वेद, ऋषियों और यागों की पावन भूमि, आर्यावर्त में परम्परागतों से समय-समय पर दिव्यात्माओं का अवतरण होता रहा है। और अवतरण प्रायः अपने पूर्व संस्कारों से जुड़े विश्व कल्याण के महान् उद्देश्यों से बंधा रहता है। ज्ञान और प्रयत्न के क्षेत्र में पूर्व-जन्म-संगृहीत ऋषि-संस्कारों के महान् आश्चर्य, ब्रह्मर्षि कृष्णदत्त जी महाराज (आदि ब्रह्मा के वरिष्ठ शिष्य, श्रृंगी ऋषि जी की आत्मा) के रूप में एक दिव्यात्मा, वेदज्ञान, योग, दर्शन, वैदिक-इतिहास और यागों के दिग्दर्शन के लिये अवतरित हुई। एक विशेष प्रक्रिया में, समाधि में जाकर योगसिद्ध आत्माओं को सम्बोधित करते हुए इन्होंने असंख्य दिव्य प्रवचन किये। इनके प्रवचनों में सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिये पूर्ण साकल्य उपलब्ध है। अधिकांश प्रवचन अनेक प्रकाशित पुस्तकों के रूप में उपलब्ध हैं। इसी श्रृंखला में, 'याग और तपस्या' विषय पर यह पोथी प्रस्तुत है।
यूं तो इनके एक-एक प्रवचन में गागर में सागर भरण की कल्पना चरितार्थ होती है और दिव्यामृतमयी ज्ञान-धारा निस्यन्द होती है, जिसमें अवगाहन कर जिज्ञासु, अविद्या-अन्धकार, दुःख-दारिद्रय, प्रमाद और अकर्मण्यता आदि दोषों का निवारण कर उत्साह, सुख-समृद्धि, मानवीयता, ज्ञान-कर्मकाण्ड, और यौगिकवाद से परिपूर्ण होकर पुरुषार्थ-चतुष्ट्य को प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है। परन्तु प्रस्तुत पोथी, 'याग और तपस्या' के रूप में साधक की साधना के लिये पूर्ण सामग्री उपलब्ध कराती है।
साधना में पञ्चमहाभूतों के समन्वित सहयोग से याज्ञिक किस प्रकार आत्म-विद्या से ब्रह्म-विद्या का पथगामी बनता है, यह विषय इस पोथी में सङ्कलित प्रवचन रूपी मनकों का सूत्र बनकर प्रकट हुआ है। पोथी के प्रथम भाग में, पञ्च-याग और यागों के वैज्ञानिक विधान का समष्टि रूप प्रस्तुत करते हुए, यजमान के चौबीस से एक होतावाद तक के ज्ञान से सम्बन्धित श्रृंखलाबद्ध प्रवचन याज्ञिक का अभीष्ट मार्गदर्शन करते हैं। द्वितीय भाग, प्राण-विद्या, इन्द्रिय अनुशासन, और वेदमन्त्रों में प्रतिपादित ज्ञान-कर्म-उपासना-काण्डों में अनुसन्धान से प्राप्त ऋषियों की तपस्या-प्रक्रिया का बोध कराता है। इस भाग में वेद के ऋषि ने मानव को परमपिता परमात्मा के इस कर्म-क्षेत्र में व्यवहार करने से पूर्व योग्य बनने के लिये तप के विषय पर दिव्य प्रकाश डाला है। सङ्कलित प्रवचनों में, भगवान् राम, महर्षि लोमश, महर्षि काकभुषण्ड, महर्षि याज्ञवल्क्य, महर्षि उद्दालक, महर्षि भारद्वाज, महर्षि रेवक, महर्षि दधीचि, अश्विनी कुमार आदि अनेक ऋषि-मुनियों की तपस्या और साधना से जुड़े अनेक क्रियात्मक तथ्यों और रहस्यों का सुन्दर उद्बोधन हुआ है, जिसे अपना कर याज्ञिक मानव अपने में अपनेपन का दर्शन करता हुआ तप-पूत होकर व्यवहार की योग्यता प्राप्त करता है।
पूज्यपाद गुरुदेव ब्रह्मर्षि कृष्णदत्त जी महाराज का सारा जीवन क्रियात्मक यागों के प्रचार-प्रसार में लगा रहा। उन्होंने ग्राम-ग्राम, नगर-नगर, भ्रमण कर हजारों वेद पारायण यागों का आयोजन करवाया, अनेक श्रद्धालुओं को पञ्चयागों में योजित किया और अनेकों के हृदय में यागों की भूमिका बनाई। उन्होंने, बरनावा, मेरठ में लाक्षागृह आश्रम को एक दिव्य-याग-स्थली का रूप प्रदान किया, जहाँ, समय-समय पर, वर्ष भर चतुर्वेद और वेद पारायण यागों का आयोजन होता रहता है। परम्परानुसार, इस वर्ष होलिका पर्व से पूर्व आयोजित चतुर्वेद पारायण याग के शुभ अवसर पर यथा-योजना यज्ञ प्रेमियों को इस पोथी की प्रस्तुति सम्भव नहीं हो सकी अतः प्रभु कृपा से आगामी श्रावणी पर्व पर, आयोज्य सामवेद पारायण याग के शुभ अवसर पर ही उन्हें इस पोथी का समर्पण सम्भव हो पायेगा।
वैदिक अनुसन्धान समिति उन सभी महापुरुषों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करती है, जिन्होंने प्रस्तुत पोथी के प्रकाशन के लिये सात्विक सहयोग प्रदान किया है। समिति प्रभु से उनके दीर्घ जीवन में समृद्धि और संवृद्धि की कामना करती है।
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