पुस्तक परिचय
महाकवि डॉ. नारायणसिंह जी भाटीमहाकवि डॉ. नारायणसिंह जी भाटी का काव्य राजस्थान की आत्मा है। यह अमर ज्योति सम्पूर्ण राजस्थान के विराट रूप को विश्व में आलोकित करती है। इसके पवित्र प्रकाश में विश्व के लोगों को राजस्थान का अद्भुत रूप दिखाई देता है। डॉ. भाटी का काव्य राजस्थान का केवल वर्णन ही नहीं अपितु सजीव व अजर-अमर साक्षात् विराट व्यक्तित्व का स्वामी प्रत्यक्ष राजस्थान है। आपका काव्य पढ़कर इस वीर धरा, भक्ति, ज्ञान व योग के कल्याणकारी मोक्षदायिनी विराट स्वरूप से साक्षात्कार किया जा सकता है, क्योंकि यह काव्य राजस्थान की ऐतिहासिक व आध्यात्मिक धरोहर है। इस दिव्य धरोहर के दर्शन करके यहां की वीरता की वैभवशाली-ऐतिहासिक परम्परा, भक्ति परम्परा का भव्य रूप, संत परम्परा का स्वर्णिम स्वरूप एवं योग-साधना का मोक्षदायी महापथ का प्रामाणिक परिचय प्राप्त किया जा सकता है। डॉ. भाटी का काव्य जगत् यहां की सुविख्यात-ऐतिहासिक कला का ज्ञान कोष, चित्रोपम शैली में आपके सम्मुख प्रकट करके आपको अनोखे आत्मानन्द से ओतप्रोत करता है। राजस्थान की धोरा धरती, कीर्ति स्तम्भ स्वरूपी पहाड़ों की परिधि में स्वतः निर्मित प्रतिमाओं का संगम स्थल।
लेखक परिचय
श्री रघुनाथसिंह भाटी के घर में 10 दिसम्बर, 1952, नोख, जैसलमेर (राजस्थान) में जन्मे आईदान सिंह भाटी राजस्थानी के लब्ध-प्रतिष्ठित कवि, आलोचक और कथाकार हैं। 'हंसतोड़ा होठां रौ सांच', 'रात कसूबल', 'आँख हींयै रा हरियल सपना' और 'खोल पांख नै खोल चिड़कली' उनकी राजस्थानी की प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं जो उनकी प्रतिष्ठा का आधार है। वर्तमान में आप स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जैसलमेर से सेवानिवृत्ति के पश्चात् साहित्य-लेखन में संलग्न हैं।
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