लेखक परिचय
आईदानसिंह भाटी मुझे 1988 के आसपास बाड़मेर में मिले। उनकी राजस्थानी काव्यकृति 'हंसतोड़ा होठां री साच' पर वहाँ एक गोष्ठी हुई जहाँ मैंने उनकी कविताएँ सुनीं और अपने विचार रखे। मुझे उनकी कविताओं की विचार-चेतना और स्थानीयता-बोध ने प्रभावित किया। मैंने उन्हें साक्षरता-साहित्य लिखने का आग्रह किया था और यह भी कहा था कि 'साक्षरता आंदोलन' से जुड़ने से उनकी कविता और अधिक प्रखर होगी। उन्होंने मेरे आग्रह को स्वीकार किया और 'रणकपुर' में आयोजित साक्षरता गीत शिविर में वे सम्मिलित हुए। जोधपुर की 'साक्षरता-प्राइमर' के लेखन में तो उनकी केन्द्रीय भूमिका रही, क्योंकि वह राजस्थानी भाषा में तैयार हुई थी। 'रामसुखी का आँगन' (कथा) और 'समझदारी के हजार हाथ (नाटक), बाबा रामदेव पीर (जीवनी) जैसी उनकी कृतियाँ हमने राज्य संदर्भ केन्द्र से छापी। 'उजालो कद होसी' गीत-संग्रह में वे सम्पादन कार्य से भी जुड़े और साक्षरता कैसेट 'आवो म्हारै आंगणियै' में उन्होंने संदर्भ व्यक्ति की भूमिका निभाई।
पुस्तक परिचय
राजस्थानी और हिन्दी के कवि आईदानसिंह भाटी को मैं चार दशकों से जानती हूँ। साहित्य की जनपक्षधर धारा को समृद्ध करते हुए भाटी की राजस्थानी काव्यकृति 'आंख हीयें रा हरियल सपना' को जब साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का सर्वोच्च साहित्यिक अवार्ड मिला था, तब मुझे अत्यन्त हर्ष हुआ था, क्योंकि भाटी मेरी आत्मीयता का ही अभिन्न हिस्सा है। 'थार की गौरवगाथाएँ' और 'शौर्य-पथ' जैसी कृतियाँ उनके स्थानीयता बोध और इतिहास को मानवीय-संदर्भों में परखने के प्रयास हैं, जिसमें उनका कथा-कौशल पाठक तक सौन्दर्य-बोध के साथ पहुँचा है। 'राजस्थान की सांस्कृतिक कथाएँ' अतीत में घटित वे कथाएँ हैं, जिनके चरित्रों में उदार मानवीयता की सौन्दर्यपरक और बलिदानी कहानियाँ हैं। मध्यकालीनता में घटित इन घटनाओं और चरित्रों में प्रेम, करुणा, विश्वास, उत्सर्ग, आस्था का जबरदस्त उदात्त रूप मिलता है। राजस्थानी सामंती परिवेश में ऐसी नैतिकता और मूल्यों का विकास आश्चर्यजनक तो है ही, प्रेरणास्पद भी है कि सामाजिक बदलाव के मानवीय प्रयत्न सदियों तक लोक को प्रभावित करते हैं। 'मारवाड़ के पांच पीरों' को लोक देवता की तरह पूजने के पीछे उनके क्रांतिकारी, सामाजिक बदलाव के कार्य ही हैं। मध्यकालीन अराजकता और रक्तपात के बीच इन लोकनायकों ने मानवीय गरिमा को बचाने के प्रयत्न किये थे, जो आज के समय में भी हमारे लिए प्रेरणास्रोत हैं। 'बाजारवाद' और 'विकासवाद' के इस आर्थिक कॉरपोरेटी युग में ये अतीत-कथाएँ हमारी सोच की अर्गलाओं को खटखटाती कह रही है कि क्या हमारे आसपास सबकुछ ठीक घटित हो रहा है ? यदि नहीं तो हमें हमारी सोच की दिशा बदलनी होगी।
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