प्राक्कथन
लडकियों के लिए इन्टर से अधिक पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है ऐसी मान्यता वाले संयुक्त परिवार में जन्म लेकर भी मेरे मन में पढ़ाई की एक उत्कट अभिलाषा पता नहीं कहां से उत्पन्न हो गयी थी। 'जहां चाह वहां राह कहावत चरितार्थ हुई और मेरे अनुज चिरंजीव संजय गर्ग ने जहां मुझे एम०ए० (संस्कृत), बी०एड० करने में व्यक्तिगत सहयोग दिया वहीं विवाहोपरान्त मेरी श्वश्नुमाता आज गोलोकवासिनी सत्यवती देवी जी के शुभाशीर्वाद तथा सहयोग से स्थानीय मुन्नालाल गर्ल्स पी०जी० कॉलेज, सहारनपुर से मैंने एम०ए० अंग्रेजी में भी कर लिया। इसके बाद भी मन में पी-एच०डी० करने का विशेष सपना था जिसे मैं कभी पूरा न हो सकने वाला समझ बैठी थी। मुन्नालाल कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ते हुए संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ० सिप्रा बैनर्जी को देखती तो एक इच्छा होती 'काश में इनकी शिष्या बन पाती। एक दिन मैंने अपने पति के समक्ष अपनी इस उत्कट अभिलाषा को प्रकट कर ही दिया और तभी मुझे उनकी अनुमति ही नहीं पूर्ण समर्थन भी प्राप्त हुआ। अग्रजातुल्या कौशल दीदी के माध्यम से मैं डॉ० सिप्रा बैनर्जी के समक्ष जा पहुंची। दीदी के निर्देशानुसार में प्रतिदिन पुस्तकालय में पुराण आदि पढ़कर लिखती रही। पुनः बीस दिन बाद मैं पहुंची तो उन्होंने मुझे अपनी शिष्या बनाने की स्वीकृति दे दी। उन्होंने मुझे विषय सुझाया, 'पुराणों में अप्सरा एक अनुशीलन' । पुराणों एवं अप्सराओं का नाम सुनकर मैं रोमांचित हो गई और यथासमय मेरा शोध प्रबन्ध चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में प्रस्तुत किया गया तथा जनवरी 2007 में मैंने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। उसी शोध प्रबन्ध को कुछ परिवर्तित करके, 'अप्सरा' (पुराणों के विशेष सन्दर्भ में) के नाम से प्रकाशित करवाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि रामायण तथा महाभारत वे आधार ग्रन्थ हैं जिनके बिना अप्सराओं का परिचय अधूरा ही है अतः पुराणों में अप्सरा शोध का विषय होने पर भी जहां आवश्यकता हुई उक्त दोनों आर्ष काव्यों को भी अध्ययन के सीमाक्षेत्र में लाया गया है।
लेखक परिचय
डॉ. (श्रीमती) कुसुम बंसल का जन्म एक अग्रवाल परिवार में पिता श्री सुखबीर सिंह गर्ग एवं माँ श्रीमती समुन्द्री देवी के घर (12) 4.1964) उत्तर प्रदेश के शामली नगर में हुआ। उन्होंने एम.ए. संस्कृत और बी.एड. की शिक्षा विवाह से पहले प्राप्त की। विवाह के पश्चात् भी अपनी सासु माँ (श्रीमती सत्यवती), श्वसुर पिता (श्री सुमेर चन्द बंसल) की अनुमति एवं पति श्री सुशील बंसल के पूर्ण सहयोग से अध्ययन जारी रखा। एम.ए. अंग्रेजी एवं शोध कार्य 'पुराणों में अप्सरा एक अनुशीलन' पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए पूर्ण किया। उनकी पुत्री डॉक्टर एवं पुत्र सिविल इंजीनियर हैं। सामाजिक एवं आध्यात्मिक सेवा को वे अपने स्वाभाविक कर्त्तव्य मानती हैं। वे गायत्री परिवार शान्तिकुंज हरिद्वार से जुड़ी हुई हैं तथा जप, ध्यान, स्वाध्याय, मन्त्र-चिकित्सा आदि सेवा प्रकल्पों में सक्रिय रहती हैं।
पुस्तक परिचय
प्रस्तुत ग्रंथ में रामायण, महाभारत के साथ-साथ अठारह महापुराणों के अतिरिक्त भी अन्य उपपुराणों का अध्ययन करके अप्सराओं के सर्वांगीण रूपों को प्रस्तुत किया गया है। इस ग्रन्थ में अप्सराओं की उत्पत्ति, परिवारिक 5 परिचय क्रियाकलाप, इन्द्र के प्रति कर्तव्य-निष्ठा, सामाजिक मर्यादा आदि समस्त पक्षों का विश्लेषणात्मक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। शिव सहस्रनाम में 'अप्सरोसेवितः नाम अप्सराओं की दैवीय स्थिति को बताता है। मांगलिक अवसरों पर भी अप्सराएं माँ लक्ष्मी, माँ पार्वती के साथ उपस्थित रहती हैं। राम के राज्याभिषेक के समय आकाश से पुष्प वर्षा करने वाली अप्सराएं थीं। पुंजिकस्थला अप्सरा ही शापवश वानर राज केसरी की पत्नी हुई एवं परम पूज्य रामभक्त महावीर बजरंगबली श्री हनुमान की माँ माता अंजनी अंजना अप्सरा है जो अप्सराओं की उच्च महान स्थिति को ज्ञापित करता है।रामायण काल में समुद्रमन्थन से साठ हजार अप्सराओं की उत्पत्ति हुई। महाभारत काल में दक्ष कन्या प्रावा की पुत्रियाँ अप्सराएं थीं। पुराणों में प्रजापति कश्यप और दक्ष कन्या मुनि और प्राधा की पुत्रियाँ अप्सराएं हुई। हम मात्र कुछ ही अप्सराओं के नाम मेनका, रम्भा, उर्वशी, तिलोत्तमा, घृताची आदि से परिचित हैं। इस पुस्तक 'अप्सरा' में 251 अप्सराओं के नाम, परिचय, कर्त्तव्य-दायित्व एवं समाज में स्थिति सब एक ही स्थान पर संकलित हैं। पाश्चात्य साहित्य में अप्सरा के स्थान पर निम्फ का परिचय मिलता है, परन्तु संस्कृत वाङ्मय की अप्सराओं के साथ उनका कोई सामंजस्य नहीं बैठता। यह ग्रंथ इन अप्सराओं के सर्वांगीण रूप को उकेरता है, अप्सराओं के भूले-बिसरे पक्ष को सामने लाने का प्रयास है जहां अप्सरा केवल सौंदर्य नहीं, अपितु चेतना, कर्त्तव्य, मर्यादा और दैवीय उद्देश्य से जुड़ी पूर्ण सत्ता के रूप में दिखायी देती है।
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