पुस्तक परिचय
संस्कृत के आदि कवि वाल्मीकि द्वारा काव्य रामायण में जिस राम कथा का प्रणयन किया गया है, इसी कथा का आश्रय लेकर भवभूति ने उत्तररामयरितम् एवं दिड्नाग ने कुन्दमाला का प्रणयन किया। प्रस्तुत पुस्तक में दोनों नाटककारों के व्यक्तित्व एवं कृक्तित्व पर विचार करते हुए उनसे पूर्व के संस्कृत नाटकों पर विचार किया गया है साथ ही अधिकारिक, प्रासंगिक एवं मिश्रित इति वृत्त विवेचन किया गया है, तथा नाटकीय तत्वों, अर्थ, प्रकृतियाँ, अवस्थाएँ, पंचसन्धियों, अर्थोपक्षेपक की दृष्टि से तुलनात्मक समीक्षा की गयी है। दोनों नाटकों के नायक-नायिका अन्य पात्रों एवं काल्पनिक पात्रों की भिन्नता पर विचार किया गया है। नाटकों में प्रयुक्त अन्य रसों तथा काव्य-सौन्दर्य, विषय-वस्तु, रस, भाषा-शैली, प्रकृक्ति चित्रण, रंग-मंच, अभिनय की दृष्टि से भी अध्ययन किया गया है। इसी क्रम में दोनों नाटकों की सामाजिक स्थिति जैसे वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, संस्कार, परिवार, राज्य व्यवस्था, खान-पान, मनोरंजन के साथ-साथ कला आदि विषयों पर अध्ययन किया गया है। प्रत्येक अध्याय के अन्त में प्रतिपाद्य विषय का विवेचन तुलनात्मक दृष्टिकोण से करने का प्रयास किया गया
प्राक्कथन
संस्कृत के आदि कवि वाल्मीकि द्वारा काव्य रामायण में जिस राम कथा का प्रणयन किया गया है। परवर्ती संस्कृत कवियों, ने भी उसी का आश्रय लेकर अनेक गद्य एवं पद्म काव्यों का प्रणयन किया है। तथा राम कथा को उपजीव्य बनाकर संस्कृत के नाटकों में हनुमन्नाटक, महावीर चरितम्, प्रतीमानाटक, अनर्घराघव, उदात्तराघव, उन्मत्तराघव, प्रसन्नराघव, आश्चर्यचूड़ामणि आदि अनेक नाटकों की रचना की गयी। इसी कथा का आश्रय लेकर भवभूति ने उत्तररामचरितम् एवं दिङ्नाग ने कुन्दमाला का प्रणयन किया। यद्यपि भवभूति एवं दिङ्नाग के इन नाटकों पर भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वान पूर्व में विचार कर चुके हैं। किन्तु ये विचार एवं आलोचनायें उनकी कृतियों के सम्बन्ध में पृथक-पृथक रूप से हुयी हैं। दोनों नाटककारों की नाट्यकृतियों को ध्यान में रखते हुए नाट्यशास्त्रीय दृष्टिकोण से इनका तुलनात्मक अध्ययन का प्रयास नहीं किया गया है ये दोनों नाट्य कृतियाँ संस्कृत साहित्य में अपना विशिष्ठ स्थान रखती हैं। यह शोध प्रबन्ध नाट्य एवं विषमताओं को उजागर करेगा, इन्हीं विचारों को ध्यान में रखकर शोध के लिए उक्त विषय का चयन किया गया है। शोध प्रबन्ध अध्याय में दोनों नाटककारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विचार करते हुए उनसे पूर्व के संस्कृत नाटकों पर विचार किया गया है। द्वितीय अध्याय में आधिकारिक, प्रासंगिक एवं मिश्र इति वृत्त का विवेचन किया गया है तथ्ण नाटकीय तत्वों अर्थ प्रकृतियाँ, अवस्थायें, पंचसन्धियाँ, अर्थोपक्षेपक की दृष्टि से तुलनाक, समीक्षा की गयी है। तृतीय अध्याय में दोनों नाटकों के नायक, नायिका, अन्य पात्रों एवं काल्पनिक पात्रों की भिन्नता पर विचार किया गया है। चतुर्थ अध्याय में मुख्य रस एवं दोनों नाटकों में प्रयुक्त अन्य रसों पर तुलनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है तथा काव्य सौन्दर्य पर विचार किया गया है, इसके अन्तर्गत विषय वस्तु, रस, भाषा शैली, प्रकृति चित्रण और दोनों नाटकों में अतिप्राकृत तत्वों पर विचार किया गया है। पंचम अध्याय में रंगमंच में अभिनय की दृष्टि से दोनों नाटकों पर विचार किया गया है। षष्ठ अध्याय में दोनों नाटकों की सामाजिक स्थितियों पर विचार किया गया है जिसमें कि वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, संस्कार, परिवार, राज्य व्यवस्था, खान-पान, मनोरंजन के साधन एवं कला आदि विषयों को प्रस्तुत किया गया है। सप्तम् अध्याय में सम्पूर्ण अध्यायों के निष्कर्ष को प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक अध्याय के अन्त में प्रतिपाद्य विषय का विवेचन तुलनात्मक दृष्टिकोण से करने का यथाशक्ति प्रयास किया गया है। इस शोध प्रबन्ध को समाप्त करने से पहले मैं डॉ० (श्रीमती) कमला चौहान, रीडर संस्कृत विभाग तथा विभागाध्यक्ष संस्कृत प्रोफेसर राम प्रताप तिवारी, एच.एन.वी. गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर (गढ़वाल) के प्रति हार्दिक कृतज्ञता प्रकट किये बिना नहीं रह सकती। जिनके निर्देशन में मैंने यह शोध कार्य पूर्ण किया। इसके पश्चात् मैं डॉ० जयसिंह चौहान (रीडर), वनस्पति विज्ञान विभाग, के प्रति भी अपना आभार व्यक्त करती हूँ। जिन्होंने इस कार्य को पूर्ण करने में मुझे पूर्ण सहयोग दिया। पूज्य माता जी-पिता जी जिन्होंने समय-समय पर सहानुभूतिपूर्वक पूर्ण शब्दों द्वारा मुझे उत्साहित किया, उनके प्रति भी मैं हृदय से आभारी हूँ। प्रस्तुत शोध प्रबन्ध को पूर्ण करने में जिन विद्वान, ग्रन्थकारों के ग्रन्थों से मुझे आवश्यक जानकारी प्राप्त हुई, उनके प्रति मैं कृतज्ञ हूँ। मैं डिजीटैक कम्प्यूटर्स, श्रीनगर गढ़वाल को आभार प्रकट करती हूँ जिन्होंने इस कार्य को टंकण द्वारा पूर्ण करने में मुझे सहयोग प्रदान किया। अन्त में मैं अपने मित्र कु० माधुरी (मधु) बिष्ट, एवं अनुज विजय को धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकती जिन्होंने कि शोध कार्य को सम्पन्न करने में मुझे सहयोग दिया।
लेखक परिचय
डॉ. लक्ष्मी राणा
जन्म : जिला-चमोली, उत्तराखण्ड शिक्षाः एम.ए. संस्कृत, एच.एन.बी. गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल। पी-एच.डी., एच.एन.बी. गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल, उत्तराखण्ड । सम्प्रतिः एच.एन.बी. गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय परिसर, वादशाहीथौल, नयी टिहरी में संस्कृत प्रवक्ता के पद पर कार्यरत।
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