आज भारतीय राजनीति में 'सेक्युलर', 'धर्मनिरपेक्षता' तथा 'साम्प्रदायिकता' आदि शब्दों राजनीतिक लाभ के लिए गलत इस्तेमाल किया जा रहा है, इससे जनता को सावधान करना आवश्यक समझा गया है। एक दार्शनिक का कर्तव्य होता है कि समाज या राष्ट्र को गलत दिशा देने वाले ऐसे विषयों पर चिन्तन करते हुए, उससे जनता को भलि-भाँति अवगत कराते हुए, उन्हें सही सोच और सही मार्ग दिखलाये, जिससे उनका और उनके राष्ट्र का कल्याण हो। यहाँ 'सेक्युलरिज्म' के प्राचीन और वर्तमान अवधारणाओं और प्रयोगों पर सूक्ष्म-ध्यान दिया गया है और पाया गया है कि प्राचीन भारतीय राज्य स्वयं में सेक्युलर हुआ करते थे। आज भारत में प्रयुक्त यूरोपीय सेक्युलरिज्म उनके सामने ढकोसला मात्र है, यह अपर्याप्त है। ऊपर से 'सेक्युलरिज्म' का गलत अर्थ और प्रयोग के द्वारा राजनेताओं ने इसमें मुस्लिम या अल्पसंख्यक तुष्टीकरण का जहर ही घोल रखा है, जिसका दुष्परिणाम रूप दंगा-फसाद आज समाज में देखा जा रहा है। आज भारतीय सेक्युलरिज्म अल्पसंख्यक वोट बैंक की चाभी मात्र बनकर रह गया है। प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से समाज के सामने 'सेक्युलरिज्म' की सही सोच तथा सही परिभाषा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है और आशा की गई है कि सेक्युलरिज्म की नकारात्मक सोच को त्यागने और सकारात्मक सोच को स्वीकार करने का यह आग्रह देश की जनता तथा तथाकथित सेक्युलर राजनेताओं को भी ग्राह्य होगा।
डॉ० विजय कुमार सिन्हा, टी० एस० कॉलेज, हिसुआ, जिला-नवादा (बिहार) में दर्शनशास्त्र विभाग में विभागाध्यक्ष हैं। आपने 1975 में एम० ए० की डिग्री तथा 1989 में पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की है। आपके द्वारा लिखी गई पुस्तकें -एकात्मक मानववाद सरल अध्ययन, हमारी पंच निष्ठाएँ तथा चेतना का स्वरूप सामाजिक, राजनीतिक तथा शैक्षणिक क्षेत्र में सफल भूमिका अदा कर रही हैं। क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के सेमिनारों तथा संगोष्ठियों में प्रस्तुत किये गये आपके आलेखों, पत्रों ने हर स्थान पर व्यक्ति, समाज और भारत-राष्ट्र के समसामयिक विषयों या समस्याओं के प्रति लोगों का ध्यान आकृष्ट करने तथा उसके समाधान की दिशा में आगे आने को प्रेरित किया है। आपकी सोच राष्ट्रीय है। व्यक्ति-निर्माण से राष्ट्र-निर्माण आपकी परिकल्पना है। राष्ट्र पर स्व को न्यौछावर करना आपका ध्येय है। अपने आलेखों तथा पुस्तकों के माध्यम से आप इस विषय पर समाज का ध्यान आकृष्ट करने को प्रयासरत्त हैं।
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