काशीस्थ नागरीप्रचारिणी सभा का प्रिय शब्द है। काशीस्थ अर्थात् काशी में स्थित, काशी में विद्यमान, काशी में रहनेवाला, काशी में लगा हुआ या काशी में लीन।>
काशीस्थ इस पुस्तक की संज्ञा है। स्वभाव भी है। शुक्लयजुर्वेदीय शतपथ ब्राह्मण और कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद से भारतेंदुयुगीन गुंडे-ग़ज़लगो तेग अली तक-इसके पृष्ठ काशी की असंभवता, औदात्य और अवदान के उल्लेख में व्यस्त हैं।>
काशी के बारे में ख़ूब लिखा गया है। फाह्यान से शुरू कीजिए और फ़िलिप लुटगेनडॉर्फ़ तक आ जाइए-देशी-विदेशी विद्वानों ने समय-समय पर यथासंभव वैविध्य और व्यापकता के साथ इस कालजयी सभ्यता को पहचाना, जाँचा-परखा और अपनाया; फिर भी, नागरीप्रचारिणी सभा एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता का अनुभव कर रही थी जो काशी के बारे में हो और काशीस्थ मूर्धन्यों द्वारा लिखी गई हो-ऐसे मूर्धन्य, युग विशेष में जिनकी बौद्धिकता काशी में घटित और व्यक्त हुई और तब जाकर संसार के सम्मुख आई। यह प्रयत्न इसी आवश्यकता की पूर्ति के निमित्त किया गया है।>
यों, हमने यह कोशिश भी की है कि इस प्रयत्न के माध्यम से उन रचनाओं को पाठकों और काशी-प्रेमियों के सामने लाया जा सके, जो विभिन्न कारणों से लोगों के चित्त के भूगोल में नहीं हैं। मिसाल के लिये, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को हमलोग एक विशिष्ट आलोचक और संस्कृति-चिंतक के तौर पर याद करते हैं, लेकिन शायद ही किसी को मालूम हो कि उन्होंने कभी उत्तर मध्यकालीन काशी में संस्कृत-शिक्षा के परिवेश पर एक लंबा निबंध लिखा था। यह निबंध उनकी रचनावली में भी नहीं है, लेकिन हमने उसे ढूँढ़ निकाला है। मूल्यवान संदर्भों और अंतर्दृष्टियों से संपन्न यह निबंध अब काशीस्थ का अंश है- जाहिर है कि यह कृति काशी की ही नहीं, हमारे देश के सांस्कृतिक इतिहास की भी अनमोल धरोहर है।>
ऐसे ही, युग-प्रवर्तक आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर एकाग्र आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र का निबंध भी पिछले पचहत्तर वर्षों से अज्ञात था। यशस्वी कोशकार बाबू रामचंद्र वर्मा ने काशी की होली के बहाने इस सभ्यता के विलक्षण अभ्यासों पर प्रकाश डाला है। शिवप्रसाद मिश्र 'रुद्र' अपने कालजयी उपन्यास बहती गंगा के लिये जाने-माने जाते हैं, लेकिन उन्होंने भारतेंदुयुगीन कवि तेग अली की रचनाओं की प्रवहमान, वैदुष्यपूर्ण और बनारसी रंगतवाली टीका लिखी, जो एक अर्थ में खो ही गई थी। प्राचीन काशी में अध्ययन-अध्यापन की परंपरा पर एकाग्र डॉक्टर मोतीचंद्र का सुदीर्घ निबंध प्रथमतः सभा द्वारा आयोजित संपूर्णानंद अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित हुआ था। उक्त ग्रंथ अब अप्राप्य है। मनुष्य के आत्मबोध में निहित काशी, यहाँ की सनातनता और वैदुष्य पर केंद्रित महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज, पंडित विद्यानिवास मिश्र, डॉक्टर राजबली पांडेय और कवितार्किक चक्रवर्ती महादेव शास्त्री पांडेय के निबंध भी; हमारा यकीन है कि अलक्षित, बल्कि अज्ञात रहे आए हैं। इस बात में कोई शक नहीं कि इन मूर्धन्यों के कृतित्व के दूसरे आयामों पर पर्याप्त रौशनी पड़ी, बस काशी वाले प्रसंग ही रह गए।>
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