सामायिक' शब्द का अर्थ विशाल एवं गूढ है; परन्तु यह जन सामान्य की जानकारी में उतना नहीं है जितना 'योग' शब्द आ गया है। जो सामायिक शब्द से परिचित हैं. वे भी इसके गहन अर्थ से इतने परिचित नहीं हैं। अतः सामायिक के व्यापक एवं गूढ़ अर्थ को योग से तुलना कर बताया है कि यह एक 'पर्ण योग' है। सामायिक साधना की प्रक्रिया भी है और साध्य भी। सामायिक एक विधि भी है और स्थिति भी। सामायिक का अर्थ समता, साम और सम्म-तीन मनः स्थितियों से किया है। दुःख व सुख में समता में रहना या सन्तुलन बनाये रखना समता कहा जा सकता है। सब जीवों से मैत्री-भाव और स्नेह 'साम' कहा जाता है और दर्शन, ज्ञान व चारित्र के तन्मय परिणाम को सम्म सामायिक कहा जा सकता है। उपरोक्त तीनों स्थितियों को जीवन में लाना या इन तीन स्थितियों में अपने आप को स्थित करना ही सामायिक है। 'सम' या समता शब्द बहुत व्यापक एवं गहन है। समता का अर्थ केवल सन्तुलन से नहीं, वरन् राग-द्वेष रहित अवस्था, मैत्री, समभाव एवं ज्ञान-दर्शन चारित्र की एकता इन सबसे किया जाता है। जीवन में 'समता' आना जीवन का लक्ष्य प्राप्त करना है। समता की उच्चस्थ श्रेणी उच्चतम सामायिक है, अन्तिम स्थिति है और इसके बाद कुछ करने को शेष नहीं रहता है। 'योग' शब्द का आज जो व्यापक एवं प्रचलित अर्थ है, वह तो केवल आसन, प्राणायाम तक सीमित है। दुर्भाग्य से एक आध्यात्मिक शब्द को शरीर की भौतिक क्रियाओं तक ही सीमित कर दिया है। योग शब्द का प्रयोग विभिन्न सन्दर्भों में अलग-अलग हुआ है; परन्तु आध्यात्मिक सन्दर्भ में योग वह साधना है, जिससे 'ब्रह्म' से साक्षात्कार हो या 'मोक्ष' मिले या आत्मा को शुद्धतम स्थिति प्राप्त हो। चित्तवृत्ति निरोध या मन, वचन, काया के योगों को मोक्षप्राप्ति में जोड़ना आदि सभी अर्थों में योग आत्मा की उच्चतम स्थिति प्राप्त करने का साधन है। 'सामायिक' शब्द जब 'साधना' के रूप में प्रयुक्त होता है, तो वह एक घड़ी या ४८ मिनट के लिये एक स्थान पर स्थित हो गीतार्थ, सद्गुरुओं की विनय, भक्ति, उपासना करने से होता है। इसे द्रव्य सामायिक या श्रुत सामायिक भी कहते हैं। इस प्रक्रिया से ज्ञानार्जन, भक्तिभाव और अनासक्त भाव की प्राप्ति होती है। इसी साधना में ध्यान व कायोत्सर्ग की विधि से मन का शोधन भी किया जाता है। ध्यान व कायोत्सर्ग की गहन साधना जैन साधुओं ने अवश्य की, परन्तु बहुत कम साधुओं ने उस विधि को लेखन का रूप दिया या अक्षुण्ण रूप से बनाये रखने का प्रयास किया। कुछ आचार्यों ने, यथा-हरिभद्रसूरिजी व हेमचन्द्राचार्य ने योग के माध्यम से साधना की गूढ़ विधियाँ समझायी हैं और उनके ग्रन्थों का सार इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। उस काल में योग शब्द जब काफी प्रचलित हुआ, तो जैन वाङ्मय और साधना में योग से मेल खाता या योग सम्बन्धी जितने भी साधना के सूत्र थे, उनको सुव्यवस्थित कर यह प्रस्तुत किया कि जैन साधना में वह सब कुछ है, जो योग साधना के नाम से जाना जाता है बल्कि इससे भी अधिक साधन उपलब्ध है जिससे आत्मशुद्धि कर मोक्ष की स्थिति प्राप्त की जा सकती है। प्रस्तुत पुस्तक में सामायिक और योग के अर्थों को समझकर, आचार्य हरिभद्रसूरिजी व हेमचन्द्राचार्य जी की पुस्तकों का सार दिया है और यह समझाया है कि जैन साधना विधि 'पूर्ण योग' है और सामायिक में योग के सब अनुष्ठान समाहित हैं। आत्मा को शुद्धतम स्थिति प्राप्त हो। चित्तवृत्ति निरोध या मन, वचन, काया के योगों को मोक्षप्राप्ति में जोड़ना आदि सभी अर्थों में योग आत्मा की उच्चतम स्थिति प्राप्त करने का साधन है। 'सामायिक' शब्द जब 'साधना' के रूप में प्रयुक्त होता है, तो वह एक घड़ी या ४८ मिनट के लिये एक स्थान पर स्थित हो गीतार्थ, सद्गुरुओं की विनय, भक्ति, उपासना करने से होता है। इसे द्रव्य सामायिक या श्रुत सामायिक भी कहते हैं। इस प्रक्रिया से ज्ञानार्जन, भक्तिभाव और अनासक्त भाव की प्राप्ति होती है। इसी साधना में ध्यान व कायोत्सर्ग की विधि से मन का शोधन भी किया जाता है। ध्यान व कायोत्सर्ग की गहन साधना जैन साधुओं ने अवश्य की, परन्तु बहुत कम साधुओं ने उस विधि को लेखन का रूप दिया या अक्षुण्ण रूप से बनाये रखने का प्रयास किया। कुछ आचार्यों ने, यथा-हरिभद्रसूरिजी व हेमचन्द्राचार्य ने योग के माध्यम से साधना की गूढ़ विधियाँ समझायी हैं और उनके ग्रन्थों का सार इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। उस काल में योग शब्द जब काफी प्रचलित हुआ, तो जैन वाङ्मय और साधना में योग से मेल खाता या योग सम्बन्धी जितने भी साधना के सूत्र थे, उनको सुव्यवस्थित कर यह प्रस्तुत किया कि जैन साधना में वह सब कुछ है, जो योग साधना के नाम से जाना जाता है बल्कि इससे भी अधिक साधन उपलब्ध है जिससे आत्मशुद्धि कर मोक्ष की स्थिति प्राप्त की जा सकती है। प्रस्तुत पुस्तक में सामायिक और योग के अर्थों को समझकर, आचार्य हरिभद्रसूरिजी व हेमचन्द्राचार्य जी की पुस्तकों का सार दिया है और यह समझाया है कि जैन साधना विधि 'पूर्ण योग' है और सामायिक में योग के सब अनुष्ठान समाहित हैं। योग शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य से पहले जैन साहित्य में हुआ है। योग और सामायिक शब्द जब तक 'साधना' के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, तब तक दोनों साम्य अर्थ रखते हैं; क्योंकि साधना साध्य की प्राप्ति के लिये होती है। दोनों का साध्य मोक्षप्राप्ति या आत्मा को शुद्ध स्थिति प्राप्त करना है, परन्तु इसके बाद दोनों का साम्य समाप्त हो जाता है। योग केवल साधना है, जबकि सामायिक साध्य भी है। सामायिक की स्थिति में पहुँचना, समता की उच्चस्थ श्रेणी अर्थात् वीतराग दशा प्राप्त करना ही मोक्ष है।
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