योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया/सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप की तृतीय अध्यक्ष एवं आध्यात्मिक प्रमुख श्री श्री दया माता (1914-2010) द्वारा श्री श्री परमहंस योगानन्दजी संकलित प्रवचन एवं आलेख प्रथम भाग मानव की निरन्तर खोज की भूमिका में निम्नलिखित शब्द लिखे गए थे:
पहली बार जब मैंने श्री श्री परमहंस योगानन्द को देखा, वे सॉल्ट लेक सिटी में एक विशाल, मन्त्र-मुग्ध श्रोता समूह के समक्ष बोल रहे थे। यह सन् 1931 का वर्ष था। जैसे ही मैं भीड़ से भरे सभा भवन के पिछले भाग में खड़ी हुई, मैं स्तम्भित हो गई, और मुझे वक्ता एवं उनके शब्दों के अतिरिक्त अपने चारों ओर किसी वस्तु का आभास न रहा। मेरा पूर्ण अस्तित्व उस ज्ञान एवं दिव्य प्रेम में डूब गया जो मेरी आत्मा में प्रवाहित हो कर, मेरे हृदय एवं मन को ओत-प्रोत कर रहे थे। मैं केवल यही सोच सकी, "ये ईश्वर को वैसे ही प्रेम करते हैं, जैसे मैंने सदा उन्हें प्रेम करने की लालसा की है। वे ईश्वर को जानते हैं। मैं इनका अनुसरण करूँगी।" और उसी क्षण से, मैंने किया भी।
परमहंसजी के साथ उन प्रारम्भिक दिनों में, जब मुझे उन शब्दों की रूपान्तरक शक्ति का अपने जीवन में आभास हुआ तो मेरे भीतर उनके शब्दों को सारे संसार के लिए एवं सदा के लिए तत्काल सुरक्षित करने की आवश्यकता का भाव जागा। परमहंस योगानन्दजी के साथ कई वर्षों तक रहने की अवधि में, उनके प्रवचनों एवं कक्षाओं को, तथा बहुत से अनौपचारिक व्याख्यानों और व्यक्तिगत परामर्शों के शब्दों-सचमुच में ईश-प्रेम और अद्भुत ज्ञान के विशाल भण्डार को, लिपिबद्ध करना मेरा पावन एवं आनन्ददायक सौभाग्य बन गया। जैसे गुरुदेव बोलते थे, उनकी प्रेरणा का वेग प्रायः उनके प्रवचन की तीव्रता में प्रतिबिम्बित होता था; वे किसी समय मिनटों तक बिना रुके, और लगातार घण्टा भर बोल सकते थे। जब श्रोता गण मन्त्र-मुग्ध होकर बैठे रहते थे, मेरी लेखनी दौड़ती रहती थी। जिस समय मैं आशुलिपि में उनके शब्दों को लिखती थी, ऐसा लगता था मानो विशेष कृपा अवतरित हो गई हो, जो गुरुजी की वाणी को पृष्ठ पर तुरन्त आशुलिपि में अंकित कर देती थी। उन शब्दों को लिपिबद्ध करना एक सौभाग्यपूर्ण कार्य रहा, जो आज तक चल रहा है। इतने लम्बे समय के पक्षात भी मेरे द्वारा उस समय अंकित किए गए कुछ विवरण चालीस वर्षों से भी अधिक पराने है जब मैं उन्हें लिपिबद्ध करना आरम्भ करती हैं, वे मेरे मन में चमत्कारिक रूप से ताज़ा हो जाते है. मानो वे कल ही अंकित किए गए हों। यहाँ तक कि अपने अन्तर्मन में गुरुदेव की वाणी के हर विशिष्ट वाक्यांश का उतार-चढ़ाव भी मैं सुन सकती हूँ।
गुरुदेव अपने व्याख्यानों की थोड़ी-सी भी तैयारी कभी नहीं करते थे; यदि वे कुछ तैयारी करते भी थे तो तथ्यों पर आधारित एक या दो टिप्पणियाँ शीघ्रता से लिख लेते थे। प्रायः कार में बैठ कर मन्दिर की ओर जाते समय वे अकस्मात् हम में से किसी एक से पूछ लेते, "आज का मेरा विषय क्या है?" वे अपना मन उस पर लगाते, और तब दिव्य प्रेरणा के आन्तरिक भण्डार से, बिना तैयारी किए धाराप्रवाह व्याख्यान देते थे।
मन्दिरों में गुरुदेव के प्रवचनों के विषय निश्चित करके पहले ही घोषित कर दिए जाते थे। परन्तु कभी-कभी जब वे बोलना आरम्भ करते थे तो उनका मन किसी बिल्कुल भिन्न दिशा की ओर चल पड़ता था। गुरुदेव "आज का विषय" की चिन्ता न करके, उस क्षण, अपनी चेतना में ओत-प्रोत सत्य का वर्णन करते थे, इस प्रकार स्वयं अपने आध्यात्मिक अनुभव एवं अन्तर्ज्ञान के भण्डार से बहुमूल्य ज्ञान की निर्बाध धारा बहाते थे। लगभग सदा ही, ऐसे सत्संग के समापन पर, बहुत-से लोग, उनको परेशान करने वाली अपनी किसी समस्या का गुरुजी द्वारा समाधान दिए जाने पर, अथवा उनकी रुचि की किसी विशेष दार्शनिक विचारधारा के स्पष्टीकरण के लिए गुरुजी को धन्यवाद देने के लिए आगे आते थे।
कभी-कभी जब वे प्रवचन दे रहे होते थे, तो गुरुजी की चेतना का ऐसा उत्थान हो जाता था कि वे कुछ क्षण के लिए श्रोताओं को भूलकर, सीधे ईश्वर से वार्तालाप करने लग जाते थे; उनका पूर्ण अस्तित्व दिव्य आनन्द और उन्मादक प्रेम से उमड़ पड़ता था। चेतना की इन उच्च अवस्थाओं में उनका मन ईश्वर चेतना के साथ पूर्ण रूप से एक हो जाता था और वे आन्तरिक रूप से सत्य का प्रत्यक्ष दर्शन करते थे और जो वे देखते थे उसका वर्णन करते थे। कुछ अवसरों पर, ईश्वर उनके सामने जगन्माता, अथवा किसी अन्य आकार में, या हमारे गुरुओं में से एक, अथवा अन्य सन्तों के दिव्य-दर्शन के रूप में प्रकट हो जाते थे।
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