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सूर्य से अमरावती तक- Surya Se Amravati Tak

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Specifications
Publisher: Bihar Rashtrabhasha Parishad
Author Suryanath Dubey
Language: Hindi
Pages: 206
Cover: HARDCOVER
9.5x6.5 inch
Weight 320 gm
Edition: 2019
HCE407
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Book Description

प्रस्तावना

समाज के बदलते मूल्यों एवं नैतिक वैचारिक ह्रास की छटपटाहट से उद्विग्न मन यह सोचने को बार-बार विवश करता है कि आखिर ये परिवर्तन क्या एकाएक हो रहे हैं, या अतीत से भी इनकी कड़ियाँ जुड़ी हुई हैं। इस पुस्तक की कहानियाँ अतीत के गोद में पली-बढ़ी हैं, तथा मेरे जीवन के अट्ठासी वर्षों के सुदीर्घ सफर में देखी गयी तथा समाज एवं जीवन की सच्चाईयों से सृजित हुईं। गहरे आत्म मंथन एवं अतीत का तार-तार तथा कोना-कोना खंगालने पर आज के इस गिरावट की कुछ परतें अवश्य खुलीं। भय तो यह भी होता है कि दिनकर जैसे साहित्य सर्जक पर लोगों ने तंज कसा-"ये तो केवल अतीत में ही गोते लगाते हैं। कभी इन्हें पार्थ का गांडीव एवं महायोद्ध भीष्म का अतुलित शौर्य एवं पराक्रम याद आता है, तो कभी राजा पूरूरवा एवं उर्वशी के प्रणय आलिंगन। लेकिन दिनकर द्वारा तत्कालीन लोगों का दिये गये जबाव, मुझे भी सम्बल प्रदान करते हैं :-

जब भी अतीत में जाता हूँ मुर्दों को नहीं जिलाता हूँ पीछे हटकर फेंकता बाण ताकि प्रकम्पित हो वर्तमान।

२०वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में गाँवों का तेजी से बाहर की ओर पलायन हो रहा था। तमाम लोक गीतों में 'पूरूब देसवा' जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं :- 'पिया मोरे गईले रामा पूर्वी बनीजिया'। ये पूरूब देश कौन थे-कलकत्ता, आसाम एवं बर्मा। आर्थिक तंगी से जूझ रहा समाज अस्तित्व की रक्षा एवं कुछ हद तक समृद्धि की चाह ने, लोगों को कलकत्ता के चटकल के कारखानों, हावड़ा एवं आसनसोल स्टेशनों पर कुलीगिरी, असम के चाय बगानों एवं बर्मा के लकड़ी की मिलों की ओर ले गई। अफ्रीकी महादेश में साम्राज्यवादी ताकतों के औपनिवेशिक विस्तार के दौर में १९वीं सदी के उत्तरार्द्ध से ही पलायन शुरू हो चुका था। बहुत सारे भोजपुरियों को गिरमिटिया बनाकर सात समन्दर पार सुदूर देशों में भेजने में अंग्रेजों को ज्यादा परेशानी नहीं हुई। भोजपुरिया, स्वयं कलकत्ता बंदरगाह पर गिरमिटिया नाम धारण कर अस्तित्व रक्षा एवं धनोपार्जन की चाह लिये सात समन्दर पार जाने को तैयार खड़े मिले। वस्तुतः भारतीय श्रमिकों को विदेशी धरती पर भेजते समय अंग्रेजी सरकार भारतीय श्रमिकों को मनचाहे अवधि तक बंधक मजदूर बनाये रखने के लिए एक एग्रिमेन्ट करती थी, एवं इसी एग्रिमेन्ट शब्द का अपभ्रंश रूप गिरमिट के रूप में आया तथा एग्रिमेन्ट के तहत बाहर जाने वाले श्रमिक गिरमिटिया मंजदूर कहलाने लगे।

इससे यह भी स्पष्ट होता है, कि गरीब होते हुए भी ये गिरमिटिया कितने निष्कलुप एवं छल-प्रपंच हीन थे। इन गिरमिटियों के स्वार्थ एवं छल-प्रपंच हीन श्रम ने दुनिया बदल डाली एवं आज वहीं गिरमिटिया भारतीय उन देशों की सत्ता की बागडोर संभाल रहे हैं। जब यह बात जेहन में आती है कि हमारा कोई पुरखा किसी देश के सत्ता की बागडोर संभाल रहा है, तो आनन्द की गजब सिहरन समूचे शरीर को गुदगुदा देती है।

लगभग उसी काल में चतुर सुजान भिखारी ठाकुर ने इस दर्द को महसूस किया और "विदेशिया" एवं "गबरधिचोर" को मंच पर आम लोगों के बीच परोसा। पलायन से सामाजिक कुरीतियाँ फैल रही थीं :-

प्यारी, देश तनी देखे द हमके बहरा जाके रोपेया कमाईब भेजत रहब हरमेस, देश तनी देखे द हमके एवं "पिया गईले कलकतवा ऐ सजनी" और फिर "बीत तारे आठों पहरिया हो, डगरिया जोहत ना"

जैसे अनेक गीतों से उन्होंने इस दर्द को उकेरा तथा "गबरघिचोर" तो उसकी चरम परिणति थी। भिखारी ने तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों को उजागर कर लोगों को उससे अवगत कराने तथा उसका नंगा रूप मंच पर दर्शा कर लोगों को बोध कराने का जो बीड़ा उठाया, उसमें पलायन की समस्या भी एक मजबूत कड़ी थी। लोगों ने इस दर्द को समझा और भिखारी को अपने माथे पर बैठा लिया। भिखारी अब आम लोगों के नायक हो चुके थे। गाँधी की सभाओं को यदि छोड़ दें, तो भिखारी के नाटकों के मंचन के समय जुटी भीड़ कहीं और दिखाई नहीं देती थी।

गिरमिटियों को छोड़कर आजादी के पूर्व जो लोग विदेशों में गये, वे तो देश के लिए साथ में सहेज कर कुछ लिए वापस भी आये एवं देश की मुख्य धारा से जुड़ गये। लेकिन आजादी के बाद प्रबुद्ध लोगों के एक बड़े तबके ने जो सात समन्दर पार किया, वे आज तक वापस नहीं लौटे। विदेश जाने को समाज में एक "स्टेट्स सिम्बल" दे दिया गया जिसका बहुत बड़ा कुप्रभाव भारतीय समाज एवं अर्थव्यवस्था पर पड़ा।

देश के बड़े-बड़े होनहार वैज्ञानिक, इन्जिनीयर एवं अन्य क्षेत्रों के विशिष्ट लोग उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से गये और वहीं के होकर रह गये। बूढ़े माता-पिता एवं परिवार के अन्य लोग जो होनहार बेटे से यश एवं समृद्धि की आस लगाये बैठे थे, उनकी आँखों से अजस्र अश्रुधारा बहते मैंने देखी है। यदि कहीं बात-चीत के क्रम में उनके बेटे का हाल-चाल पूछने की गलती हो गई तो आँसुओं के साथ उनकी घिग्घी बँध गई, और कुछ भी बता न पाये। दूर नहीं अपने पटना शहर का ही हाल देखिये। पर्याप्त भूमि एवं घेरे में बनी हुई तमाम अट्टालिकायें या तो बंद पड़ी है, या बूढ़े माँ-बाप उन भवनों की दरवानी कर रहे हैं। वह भी इसलिए कि उसका मोह उनसे दूर नहीं हो पा रहा है। साम्राज्य विस्तार करने वाले धनलोलुप बाहुबली दबंगों की नजरें लगातार उन बंगलों पर है और कभी कभार ऐसे संतानों द्वारा परित्यक्त बुजुर्गों की हत्यायें भी हो रही हैं। जानकारी लेने पर पता चलता है कि इनकी संताने विदेशों में जाकर बस गई हैं और उनके लिए यह संपत्ति अब तुच्छ हो गई है। हो सकता है, कि जब उनके वृद्ध माता-पिता की मृत्यु हो तो शायद उनके श्राद्धकर्म में सम्मिलित होने चलें आयें, मुखाग्नि देकर पुत्र का कर्त्तव्य निर्वहन तो असंभव ही प्रतीत होता है।

वैश्वीकरण के इस युग में इस प्रवृत्ति को राष्ट्र के लिए घातक माना जाय या उपयोगी यह बिन्दु चिन्तन का विषय है। क्या उनके द्वारा चिरपालित संस्कार और परम्परा को त्याग कर बिल्कुल नये ढाँचे में ढलना हमारी पहचान के लिए चिन्ता का विषय नहीं है। आखिरकार वहाँ भी बहुसंख्यक की कोई अलग पहचान नहीं बन पाती है, एकाध अतिविशिष्ट लोगों को छोड़कर। यदि ये भारतीय प्रतिभायें बाहरी मुल्कों को संपन्न बना सकती है, तो क्या राष्ट्रहित में उनका उपयोग नहीं होना चाहिए। यह भी मान लिया जाय कि बहुत से लोग अपनी परिपक्वता की उम्र में वहाँ जाते हैं, अतः यह आवश्यक नहीं है कि वे भारतीय संस्कृति एवं विचारधारा का परित्याग कर दें। लेकिन उनकी आने वाली पीढ़ी क्या कर रही है। वह पीढ़ी तो वहीं पैदा हुई और पली-बढ़ी। उन संतानों द्वारा वहाँ की व्यवस्था के अनुरूप आचरण करने पर क्या उन माताओं एवं पिताओं की छाती पर साँप नहीं लोटता होगा। ऐसे कई उदाहरण मैंने देखे हैं कि भारतीयता को पकड़े रहने की ख्वाईश में ऐसे अप्रवासी भारतीयों द्वारा अपने देश में आकर संतानों की शादियाँ आयोजित की, लेकिन वे सफल न हो सकी। और फिर वहाँ पहुँचकर उन संतानों ने मुक्त विचारों वाले लड़के-लड़कियों से दूसरी शादियाँ रचा लीं।

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