नवागन्तुक ने कहा मैं तुमसे कुछ बातें करने के लिये बड़ी दूर से चलकर आया हूँ। वह एक रंगकर्मी कलाकार था। उसके बाल लम्बे तथा हाथ कोमल थे। यद्यपि वह धीमी आवाज में, नपे तुले शब्दों में बोल रहा था, तथापि उसकी वाणी में एक प्रकार की बेचैनी झलकती थी। उस समय कमरे में अनेक लोग थे। वहाँ कुछ दिनों से जीवन के उद्देश्य तथा अर्थ पर वाद विवाद चल रहा था। आज भी ये लोग उसी विषय पर चर्चा करने के उद्देश्य से एकत्रित हुए थे। नवागन्तुक कलाकार ने कुछ झिझकपूर्वक बोलना प्रारंभ किया।
उसने कहा, "मेरे जीवन में अनेक उतार चढ़ाव आते रहे हैं और उन परिस्थितियों का मैने अच्छी तरह से अनुभव किया है। मुझे इससे कोई शिकवा शिकायत भी नहीं है। परन्तु मुझे फिर भी ऐसा लगता है कि मैं कुछ चूक गया हूँ। अब मैं अपने अस्तित्व तथा दूसरों के साथ अपने संबंधों पर ही प्रश्न चिह्न लगाता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे जीवन में पर्याप्त लक्ष्य का अभाव रहा है। मेरे मन में संन्यास लेने का विचार भी उठा, परन्तु मेरे पीछे परिवार है जिसके भरण-पोषण का दायित्व मेरे कंधों पर है। मैं अभी पारिवारिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया हूँ। परन्तु इन सबके होते हुये भी मेरे मन में अपने जीवन को एक नया लक्ष्य तथा दिशाबोध देने की प्रबल इच्छा है।
मैं आध्यात्मिक खोज की डगर पर बढ़ना चाहता हूँ। परन्तु मैं पारिवारिक दायित्वों के बोझ से दबा शादीशुदा व्यक्ति हूँ और मुझे ऐसा लगता है कि अध्यात्म के सभी दरवाजे मेरे लिये बंद है। यदि मेरे भीतर यह इच्छा पहले जगी होती, तो निश्चय मानिये मैं स्वयं को विवाह, पारिवारिक तथा सामाजिक बंधनों में बंधने नहीं देता। परन्तु अब तो बड़ी देर हो चुकी है। समझ में नहीं आता कि अब कहाँ से जीवन का श्री गणेश करूँ।"
वह थोड़ा रुका, मानो उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर अपने भीतर तलाश रहा हो। उसकी आयु अधिक नहीं लगती थी तथा वेशभूषा भी सामान्य थी। स्वामीजी ने उनकी ओर देखकर कहा- "हर समस्या का समाधान संभव होता है। देखो, बच्चा पैदा होकर बड़ा होता, विवाह करता, बूढ़ा होता तथा एक दिन इस संसार से बिदा हो जाता है, सर्वत्र यही तो हो रहा है। परन्तु क्या इससे हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि यही कुछ जीवन का अंतिम लक्ष्य है? ऐसे अनेक महत्वपूर्ण तथ्य हैं, जो मनुष्य के जीवन को निश्चित करते हैं। मनुष्य अपने साथ कुछ निश्चित कर्म और संस्कार लेकर पैदा होता है। जीवन यात्रा प्रारंभ करने के पहले उसे इन्हें भोगकर निःशेष करना होता है। परन्तु इसमें क्या तुक है कि एक ओर तो हम अपने पिछले कर्मों और संस्कारों को निःशेष करें तथा साथ ही साथ आगामी जीवन को प्रभावित करने के लिये नये कर्मों तथा संस्कारों की थाती संजोयें।
अस्तु यह अत्यंत वांछनीय है कि समझदारी तथा सावधानीपूर्वक हम इस तरह जीवन यापन करें कि हमारे अस्तित्व की गुणवत्ता निखरे। मैं तुम्हारी आयु के तथा अनेक वृद्ध लोगों को जानेता हूँ, जिनके जीवन में ऐसी ही समस्यायें आई थीं। वह भी उच्च सार्थक जीवन जीना चाहते थे, उनमें से अनेक सोचते थे कि संन्यास ले लें। परन्तु ऐसा नहीं कर सकते थे। क्योंकि वे पारिवारिक बंधनों तथा दायित्वों से उबर नहीं पाए थे। पारिवारिक दायित्वों से पलायन और फिर शेष जीवन भर अपराध बोध की पीड़ा भोगने में कोई बुद्धिमानी नहीं है।"
बाहर घने बादल छाए थे। वर्षा थम चुकी थी। हवा में गीली मिट्टी का सोंधापन भरा था। स्वामी जी ने कहा, "यदि तुम जीवन को सही परिप्रेक्ष्य में देखो और स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल ढाल सको तो तुम देखोगे कि तुम्हारी समस्या अपने आप सुलझ जायेगी। तुम्हारी समस्या इतनी सरल है कि मुझे तो उसे समस्या कहने में भी संकोच का अनुभव होता है।"
"भौतिक जीवन के अनुभवों की तुम्हारी प्यास बहुत कुछ बुझ गई सी लगती है। अब तुम्हारी चेतना के नये आयाम खुल रहे हैं। इन अनुभवों का सीधा संबंध तुम्हारे विकास से है। तुम चाहो तो इसे मानसिक, आध्यात्मिक अथवा चेतना का विकास कह सकते हो। इसीलिये तुम्हें बेचैनी का अनुभव हो रहा है। क्योंकि इन नये अनुभवों को तुम अपने दैनंदिन जीवन में स्थापित तथा समायोजित नहीं कर पा रहे हो।"
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