लेखक परिचय
पिता का नाम डॉ. हुकमसिंह भाटी जन्म तिथि 13 जून 1973 ई. शिक्षा : एम.ए. (इतिहास) स्वर्ण पदक (1996 ई.), पी-एच. डी. 2000 ई., मोहनलाल सुखाड़िया विश्व-विद्यालय, उदयपुर (राज.), डी. लिट (2014 ई.) पी-एच.डी. गाइड इतिहास विभाग, जयनारायण व्यास विश्व-विद्यालय, जोधपुर (राज.) प्रकाशित शोधपूर्ण एवं सम्पादित ग्रंथ 1. जैतमालोत राठौड़ों का इतिहास (2002 ई.) सहायक सम्पादक 2. राठौड़ अमरसिंह (2003 ई.), 3. ठिकाना पाल री ख्यात ऐतिहासिक अध्ययन (2003 ई.), 4. मध्यकालीन राजस्थान में ठिकाना व्यवस्था (2004 ई.), 5. सांचोर नरेश महाराव बलभद्र चौहान (2004 ई.), 6. राव जैतमाल (राजस्थानी) (2005 ई.), 7. मूदियाड़ री ख्यात (जोधपुर राज्य का इतिहास) (2005 ई.), 8. खेजड़ला ठिकाने के पट्टे-परवाने (2005 ई.), 9. दहिया वंश का इतिहास (2007 ई.), 10. किनसरिया धाम (2009 ई.), 11. राजस्थान की कुलदेवियां (2010 ई.), 12. मारवाड़ इतिहास एवं संस्कृति के सोपान (2012 ई.), 13. जोधपुर राज्य के अस्त्र-शस्त्र (2013 ई.) 1 मारवाड़ री ख्यात (2001 ई.), 2. संक्षिप्त राजस्थानी-हिन्दी शब्द कोश (2002 ई.), 3. राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के उन्नायक ठा. रामसिंह तंवर (2010 ई.), 4. मारवाड़ राजघराने की पुरालेखीय सामग्री (2010 ई.), 5. युग-युगीन जालोर (2011 ई.), 6. मारवाड़ राजघराने का राजतिलक उत्सव (2013 ई.), 7. मारवाड़ राजघराने की शोक सम्बन्धी परम्पराएँ (2013 ई.), 8. मदिरों की कमठा बही (2014 ई.)
पुस्तक परिचय
ख्यात' का तात्पर्य इतिहास से रहा है। प्रारम्भ में इतिहास 'ख्यात' के रूप में ही लिखने की परम्परा रही है। जेम्स टॉड ने सर्वप्रथम वैज्ञानिक ढंग से इतिहास लिखा और श्री श्यामलदास एवं श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने इतिहास लेखन की पद्धति को एक नूतन स्वरूप दिया। वस्तुतः इतिहास के आधारभूत स्रोतों में ख्यात-ग्रंथों का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि इस प्रकार के प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों में विशेषत राजस्थान के राजवंशों और उनकी संतति के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यों तो सभी राज्यों में छोटी-बड़ी ख्यातें समय-समय पर लिखी गई, परन्तु मारवाड़ इसका गढ़ रहा है। यहां ख्यात-ग्रंथों का विशाल भंडार हमें मिलता है। अद्यावधि प्रकाश में आई राठौड़ों के क्रमबद्ध इतिहास सम्बन्धी ख्यातों में प्रस्तुत ख्यात (मुरारीदान की ख्यात) सर्वाधिक प्राचीन है। यद्यपि 'मुहता नैणसी री ख्यात' इस काल में ही लिखी गई, परन्तु उसमें राठौड़ो का क्रमबद्ध इतिहास का अभाव रहा है। यह ख्यात उदयभांण चांपावत (आउवा) अनन्तर जोधपुर कविराज मुरारीदान के संग्रह में रहने के कारण 'उदयभांण चांपावत री ख्यात' और मुरारीदान की ख्यात के नाम से प्रसिद्ध है।
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