उत्तर भारत की हर कोख में, हर मोड़ पर, हर छोर पर चाहे ऊँची पहाड़ियी हो या सूखा रेगिस्तान या फिर लहलहाते खेत, हर तरफ मधुर स्वर, वाद्यों की गूज एवं नृत्य की धिरकन सुनाई व दिखाई पड़ती है। यह सौन्दर्यगयी बहुआयामी भाव धारा उत्तर भारत में सदियों से प्रवाहमय है जी यहां के जनमानस के अंतरंग को सीथती आई है और लोक संगीत व लोक नृत्यों को रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी रूपांतरित हो रही है। इसी धरोहर से प्रेरित होकर मेरे मन में उत्तर भारत के लोक नृत्यों में लोक संगीत की विशिष्टता के प्रति बहुत सी जिज्ञासायें प्रस्फुटित हुई। इसी जिज्ञासा को प्रायोगिक रूप देने के लिए मैंने उत्तर भारत के अलग-अलग प्रदेशों में जाकर वहाँ के लोक नृत्यों व उनमें प्रयुक्त वाद्य के महत्त्व को पहचाना।
भारत का सांस्कृतिक जीवन ऐसी धार्मिक एवं दार्शनिक मान्यताओं और आस्थाओं के ताने बाने से गूँथा हुआ है, जिसने इस देश को सदियों से एक सूत्र में बाँध कर रखा है। इस संस्कृक्ति के दर्शन उत्तर भारत में पूर्ण रूप से होते हैं। यह स्थल साहित्य, वास्तुकला, चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य और नाट्य आदि कलाओं का मिलन स्थल भी है। राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश (पश्चिम) व उत्तरांचल क्षेत्रों की आध्यात्मिक प्रकृति अपने आप में तांत्रिक विधान की सूक्षमताओं के आधार पर लोक संगीत व नृत्य का पालन पोषण करती है। पहाड़, झरना, नदी, मयूर, मानव मन, देवताओं की प्रकृति और सौन्दर्यता सभी कुछ एक लय में नृत्यमान है। इसी प्रकार लोक नृत्य जीवन का स्वाभाविक भावना अभिव्यंजन है। ग्रामीण लोगों का सरल सपाट जीवन उनमें आत्मीयता भरता है और जब आत्मीयता उफान पर आती है तो लोक नृत्य व संगीत का स्वाभाविक स्वरूप उत्पन्न होता है। अतः लोक नृत्य व सगीत का इतिहास भी उतना ही प्राचीन है जितना मानव स्वयं। सन्दर्मित विषय उत्तर भारतीय लोक वाद्यों की लोक नृत्यों में प्रयोगात्मक विलक्षणता' को कुल छः अध्यायों में विभाजित किया गया है तथा आदिमानव काल से लेकर आधुनिक काल तक लोक वाद्यों व नृत्यों के सामंजस्य को रूपांतरित करने का प्रयास किया गया है।
इस पुस्तक में विचारकों व जिज्ञासुओं की जिज्ञासा को और भी सघन बनाने हेतु वांशिक व रौचक सामग्री भी शामिल की गई है। इस अध्ययन कार्य में स्वाभाविक अभिव्यक्ति, कल्पनाशीलता, कौशल व उचित सोच को आस-पास के परिवेश में ही विकसित करने का प्रयास किया गया है। पुष्टि वर्धक आंकडों की सहायता से विषय से सम्बन्धित बहुत से संवेदनशील पहलुओं को भी जोड़ा गया है। मैं आशा करती हूँ कि यह पुस्तक प्रत्येक विधारक व जिज्ञासुओं की आशाओं के अनुरूप होगी।
सन्दर्भित विषय 'उत्तर भारतीय लोक वाद्यों की लोक नृत्यों में प्रयोगात्मक विलक्षणता' पर कार्य एक अत्यन्त विस्तृत एवं विशाल फलक होने के कारण एक बड़ी चुनौती के रूप में मेरे सम्मुख था। मुझे भारत की अथाह सागर के समान संस्कृति के उन पहलुओं को विवेचित करना था जो एक-दूसरे पर आश्रित तो थे परन्तु एक दूसरे के महत्त्व को नहीं पहचानते थे। इस पहचान को साकार रूप देने में मैं उन सभी महानुभावों, सहयोगियों, मित्रों, सगे-सम्बन्धियों तथा विषय से सम्बन्धित विद्वानों, कलाकारों तथा संस्थाओं की हमेशा ऋणी रहूंगी जिनके प्रोत्साहित व उत्साहवर्धक सहयोग से मैं कृतार्थ हुई। इस कृति का श्रेय उन सभी प्रतिष्ठित लेखकों, लेखिकाओं, शोधकर्ताओं को भी जाता है जिनकी विद्वतापूर्ण रचनाओं के माध्यम से उक्त कृति की सम्पूर्णता और समग्रता में मैंने सहयोग लिया।
ईश्वर की असीस कृपा व मेरे गुरुओं तथा माता-पिता के आशीर्वाद के फलस्वरूप ही मैंने इस कठिन प्रक्रिया से गुजरने का सामर्थ्य पाया। सर्वप्रथम मैं नमन करती हूँ स्वयं ज्ञान एवं संगीत की देवी माँ सरस्वती को जिन्होंने अपने वरद हाथों में छिपे आशीर्वाद से मेरी बुद्धि को इस कृति के योग्य बनाया।
इसके पश्चात् में आभारी हूँ डा. यशपाल शर्मा व डा. जगमोहन शर्मा जी की जो मेरे प्रेरणा स्त्रोत रहे व मेरी पी.एच.डी के कार्य दौरान मेरे निर्देशक व सह-निर्देशक भी रहे।
प्रकाशन का यह कार्य अपना साकार रूप तभी ले पाया है जब इसे उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र पटियाला व चंडीगढ़ का सहयोग प्राप्त हुआ। केन्द्र के निदेशक डा. सौभाग्यवर्धन जी तथा केन्द्र में कार्यरत अन्य कर्मियों के उत्साहवर्धक सहयोग के लिए मैं अत्यन्त आभारी हूँ जिन्होंने मेरी इस अध्ययन कृति को समग्र बनाने में सहर्ष सहायता की।
मैं आभारी हूँ अपने टंकक मोहित, कमल कम्प्यूटर्स की जिस ने इस सांगीतिक लिपिकरणिक, फोटोग्राफिक जैसे जटिल कार्य को बाखूबी निभाया।
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