन हुआ। 2007 में 'ध्यान से स्वबोध' का हिंदी व अंग्रेजी भाषाओं में प्रकाशन हुआ जिसमें जैन, बौद्ध व पातंजलि की ध्यान प्रक्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन है। 'देह और मन से परे' का अंग्रेजी अनुवाद "Beyond Body and Mind" 2014 में और 'अपने मित्र बनो' पुस्तक का प्रकाशन 2015 में हुआ। अब नई पुस्तक 'जीने की राह' सुधी पाठकों की सेवा में समर्पित है।
Hindu (हिंदू धर्म) (14013)
Tantra (तन्त्र) (1041)
Vedas (वेद) (733)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2137)
Chaukhamba | चौखंबा (3464)
Jyotish (ज्योतिष) (1633)
Yoga (योग) (1212)
Ramayana (रामायण) (1313)
Gita Press (गीता प्रेस) (716)
Sahitya (साहित्य) (25406)
History (इतिहास) (9380)
Philosophy (दर्शन) (3711)
Santvani (सन्त वाणी) (2598)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist